| श्री विष्णु पुराण » अंश 1: प्रथम अंश » अध्याय 13: राजा वेन और पृथुका चरित्र » श्लोक 26-27 |
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| | | | श्लोक 1.13.26-27  | श्रीपराशर उवाच
इति विज्ञाप्यमानोऽपि स वेन: परमर्षिभि:।
यदा ददाति नानुज्ञां प्रोक्त: प्रोक्त: पुन: पुन:॥ २६॥
ततस्ते मुनय: सर्वे कोपामर्षसमन्विता:।
हन्यतां हन्यतां पाप इत्यूचुस्ते परस्परम्॥ २७॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री पराशर जी बोले- बार-बार समझाने और महर्षियों की बात सुनने पर भी जब वेन ने ऐसी आज्ञा नहीं दी, तब वे अत्यन्त क्रोधित और कुपित होकर आपस में कहने लगे- 'इस पापी को मारो, मारो!'॥ 26-27॥ | | | | Shri Parashar Ji said- Even after repeated persuasion and listening to the Maharishis, when Ven did not give such orders, they became very angry and resentful and started saying amongst themselves- 'Beat this sinner, beat him!॥ 26-27॥ | | ✨ ai-generated | | |
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