श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 81
 
 
श्लोक  1.12.81 
आधारभूतं जगत: सर्वेषामुत्तमोत्तमम्।
प्रार्थयामि प्रभो स्थानं त्वत्प्रसादादतोऽव्ययम्॥ ८१॥
 
 
अनुवाद
अतः हे प्रभु! आपकी कृपा से मैं उस श्रेष्ठ एवं अविनाशी स्थान को प्राप्त करना चाहता हूँ जो सम्पूर्ण जगत का आधार है ॥81॥
 
Therefore, O Lord! By your grace, I wish to attain that best and indestructible place which is the foundation of the entire universe. ॥ 81॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)