श्रीभगवानुवाच
तपसस्तत्फलं प्राप्तं यद्दृष्टोऽहं त्वया ध्रुव।
मद्दर्शनं हि विफलं राजपुत्र न जायते॥ ७५॥
अनुवाद
श्री भगवान बोले - हे ध्रुव ! तुम्हें मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ, इससे तुम्हारी तपस्या अवश्य सफल हुई; परंतु हे राजकुमार ! मेरा दर्शन भी कभी निष्फल नहीं होता ॥75॥
Shri Bhagwan said – O Dhruva! You got my personal darshan, this definitely made your penance successful; But oh prince! Even my philosophy never fails. 75॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥