श्रीभगवानुवाच
तपसस्तत्फलं प्राप्तं यद्दृष्टोऽहं त्वया ध्रुव।
मद्दर्शनं हि विफलं राजपुत्र न जायते॥ ७५॥
अनुवाद
श्री भगवान बोले - हे ध्रुव ! तुम्हें मेरा साक्षात् दर्शन प्राप्त हुआ, इससे तुम्हारी तपस्या अवश्य सफल हुई; परंतु हे राजकुमार ! मेरा दर्शन भी कभी निष्फल नहीं होता ॥75॥
Shri Bhagwan said – O Dhruva! You got my personal darshan, this definitely made your penance successful; But oh prince! Even my philosophy never fails. 75॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)