श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 12: ध्रुवकी तपस्यासे प्रसन्न हुए भगवान‍्का आविर्भाव और उसे ध्रुवपद-दान  »  श्लोक 58
 
 
श्लोक  1.12.58 
अत्यरिच्यत सोऽधश्च तिर्यगूर्ध्वं च वै भुव:।
त्वत्तो विश्वमिदं जातं त्वत्तो भूतभविष्यती॥ ५८॥
 
 
अनुवाद
आप ही इस पृथ्वी के ऊपर और नीचे सर्वत्र फैले हुए हैं। यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड आपसे ही उत्पन्न हुआ है और भूत और भविष्य आप ही से हुए हैं। ॥58॥
 
You are the one who has spread everywhere above and below this earth. This entire universe has originated from you and the past and the future have happened from you. ॥ 58॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)