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vishnu 1.11.17-18: बालक! तू चिन्ता मत कर, क्योंकि जो कर्म तूने पूर्वजन्मों में किए हैं, उन्हें कौन छीन सकता है? और जो कर्म तूने नहीं किए, उन्हें कौन दे सकता है? अतः तू उनके वचनों से दुःखी न हो ॥17-18॥   |   vishnu अध्याय 1.11: ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट   ।   vishnu अंश 1: प्रथम अंश   ।   श्री विष्णु पुराण Sri Vishnu Puran | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री विष्णु पुराण  »  अंश 1: प्रथम अंश  »  अध्याय 11: ध्रुवका वनगमन और मरीचि आदि ऋषियोंसे भेंट  »  श्लोक 17-18
 
 
श्लोक  1.11.17-18 
नोद्वेगस्तात कर्त्तव्य: कृतं यद्भवता पुरा।
तत्कोऽपहर्त्तुं शक्नोति दातुं कश्चाकृतं त्वया॥ १७॥
तत्त्वया नात्र कर्त्तव्यं दु:खं तद्वाक्यसम्भवम्॥ १८॥
 
 
अनुवाद
बालक! तू चिन्ता मत कर, क्योंकि जो कर्म तूने पूर्वजन्मों में किए हैं, उन्हें कौन छीन सकता है? और जो कर्म तूने नहीं किए, उन्हें कौन दे सकता है? अतः तू उनके वचनों से दुःखी न हो ॥17-18॥
 
Child! Do not be worried, because who can take away what you have done in your previous lives? And who can give you what you have not done? Therefore, you should not be saddened by his words. ॥17-18॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)