श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  701228SB-SURAT--Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम कथा
सूरत, 28-दिसंबर-1970
 
 
 
[मङ्गलाचरण एवं संकीर्तन]

वन्देऽहं श्रीगुरोः श्रीयुतपदकमलं श्रीगुरुन् वैष्णवांश्च
श्रीरूपं साग्रजातं सहगणरघुनाथान्वितं तं सजीवम् ।
साद्वैतं सावधूतं परिजनसहितं कृष्णचैतन्यदेवं
श्रीराधाकृष्णपादान् सहगणललिता-श्रीविशाखान्न्वितांश्च ॥

नम ॐ विष्णुपादाय कृष्णप्रेष्ठाय भूतले ।
श्रीमते भक्तिसिद्धान्तसरस्वतीति नामिने ॥
श्रीवार्षभानवीदेवीदयिताय कृपाम्बुधये ।
कृष्णसम्बन्धविज्ञाने प्रभवे प्रभवे नमः ॥
नमस्ते सारस्वते देवे गौरवाणीप्रचारिणे ।
निर्विशेषशून्यवादिपाश्चात्यदेशतारिणे ॥

श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु-नित्यानन्द ।
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि-गौरभक्तवृन्द ॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥
(श्रील प्रभुपाद द्वारा सभा में उपस्थित सभी लोगों से संकीर्तन कराने के पश्चात् प्रवचन आरम्भ होता है)

यह हरे कृष्ण महामन्त्र का आन्दोलन, जो अभी संसारभर में चल रहा है, न्यू यॉर्क से आरम्भ हुआ था। उसके पश्चात् सैन फ्रांसिस्को, लॉस एंजेलिस, मॉन्ट्रियल, बॉस्टन, बफ़ेलो, और धीरे-धीरे यूरोप में लन्दन, एडिनबर्ग, हैम्बर्ग, बर्लिन, पेरिस, फिर ऑस्ट्रेलिया और जापान—समस्त संसार में International Society for Krishna Consciousness (इस्कॉन) के पैंतालीस केन्द्र खुल चुके हैं।

एक-एक केन्द्र में पच्चीस से पचास समर्पित भक्त—जैसे भक्त आपके सामने यहाँ उपस्थित हैं—प्रातः पाँच बजे मङ्गल-आरती से लेकर रात्रि दस बजे तक निरन्तर कीर्तन, विग्रह-अर्चन और भगवत्सेवा में संलग्न रहते हैं।

यह संकीर्तन आन्दोलन श्रीचैतन्य महाप्रभु ने आज से पाँच सौ वर्ष पूर्व भारतवर्ष में आरम्भ किया था। और महाप्रभु की यह भविष्यवाणी है:
पृथिवीते आछे यत नगरादि ग्राम ।
सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम ॥ (चैतन्य-भागवत)
पृथ्वी पर जितने भी नगर और गाँव हैं, सर्वत्र मेरे नाम का प्रचार होगा! यह जो भविष्यवाणी है, उसका शुभारम्भ मात्र अभी हुआ है।

आप लोगों से हमारा यही निवेदन है कि जो विदेशी युवक-युवतियाँ पाँच वर्ष पूर्व तक 'कृष्ण' नाम भी नहीं जानते थे, उन्होंने कितने आदर और लगन से इस हरिनाम संकीर्तन आन्दोलन को स्वीकार किया है! इसे प्रत्यक्ष दिखाने के लिए ही मैं इन अमरीकी, कनाडाई और यूरोपीय नवयुवकों को आपके समक्ष लाया हूँ।

इस सभा में उपस्थित विशेष रूप से नवयुवकों से मेरा निवेदन है कि वे कृष्णभावनामृत के इस दार्शनिक विचार को गम्भीरता से समझें। हमारे पास अभी हिन्दी में अधिक पुस्तकें नहीं थीं, परन्तु अब भारत में केन्द्र स्थापित होने से हमने हिन्दी में भी ग्रन्थ और 'बैक टू गॉडहेड' (Back to Godhead - भगवद्-दर्शन) पत्रिका का प्रकाशन प्रारम्भ कर दिया है। हमारी 'बैक टू गॉडहेड' पत्रिका की पाँच लाख प्रतियाँ प्रतिमाह मुद्रित होती हैं—अंग्रेज़ी, फ्रेंच, जर्मन, जापानी और हिन्दी में; और शीघ्र ही बँगला तथा अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रकाशित की जाएँगी।

कहने का तात्पर्य यह है कि मानव जीवन भगवान् से अपने खोए हुए सम्बन्ध को पुनः स्थापित करने के लिए मिला है। पशु जीवन में जीव भगवान् को भूल जाता है; यदि मानव जीवन पाकर भी हम भगवान् को भूल गए, तो हमारा जीवन पशु के समान ही रह गया!
आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च
सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो
धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः ॥
खाना, पीना, सोना, बच्चे पैदा करना और दिन-रात परिश्रम करना—यह तो पशु भी करते हैं। इसमें कोई मनुष्यता या बड़प्पन नहीं है। बड़प्पन तो इसमें है कि हम भगवान् के साथ अपने शाश्वत सम्बन्ध को पहचानें।

पद्म पुराण में कहा गया है कि चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के पश्चात् जब दुर्लभ मनुष्य जन्म प्राप्त होता है, और उस जन्म में भी यदि गोविन्द से सम्बन्ध स्थापित नहीं हुआ, तो वह जीवन व्यर्थ चला गया।

हमारे इस आन्दोलन का मुख्य उद्देश्य यही है कि मानव समाज में भगवान् से पुनः सम्बन्ध स्थापित किया जाए। बहुत से मूर्ख लोग कहते हैं—"भगवान् कहाँ हैं? भगवान् को दिखाओ!" अरे, भगवान् तो सर्वत्र विद्यमान हैं! विशेष रूप से भारतवर्ष में तो स्वयं भगवान् श्रीकृष्ण और मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्रीरामचन्द्र अवतरित हुए और उन्होंने अपनी लीलाएँ प्रकट कीं। वे स्वयं श्रीमद् भगवद्गीता देकर गए हैं। फिर भी यदि भारतवासी कहें कि "भगवान् कहाँ हैं, भगवान् मर गए हैं"—तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और क्या हो सकता है?

अतः आप सभी लोग इस कृष्ण संकीर्तन आन्दोलन में अपना पूर्ण सहयोग प्रदान कीजिए। कलयुग में भगवान् से सम्बन्ध जोड़ने का परम सुगम उपाय है:
हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नाम केवलम् ।
कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ (बृहन्नारदीय पुराण)

भगवान् के नाम-स्मरण के लिए कोई देश, काल या कठोर नियम का बन्धन नहीं है: 'नियमितः स्मरणे न कालः'। जब भी समय मिले, चलते-फिरते, उठते-बैठते इस महामन्त्र का जप कीजिए:
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

अपने भौतिक प्रयासों और बुद्धि से कोई भगवान् को नहीं जान सकता:
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः ।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥ (भ.र.सिं. 1.2.234)
जैसे रात्रि के समय आप ज़बरदस्ती सूर्य को उदित नहीं कर सकते; जब समय होता है, सूर्य अपनी कृपा से स्वयं प्रकट हो जाता है। उसी प्रकार जब हम अपनी जिह्वा को भगवान् की सेवा में लगा देते हैं, तब भगवान् स्वयं हमारे हृदय में स्फुरित होते हैं।

जिह्वा के दो मुख्य कार्य हैं—बोलना और आस्वादन करना (खाना)। इन दोनों कार्यों को भगवान् की सेवा में लगा दीजिए:
1. जिह्वा से सदैव हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कीजिए।
2. जिह्वा को केवल भगवान् का अर्पित प्रसाद ही ग्रहण करने दीजिए; कृष्ण-प्रसाद के अतिरिक्त कुछ भी मत खाइए।

बस, इन दो नियमों का पालन करके देखिए कि आपका जीवन कैसे बदल जाता है! इसका प्रत्यक्ष प्रमाण आपके सामने बैठे ये विदेशी नवयुवक और युवतियाँ हैं। इन्होंने अपनी जिह्वा को पूर्णतः संयमित कर लिया है—शराब, माँस, मछली, अण्डा, सिगरेट, चाय, कॉफ़ी और जुआ सब कुछ त्याग दिया है। वे कितना पवित्र और आनन्दमय जीवन बिता रहे हैं!

मैं चाहता हूँ कि भारत के, विशेष रूप से सूरत के नागरिक भी इस हरिनाम को अपनाएँ और अपने जीवन को सफल बनाएँ।
बहुत-बहुत धन्यवाद! हरे कृष्ण!
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥