श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  750322SB-CALCUTTA--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 1.2.7
कलकत्ता, 22-मार्च-1975
 
 
 
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः ।
जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.7)

कल हमने पहले श्लोक पर चर्चा की थी:
"स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुकी प्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥"

भगवान के श्रीचरणों में प्रपत्ति और भक्तियोग... भक्तियोग का अर्थ होता है:
"श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥"
(श्रीमद्भागवतम् 7.5.23)

भगवान विष्णु के विषय में सुनना, जैसा कि आप लोग यहाँ सुन रहे हैं—यह भक्तियोग है: 'श्रवणम्'। और सुनकर फिर उसका कीर्तन करना—'कीर्तनम्'। आज भगवान के विषय में यहाँ जो चर्चा हुई, घर जाकर उसका पुनः अनुशीलन और स्मरण करना—'स्मरणम्'। जो कुछ हम सत्संग में सुनते हैं, उसका निरंतर स्मरण करना चाहिए। इसी प्रकार भक्ति आगे बढ़ती है:

सतां प्रसङ्गान्मम वीर्यसंविदो
भवन्ति हृत्कर्णरसायनाः कथाः ।
तज्जोषणादाश्वपवर्गवर्त्मनि
श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥
(श्रीमद्भागवतम् 3.25.25)

भगवान की कथा सत्संग में भक्तों के मुख से सुनने पर कान और हृदय को अमृत के समान प्रिय लगती है। जो लोग भगवद्-भक्त हैं, उनके साथ बैठकर भगवान की कथाएं सुनना और फिर उस पर गंभीर विचार करना—यही श्रवण और कीर्तन है। और जिसने ठीक-ठीक श्रवण किया है, वह अवश्य कीर्तन करेगा—यह भगवद्-भक्ति का स्वाभाविक लक्षण है।

जैसे ये हमारे विदेशी शिष्य हैं—अमेरिका और यूरोप के युवक। पाश्चात्य देशों में भौतिक भोग-विलास की अपार सुविधाएं हैं। परंतु क्योंकि उन्होंने प्रामाणिक रूप से भगवान की कथा का श्रवण किया, इसलिए आज सब भोग त्यागकर, इस युवावस्था में संन्यास लेकर सारे संसार में हरिनाम का प्रचार और कीर्तन कर रहे हैं! यह यथार्थ श्रवण का फल होता है। यदि किसी ने हृदय से भगवान की कथा का श्रवण किया है, तो भीतर से स्वतः यह प्रेरणा जागेगी कि मैं इसे सबको सुनाऊँ! इतनी अद्भुत वस्तु है, इसे पूरी दुनिया को सुनाना चाहिए—इसका नाम है कीर्तन।

'कीर्तन' का अर्थ केवल मृदंग और करताल बजाना ही नहीं है; भगवान के गुण, रूप और संदेश को सुनाना—यह भी कीर्तन है। जैसे श्रील शुकदेव गोस्वामी ने किया था: "श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद् वैयासकिः कीर्तने"। श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वंदन, अर्चन—भक्ति के अनेक अंग हैं। कोई सब अंग अपनाए तो भी उत्तम है, और कोई निष्ठापूर्वक एक ही अंग को ग्रहण कर ले, तो भी उसका जीवन परम सार्थक हो जाएगा।

जैसे महाराज परीक्षित ने केवल श्रवण किया। उनके पास कीर्तन करने का समय नहीं था; केवल सात दिन का जीवन शेष था। शुकदेव गोस्वामी ने उन्हें श्रीमद्भागवतम् सुनाई। परीक्षित महाराज ने केवल अनन्य भाव से श्रवण किया और वे सीधे भगवद्धाम पहुँच गए! और व्यासदेव के पुत्र श्रील शुकदेव गोस्वामी केवल कीर्तन करके संसार-सागर से पार हो गए।

इस श्लोक में बता रहे हैं: "वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः"। आप कोई भी धर्म या मत मानिए, उसमें कोई आपत्ति नहीं है; परंतु फल देखना चाहिए। केवल हिन्दू, मुसलमान या ईसाई कहने से कुछ लाभ नहीं होता; वास्तविक फल देखना चाहिए। वह फल क्या है? भगवान अधोक्षज में अनन्य भक्तियोग।

भगवान का एक नाम है 'अधोक्षज'। अधः-कृतम् अक्षजं ज्ञानं येन सः अधोक्षजः। हमारा जो साधारण प्राकृत ज्ञान है, वह इन्द्रियों पर आधारित है। आँख से देखते हैं, जिह्वा से स्वाद लेते हैं, त्वचा से स्पर्श करते हैं, नासिका से सूँघते हैं, और कान से सुनते हैं। इस प्रकार पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ, पाँच कर्मेन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन—इनके द्वारा जो सांसारिक ज्ञान अर्जन किया जाता है, वह सब भौतिक है। उस भौतिक ज्ञान के द्वारा भगवान को नहीं जाना जा सकता:
अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः ।
सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः ॥
(भक्तिरसामृतसिंधु 1.2.234)

इसलिए भगवान का नाम अधोक्षज है, क्योंकि वे इन चर्म-इन्द्रियों की पहुँच से सर्वथा परे (अतीन्द्रिय) हैं। जब बड़े-बड़े ऋषि-मुनि अपने मानसिक चिंतन से भगवान को नहीं जान पाते, तो अंत में हारकर कह देते हैं: "भगवान निराकार हैं!" जब उनकी सामर्थ्य समाप्त हो जाती है, तो वे कह देते हैं कि भगवान का कोई रूप नहीं है।

परंतु भगवान निराकार कैसे हो सकते हैं? भगवान तो परम सुंदर श्यामसुंदर हैं! शास्त्र का निर्देश है:
प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन
सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति ।
यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥
(ब्रह्मसंहिता 5.38)
शुद्ध भक्त चौबीसों घंटे अपने हृदय में भगवान के उसी द्विभुज श्यामसुंदर रूप का दर्शन करते हैं। भगवान निराकार नहीं हैं, बल्कि वे हमारी इन अपूर्ण भौतिक इन्द्रियों से अतीत हैं।

भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं: "नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः" (श्रीमद् भगवद्गीता 7.25)—मैं सबके सम्मुख अपनी माया का आवरण हटाकर प्रकट नहीं होता। जो योगमाया को पार कर जाते हैं, उन्हीं को भगवान का दर्शन होता है।

तो फिर इन भौतिक इन्द्रियों द्वारा भगवान का दर्शन कैसे संभव है? शास्त्र उपाय बताता है: "सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः"—जब हम अपनी इन्द्रियों को भगवान की सेवा में लगाते हैं, तो भगवान स्वयं कृपा करके हमारे सम्मुख प्रकट होते हैं।

जैसे कोई राजा या राष्ट्रपति है; साधारण नागरिक अपनी ज़िद से राजा का दर्शन नहीं कर सकता। परंतु यदि राजा स्वयं प्रसन्न होकर किसी के पास आ जाए, तो यह राजा की अहैतुकी कृपा है। उसी प्रकार हम अपनी चर्म-इन्द्रियों की हठधर्मिता से भगवान को नहीं देख सकते; जब भगवान हम पर प्रसन्न होते हैं, तब वे स्वयं दर्शन देते हैं।

और सेवा का प्रारंभ कहाँ से होता है? "सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ"—जिह्वा से! आँख से नहीं, जिह्वा से। देखिए, यह भी एक अलौकिक शास्त्रीय विज्ञान है। सब लोग सोचते हैं कि दर्शन आँख से होता है, परंतु शास्त्र कहता है कि भगवद्-दर्शन जिह्वा से प्रारंभ होता है! जिह्वा के दो मुख्य कार्य हैं—एक तो वाणी (शब्द का उच्चारण), और दूसरा रस का आस्वादन।

और वास्तव में जिह्वा के लोभ से ही यह सारा संसार चल रहा है। संसार में जितनी भी अशांति और भागदौड़ है, वह किसलिए है? इस रसना (जीभ) के लोभ के लिए! कहाँ होटल है, कहाँ चाय है, बीड़ी है, सिगरेट है, मदिरा है, माँसाहार है—केवल जीभ के स्वाद के लिए! यदि मनुष्य अपनी इस जिह्वा को संयमित करके भगवान की सेवा में लगा दे, तो तत्काल भगवद्-साक्षात्कार हो जाएगा।

श्रील भक्तिविनोद ठाकुर गाते हैं:
शरीर अविद्या-जाल, जड़ेन्द्रिय ताहे काल,
जीवे फेले विषय-सागरे ।
तार मध्ये जिह्वा अति, लोभमय सुदुर्मति,
ता'रे जेता कठिन संसारे ॥
कृष्ण बड़ दयामय, करिbare जिह्वा जय,
स्वप्रसाद-अन्न दिला भाई ।
सेई अन्नामृत पाओ, राधा-कृष्ण-गुण गाओ,
प्रेमे डाको चैतन्य-निताई ॥

जिह्वा को दो कार्यों में लगाना चाहिए:
1. निरंतर हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करना—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे / हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।
2. केवल भगवान का भोग लगा हुआ शुद्ध महाप्रसाद पाना।

प्रह्लाद महाराज भगवान नृसिंहदेव के सम्मुख हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हैं:
नैवोद्विजे पर दुरत्ययवैतरण्यास्-
त्वद्वीर्यगायनमहामृतामग्नचित्तः ।
शोचे ततो विमुखचेतस इन्द्रियार्थ-
मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.9.43)

प्रह्लाद महाराज कहते हैं: "हे प्रभु! मुझे इस संसार-रूपी वैतरणी नदी से तनिक भी भय नहीं है, क्योंकि आपके दिव्य यश और लीलाओं के गान रूपी महामृत में मेरा चित्त सदा डूबा रहता है। मुझे केवल उन विमूढ़ संसारी मनुष्यों के लिए दुःख होता है जो आपको भूलकर इस क्षणभंगुर मायावी सुख के लिए गधे के समान दिन-रात घोर परिश्रम कर रहे हैं!"

वैष्णव का यही स्वभाव होता है—परदुःख-दुःखी। वैष्णव को अपना कोई निजी दुःख नहीं होता, क्योंकि वह तो निरंतर भगवान के नाम-गुण-गान में मग्न रहता है। उसका एकमात्र दुःख यही होता है कि यह संसार भगवान को भूलकर माया के चक्कर में सड़ रहा है। इसलिए वैष्णव नगर-नगर, गाँव-गाँव जाकर हरिनाम का प्रचार करते हैं, ताकि लोग भगवान के चरणों की ओर उन्मुख हों।

"वासुदेवे भगवति"—वासुदेव कौन हैं? साक्षात भगवान श्री कृष्ण। भगवान सबके परम पिता हैं: "अहं बीजप्रदः पिता" (श्रीमद् भगवद्गीता 14.4)। और यह भौतिक प्रकृति (दुर्गा देवी) माता हैं। भगवान का कोई एक सीमित नाम नहीं है; वे अपनी लीला और भक्तों के प्रेम के अनुसार अनंत नाम स्वीकार करते हैं। जब वे वसुदेव के पुत्र बनकर प्रकट हुए, तो 'वासुदेव' कहलाए; यशोदा मैया के पुत्र बने, तो 'यशोदानंदन' कहलाए; राधा रानी के प्रिय बने, तो 'राधारमण' कहलाए; और जब अर्जुन के रथ के सारथी बने, तो 'पार्थसारथी' कहलाए।

भगवान भक्तों पर अनुग्रह करने के लिए अवतरित होते हैं:
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.8)
साधुओं का उद्धार करते हैं और दुष्कर्मियों का विनाश करते हैं। 'दुष्कृती' का अर्थ है जो केवल पाप-कर्मों में प्रवृत्त है।

अतः भगवद्-भक्ति करने के लिए मनुष्य को पाप-कर्मों से सर्वथा निवृत्त होना पड़ेगा:
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.28)
जिनके समस्त पाप नष्ट हो चुके हैं, वही दृढ़व्रत होकर भगवान का अनन्य भजन कर सकते हैं।

इसलिए इस भक्तियोग का दूसरा नाम है—'वैराग्य-विद्या' अथवा निवृत्ति-धर्म। दो मार्ग होते हैं—प्रवृत्ति-मार्ग और निवृत्ति-मार्ग। प्रवृत्ति-मार्ग का अर्थ है इस संसार को भोगने की वासना। और निवृत्ति-मार्ग का अर्थ है इस संसार के भोगों से विरक्त होकर भगवान की सेवा में लगना।

श्रील सार्वभौम भट्टाचार्य जी ने श्री चैतन्य महाप्रभु की स्तुति में लिखा है:
वैराग्य-विद्या-निज-भक्तियोग-
शिक्षार्थमेकः पुरुषः पुराणः ।
श्रीकृष्णचैतन्य-शरीरधारी
कृपाम्बुधिर्यस्तमहं प्रपद्ये ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 6.254)
वे ही अनादि पुराण-पुरुष श्री कृष्ण आज श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए हैं—क्या सिखाने के लिए? वैराग्य-विद्या और अपना निज भक्तियोग सिखाने के लिए!

भक्तियोग का स्वाभाविक फल है भौतिक भोगों से वैराग्य: "भक्तिः परेशानुभवो विरक्तिरन्यत्र च" (श्रीमद्भागवतम् 11.2.42)। जब तक सांसारिक भोगों से वैराग्य नहीं होगा, तब तक भक्ति परिपक्व नहीं हो सकती।

भगवान ऋषभदेव अपने पुत्रों को सावधान करते हैं:
नूनं प्रमत्तः कुरुते विकर्म
यदिन्द्रियप्रीतय आपृणोति ।
न साधु मन्ये यत आत्मनोऽय-
मसन्नपि क्लेशद आस देहः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 5.5.4)
कि जो व्यक्ति केवल इन्द्रिय-तृप्ति के लिए शास्त्र-विरुद्ध विकर्म (पाप-कर्म) करता है, वह प्रमत्त (पागल) है। क्योंकि ऐसे पाप-कर्मों के कारण उसे बार-बार नया भौतिक शरीर धारण करना पड़ेगा, जो केवल क्लेश और दुःखों का ही घर है।

इसलिए वास्तविक सुख और शांति के लिए भगवान को ही एकमात्र भोक्ता मानना चाहिए:
भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम् ।
सुहृदं सर्वभूतानां ज्ञात्वा मां शान्तिमृच्छति ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 5.29)
भगवान ही भोक्ता हैं, हम भोक्ता नहीं हैं। जैसे वृक्ष की जड़ (मूल) में जल सींचने से तना, शाखाएं, पत्ते और फूल सब स्वतः तृप्त हो जाते हैं, उसी प्रकार भगवान श्री कृष्ण की सेवा करने से संपूर्ण जगत और हमारी आत्मा स्वतः परम संतुष्ट हो जाती है।

श्री चैतन्य महाप्रभु का यही संदेश है:
यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश ।
आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 7.128)
आप जहाँ भी हैं, जिसको भी देखें, उसे भगवान श्री कृष्ण की श्रीमद् भगवद्गीता का उपदेश सुनाइए। अपने घर में बैठकर संध्या के समय परिवार के साथ श्रीमद् भगवद्गीता पढ़िए, और सबको इस जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त कीजिए।

शास्त्र कहता है:
गुरुर्न स स्यात्स्वजनो न स स्यात्
पिता न स स्याज्जननी न सा स्यात् ।
दैवं न तत्स्यान्न पतिश्च स स्यान्-
न मोचयेद्यः समुपेतमृत्युम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 5.5.18)
जो अपने आश्रित को जन्म और मृत्यु के चक्र से न छुड़ा सके, उसे न गुरु बनना चाहिए, न पिता, न माता, और न पति बनना चाहिए!

हम जीवात्मा नित्य और अमर हैं: "न जायते म्रियते वा कदाचित्... न हन्यते हन्यमाने शरीरे"। तो फिर हम बार-बार क्यों मरते हैं? यह बार-बार शरीर बदलना ही सबसे बड़ा कष्ट है। इस मनुष्य जीवन में ही भगवान वासुदेव के चरणों में अनन्य भक्तियोग लगाकर इस आवागमन को समाप्त किया जा सकता है: "वासुदेवे भगवति भक्तियोगः प्रयोजितः । जनयत्याशु वैराग्यं ज्ञानं च यदहैतुकम् ॥"

देखिए, हमारे इन पाश्चात्य शिष्यों को देखिए—कितना तीव्र वैराग्य और दिव्य ज्ञान इनमें प्रकट हुआ है! जो कल तक शराब, माँसाहार और क्लबों के भोग-विलास में डूबे थे, आज वे सब कुछ त्यागकर श्री चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव-महोत्सव के लिए मायापुर और वृन्दावन दौड़े चले आते हैं। यह प्रत्यक्ष प्रमाण है कि वासुदेव-भक्ति से तत्काल वैराग्य और ज्ञान का प्राकट्य होता है।

भगवान बहुत सरल हैं। वे कहते हैं:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 9.26)
यदि तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है, तो प्रेम से एक तुलसी-पत्र, एक पुष्प, थोड़ा फल या केवल जल ही मुझे अर्पित करो, मैं उसे सहर्ष स्वीकार करूँगा। तो फिर भगवान की भक्ति करने में क्या कठिनाई है?

Thank you very much. हरे कृष्ण!

[प्रश्नोत्तरी सत्र]

प्रश्नकर्ता 1: जहाँ प्रकाश और भक्ति है, क्या वहाँ माया का अंधकार आ सकता है?

श्रील प्रभुपाद: जहाँ साक्षात भगवान हैं, वहाँ माया कभी फटक भी नहीं सकती। कृष्ण सूर्य के समान हैं, और माया अंधकार के समान है—जहाँ कृष्ण हैं, वहाँ अंधकार का कोई अस्तित्व नहीं रह सकता।

भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया ।
मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.14)
माया भगवान की दासी है। जैसे एक सभ्य नागरिक को पुलिस से कोई भय नहीं होता, पुलिस उसके लिए कोई उपद्रव नहीं करती; परंतु जो चोर और अपराधी हैं, पुलिस उनके लिए डंडा लेकर खड़ी रहती है। तो जितने अभक्त हैं, वे सब चोर हैं, क्योंकि वे भगवान की संपत्ति (लक्ष्मी) को भगवान के बिना अकेले भोगना चाहते हैं।

जैसे रावण ने भगवान राम से सीता जी (साक्षात लक्ष्मी) को छीनने का प्रयास किया, तो उसका परिणाम क्या हुआ? उसका सपरिवार सर्वनाश हो गया! इसलिए जो केवल लक्ष्मी को चाहते हैं, उनकी दुर्गति रावण जैसी होती है। परंतु जो लक्ष्मीपति भगवान नारायण के साथ लक्ष्मी की आराधना करते हैं, उन पर भगवती लक्ष्मी की नित्य कृपा बरसती है।

माया-सुख वास्तविक सुख नहीं है; इसलिए प्रह्लाद महाराज ने कहा: 'मायासुखाय भरमुद्वहतो विमूढान्'। वास्तविक सुख तो भगवान की सेवा का सुख है। और जब उच्च रस (परम रस) प्राप्त हो जाता है, तो निम्न रस स्वतः छूट जाता है: "परं दृष्ट्वा निवर्तते" (श्रीमद् भगवद्गीता 2.59)।

तपस्या क्या है? जिस वस्तु में हमारी स्वाभाविक सांसारिक आसक्ति है, कृष्ण की प्रसन्नता के लिए उसे स्वेच्छा से त्यागने में जो थोड़ा कष्ट होता है, वही तपस्या है: "तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं शुद्ध्येत्"। बिना तपस्या के आत्म-शुद्धि संभव नहीं है।

प्रश्नकर्ता 2: भगवान को संपूर्ण रूप से समर्पण करने के लिए साधक को क्या प्रयास करना चाहिए?

श्रील प्रभुपाद: यही भक्तियोग—निरंतर श्रवण! सुनते-सुनते, हरि-कथा का निरंतर श्रवण करते-करते हृदय का सारा मैल स्वतः धुल जाएगा:

शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः ।
हृद्यन्तःस्थो ह्यभद्राणि विधुनोति सुहृत्सताम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.17)

भगवान सबके हृदय में अंतर्यामी रूप से विराजमान हैं: "ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति"। जब भगवान देखते हैं कि यह जीव मेरी कथाओं को आदरपूर्वक सुनने का निष्कपट प्रयास कर रहा है, तो भगवान स्वयं उसके हृदय के समस्त काम, क्रोध, लोभ आदि अभद्र विचारों को धोकर साफ़ कर देते हैं।

भगवान स्वयं अभय वचन देते हैं:
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।
अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.66)
भगवान सर्वशक्तिमान हैं; यदि आप सच्चे हृदय से शरणागत हो जाएं, तो वे एक क्षण में आपको समस्त पापों के फलों से मुक्त कर सकते हैं।

काम, क्रोध आदि को भी कृष्ण की सेवा में लगाया जा सकता है। जैसे हम संसार में गगनचुंबी अट्टालिकाएं बनाने के लिए दिन-रात छटपटाते हैं, उसी छटपटाहट और शक्ति को यदि भगवान का भव्य मंदिर बनाने में लगा दिया जाए, तो वह काम भी भक्ति बन जाता है! जैसे अर्जुन ने अपनी युद्ध-विद्या और क्रोध को कुरुक्षेत्र के मैदान में भगवान श्री कृष्ण की प्रसन्नता के लिए लगाया, और भगवान ने उन्हें अपना परम भक्त और सखा घोषित किया।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।
(श्रीमद् भगवद्गीता 18.46)
अतः पुम्भिर्द्विजश्रेष्ठा वर्णाश्रमविभागशः ।
स्वनुष्ठितस्य धर्मस्य संसिद्धिर्हरितोषणम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.13)
अपने स्वाभाविक कर्मों द्वारा भगवान श्री हरि को संतुष्ट करना ही जीवन की परम सिद्धि है। यही कृष्णभावनामृत आंदोलन का सार है।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥