श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  730108SB-BOMBAY_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भागवतम 1.2.6
बॉम्बे, 08-जनवरी-1973
 
 
 
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे ।
अहैतुकी प्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.6)

कल हम लोग इस श्लोक की व्याख्या कर रहे थे कि मनुष्य के लिए जो 'परो धर्मः' है, उसको ही ग्रहण करना चाहिए। 'पर' और 'अपर'—अपर का अर्थ होता है निकृष्ट, और पर का अर्थ होता है उत्कृष्ट। तो अभी जो हमारी अवस्था है, वह निकृष्ट और उत्कृष्ट का मिश्रण है। क्योंकि यह जो शरीर है, यह निकृष्ट है; और जो आत्मा है, यह उत्कृष्ट है। जैसे भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बताते हैं:

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च ।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.4-5)

भगवान की दो प्रकार की प्रकृति है—अपरा प्रकृति और परा प्रकृति। जब अपरा प्रकृति में मनुष्य आसक्त रहता है, उस समय जो धर्म-याजन करता है, वह अपरा धर्म है। जैसे हम लोग समझते हैं कि हमारा धर्म हिन्दू धर्म है, कोई समझता है हमारा धर्म मुसलमान धर्म है, क्रिश्चियन धर्म है; कोई समझता है हमारा धर्म देश की सेवा है (देश-धर्म), कोई समझता है समाज की सेवा ही हमारा धर्म है। तो ये सब जितने तथाकथित धर्म हैं, क्योंकि ये इस नश्वर शरीर से संबंधित हैं, इसलिए ये सब अपरा—निकृष्ट धर्म हैं।

तो निकृष्ट धर्म में रहने से वास्तविक धर्म का आचरण नहीं होता। इसको शास्त्र में 'कैतव धर्म' कहते हैं। 'कैतव' का अर्थ होता है छलना, cheating। श्रीमद्भागवतम् के प्रारंभ में ही कह दिया गया है:
"धर्मः प्रोज्झितकैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सताम्" (श्रीमद्भागवतम् 1.1.2)।
जितने भी cheating धर्म हैं, छलना-पूर्वक धर्म हैं, जो धर्म के नाम से चलते हैं परंतु असल में धर्म नहीं हैं, उन सबको श्रीमद्भागवतम् ने बहिष्कृत कर दिया है।

पहले थोड़ा यह समझिए कि धर्म किसको कहा जाता है। शास्त्र में कहते हैं: "धर्मं तु साक्षाद् भगवत्प्रणीतम्"। धर्म वह है जो भगवान की वाणी है, भगवान का जो विधान या आज्ञा है, वही धर्म है। क्यों? क्योंकि जीव भगवान का नित्य अंश मात्र है—"ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः" (श्रीमद् भगवद्गीता 15.7)।

जैसा हमने कई बार आप लोगों के सामने उदाहरण प्रस्तुत किया है—जैसे यह हमारी अँगुली है, यह पूरे शरीर का एक अंश है। अब मैं चाहता हूँ कि सिर में खुजली हो रही है तो अँगुली सिर को खुजलाए, पाँव में दर्द है तो पाँव दबाए। तो जैसे इस अंश का यह स्वाभाविक धर्म है कि वह पूर्ण शरीर की आज्ञा का पालन करे। अथवा जैसे शासन का कानून होता है—गवर्नमेंट ने कोई आदेश दिया, या विधानसभा में अध्यक्ष ने जो आज्ञा दी, उसको मानना ही पड़ता है। उसी प्रकार धर्म का अर्थ होता है जिसको आप कभी छोड़ नहीं सकते। आप ऐसा नहीं कह सकते कि हम सरकार का कानून नहीं मानते; यदि नहीं मानेंगे तो आपको दंड भुगतना पड़ेगा, दुखी होना पड़ेगा।

तो धर्म क्या चीज़ है? धर्म वही वस्तु है जो भगवान ने बनाई है। जैसे भगवान ने बनाया कि इमली में खट्टापन है, और गन्ने (ईख) में मिठास है। पानी जो है वह तरल है, और पत्थर जो है वह कठोर है। यह किसने बनाया? यह भगवान ने बनाया। तो पत्थर रहे और उसमें कठोरता न रहे, ऐसा हो नहीं सकता। जहाँ पत्थर रहेगा, वहाँ कठोरता रहेगी ही। जहाँ पानी रहेगा, वहाँ तरलता रहेगी ही। जहाँ अग्नि है, वहाँ ताप और प्रकाश रहेगा ही।

तो धर्म इसी प्रकार वस्तु का स्वाभाविक गुण है, इसको समझना चाहिए। धर्म यह नहीं है कि मनमाने ढंग से कुछ भी धर्म बना लिया जाए। धर्म का अर्थ ही है वस्तु का नित्य स्वभाव। जैसे आपके हाथ में किसी ने थोड़ी-सी चीनी दी, आप जानते हैं कि इसका स्वभाव मिठास है। यदि वह मीठी न हो, तो वह चीनी नहीं है।

इसी प्रकार समझना चाहिए कि जीवात्मा का धर्म क्या है। जीवात्मा भगवान का सनातन अंश है, तो अंश का स्वाभाविक धर्म है पूर्ण की सेवा करना। यही भगवद्-सेवा ही जीव का वास्तविक और असल धर्म है। इसलिए शास्त्र कहता है: "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे"।

धर्म तो संसार में बहुत-से हैं, नाना प्रकार के मत-पंथ हैं; बाकी शास्त्र कहता है कि ये सब cheating धर्म हैं। इसीलिए भगवान अंत में कहते हैं:
"सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज" (श्रीमद् भगवद्गीता 18.66)।
क्योंकि सब लोग इन कपोल-कल्पित cheating धर्मों में फँसे हुए हैं, इसलिए भगवान स्वयं आकर यथार्थ धर्म सिखाते हैं। भगवान किसलिए आते हैं?
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम् ।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.7-8)

भगवान तो आते हैं वास्तविक धर्म का संस्थापन करने के लिए। यह भगवान के अवतार का उद्देश्य होता है कि वे धर्म की स्थापना करें। और फिर अंत में वही भगवान कहते हैं: "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। यदि भगवान धर्म की स्थापना करने आए हैं, तो फिर सब धर्मों को त्यागने के लिए क्यों कहते हैं? इस पर विचार करना चाहिए। त्यागने के लिए इसलिए कहते हैं क्योंकि वे सब वास्तव में धर्म हैं ही नहीं, वे सब छलना और cheating हैं। जिस धर्म में भगवद्-भक्ति नहीं सिखाई जाती, भगवान के चरणों में शरणागति नहीं सिखाई जाती, वह कैतव धर्म है। इसलिए श्रीमद्भागवतम् स्पष्ट रूप से कहती है: "स वै पुंसां परो धर्मो"—वही सर्वश्रेष्ठ और उत्कृष्ट धर्म है जिसके द्वारा भगवान की विशुद्ध भक्ति प्राप्त हो।

"यतो भक्तिरधोक्षजे"—भक्ति का अर्थ होता है भगवान और भक्त, और दोनों के बीच में जो दिव्य आदान-प्रदान और सेवा का संबंध है, उसका नाम है भक्ति। सब एकाकार नहीं है; भगवान भी नित्य विद्यमान हैं, भक्त भी नित्य विद्यमान है, और भक्त द्वारा भगवान की जो नित्य प्रीतिमयी सेवा है, उसी का नाम भक्ति है।

और वह भक्ति कैसी होनी चाहिए? 'अहैतुकी'—बिना किसी सांसारिक कारण या स्वार्थ के। "भगवान हमको कुछ धन देंगे, भगवान से कुछ भौतिक वस्तु प्राप्त करनी है इसलिए मैं भक्ति कर रहा हूँ"—वह शुद्ध भक्ति नहीं है। भक्ति अहैतुकी होनी चाहिए—भगवान हमारे परम प्रभु हैं और हमारा एकमात्र स्वाभाविक कर्तव्य भगवान की सेवा करना है।

जैसे यह अँगुली हमारा अंग है; यदि हम दस दिन इसको अलग से खाने को न भी दें, फिर भी यह शरीर की सेवा करेगी। अँगुली यह नहीं कहेगी कि "आप मुझे खाने को नहीं देते, इसलिए मैं आपकी सेवा नहीं करूँगी।" भगवान चाहे जिस अवस्था में हमें रखें, हमारा नित्य कर्तव्य है उनकी सेवा करना। जैसा महाराज कुलशेखर अपने 'मुकुन्दमाला-स्तोत्र' में प्रार्थना करते हैं:
"यद् यद् भव्यं भवतु भगवन् पूर्व-कर्मानुरूपं..."
हमारे पूर्व-कर्मों के अनुसार जो कुछ सुख या दुःख प्रारब्धवश होना हो, वह भले ही हो, उसकी हम परवाह नहीं करते; परंतु हमारी एकमात्र अभिलाषा यही है कि हमारा मन सदा-सर्वदा आपके श्रीचरणों में अनुरक्त रहे।

श्री चैतन्य महाप्रभु भी यही सिखाते हैं:
न धनं न जनं न सुन्दरीं कवितां वा जगदीश कामये ।
मम जन्मनि जन्मनीश्वरे भवताद् भक्तिरहैतुकी त्वयि ॥
(शिक्षाष्टक 4)

यह जो लोग आरती गाते हैं—"धन घर आवे, सुख संपत्ति घर आवे, जय जगदीश हरे"—जगदीश का भजन करके हमारे घर में धन आ जाए, यह शुद्ध भक्ति नहीं है। क्योंकि "मैं भगवान की आरती कर रहा हूँ, भजन कर रहा हूँ, कीर्तन कर रहा हूँ, इसलिए मुझे धन प्राप्त हो"—यह सकाम भक्ति है, विद्धा भक्ति है, इसमें कर्म और ज्ञान की मिलावट है।

कर्मी लोग जैसे किसी भी कार्य में केवल भौतिक लाभ (profit) देखते हैं; इतना जो दिन-रात परिश्रम करते हैं, यदि उसमें कोई लाभ न हो तो वे कहते हैं कि व्यर्थ का काम क्यों करें? परंतु भक्ति किसी भौतिक profit के लिए नहीं की जाती। "हमारा बैंक-बैलेंस अभी दस हज़ार है, तो भगवान की भक्ति करके हम उसे एक लाख या दस लाख बना लें"—इसको भक्ति नहीं कहा जाता।

यद्यपि इसे भजन की श्रेणी में लिया गया है:
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.16)
यह जो भजन है, यह सुकृतिमान लोग करते हैं, पुण्यवान लोग करते हैं। भगवान के मंदिर में जाते हैं कुछ माँगने के लिए, उसको भी शास्त्र ने 'सुकृती' (पुण्यवान) कहा है। क्यों? क्योंकि जो घोर पापी और नास्तिक हैं, वे तो भगवान के पास जाते ही नहीं! इसलिए यदि कोई सांसारिक कामना लेकर भी भगवान के पास जाता है, तो वह भी पुण्यवान बन जाता है: "शृण्वतां स्वकथाः कृष्णः पुण्यश्रवणकीर्तनः"। किसी भी भाव से भगवान के नाम, गुण, रूप और लीला का श्रवण-कीर्तन किया जाए, तो वह परम पुण्यमय होता है।

बाकी शुद्ध भक्त के लिए पाप और पुण्य दोनों ही बंधन के कारण हैं। पाप भी लोहे की बेड़ी है, और पुण्य सोने की बेड़ी है। इसलिए भगवद्-भक्त पाप और पुण्य दोनों के परे स्थित होता है। उसका एकमात्र उद्देश्य केवल भगवान को संतुष्ट करना है। उसमें सांसारिक दृष्टि से कोई पाप कहे या पुण्य कहे, उसे इसकी कोई परवाह नहीं होती।

इसलिए शुद्ध भक्ति का लक्षण श्रील रूप गोस्वामी जी ने बताया है:
अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम् ।
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ॥
(भक्तिरसामृतसिंधु 1.1.11)
समस्त अन्य सांसारिक अभिलाषाओं से शून्य—बिल्कुल शून्य! ज्ञानी लोगों का विचार होता है निर्भेद-ब्रह्मज्ञान—भगवान में लीन हो जाना, एक हो जाना। और कर्मी लोगों का विचार होता है कि हमें भौतिक सुख मिले, स्वर्ग की प्राप्ति हो, अच्छा खाने-पीने और भोगने को मिले। परंतु उत्तमा भक्ति का विचार ज्ञान और कर्म के समस्त फलों से सर्वथा अतीत है।

जैसे श्रीधर स्वामी श्रीमद्भागवतम् के प्रथम श्लोक की टीका में कहते हैं:
"अत्र श्रीमद्भागवते मोक्ष-वाञ्छा-अभिसन्धि-पर्यन्तं निरस्तम्।"
यहाँ श्रीमद्भागवतम् में मोक्ष की अभिलाषा को भी कैतव मानकर पूरी तरह से निरस्त कर दिया गया है।

"अप्रतिहता"—इस प्रकार की जो अहैतुकी भक्ति है, वह कभी किसी भौतिक परिस्थिति से रुक नहीं सकती (अप्रतिहत रहती है)। कोई कहे कि "साहब, हम तो बहुत गरीब हैं, हम कैसे भक्ति करें? अभी तो पेट भरने के लिए धंधा कर रहे हैं।" नहीं, अप्रतिहता! चाहे आप गरीब हों, चाहे अमीर हों, चाहे मूर्ख हों, चाहे विद्वान हों, चाहे नीच कुल में हों, चाहे पापी हों—यह भक्ति सबके लिए खुली है। इसके मार्ग में कोई भौतिक बाधा नहीं आ सकती। केवल एक ही चीज़ की आवश्यकता है—दृढ़ निश्चय कि "मैं भगवान के चरणों में अपने आपको समर्पित करूँगा।"

यह बात नहीं है कि "मैं तो मूर्ख हूँ, अभी वेदान्त पढ़ूँगा, बहुत बड़ा ज्ञानी बनूँगा, तब जाकर भगवद्-भक्ति करूँगा"; अथवा "अभी तो मैं बहुत निर्धन हूँ, पहले दो-चार लाख कमा लूँ, फिर भक्ति करूँगा"; या "अभी तो मैं छोटा बालक हूँ, अभी मैं कैसे भक्ति कर सकता हूँ?" यह बालक भी कर सकता है! देखिए, यह एक छोटी बालिका है, चार वर्ष की आयु है, और हरे कृष्ण कीर्तन में आनंद से नाच रही है! अप्रतिहता। यह बात नहीं है कि यह छोटी बालिका है तो पहले इसको बहुत ज्ञान लाभ करना पड़ेगा, तब यह भक्ति करेगी—नहीं, तत्काल!

क्योंकि इस संसार में बालक और वृद्ध का क्या विचार? यहाँ सभी वृद्ध हैं और सभी बालक हैं। कोई बालक है, तो क्या कोई गारंटी है कि वह कल तक जिएगा? जब तक जीवन की श्वास चल रही है, प्रह्लाद महाराज उपदेश देते हैं:
कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह ।
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.6.1)
यह जो मनुष्य जीवन है, एक तो अत्यंत दुर्लभ है, बहुत कठिनाई से मिला है। चौरासी लाख योनियों में निरंतर भटकते-भटकते... यदि कोई एक बार वृक्ष बन गया, तो दस हज़ार वर्ष तक एक ही स्थान पर खड़ा रहकर कष्ट झेलना पड़ता है। हमने अमेरिका के जंगलों में देखा, वहाँ परिचय दिया गया कि यह वृक्ष सात हज़ार वर्ष पुराना है और अभी भी जीवित है, शायद और सात हज़ार वर्ष तक खड़ा रहेगा। ऐसे लंबा-चौड़ा जीवन मिलने से क्या लाभ है?

बड़े-बड़े वैज्ञानिक लोग चाहते हैं कि मनुष्य की आयु को किसी तरह और बढ़ा दिया जाए। परंतु बिना भगवद्-भक्ति के केवल ज़िंदा रहने से क्या लाभ? ऐसे तो वृक्ष भी हज़ारों वर्ष जीवित रहता है! मनुष्य चाहे दो ही वर्ष जिए, परंतु यदि वह भगवद्-भक्ति प्राप्त कर ले, तो उसका जीवन सफल हो जाता है। अन्यथा वृक्ष के समान दस हज़ार वर्ष तक खड़े रहने से क्या लाभ? शास्त्र में इसका बड़ा सुंदर विचार किया गया है:
तरवः किं न जीवन्ति भस्त्राः किं न श्वसन्त्युत ।
न खादन्ति न मेहन्ति किं ग्रामपशवोऽपरे ॥
(श्रीमद्भागवतम् 2.3.18)
क्या वृक्ष जीवित नहीं रहते? क्या लुहार की धौंकनी श्वास नहीं लेती? और क्या ग्राम के पशु खाते और मैथुन नहीं करते? तो यदि मनुष्य केवल जीने, खाने और मैथुन करने में ही लगा रहा, तो वह वृक्ष और पशु के समान ही है।

इसलिए मनुष्य जीवन का एकमात्र कर्तव्य है: "स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे"।

भगवान का एक नाम है 'अधोक्षज'। अधः-कृतम् अक्षजं ज्ञानं येन सः अधोक्षजः। हमारी चर्म-इन्द्रियों (अक्ष) से जो सांसारिक ज्ञान उत्पन्न होता है, भगवान उससे सर्वथा परे हैं। ज्ञान के कई स्तर होते हैं—प्रत्यक्ष, परोक्ष, अपरोक्ष, अधोक्षज और अप्रकृत। साधारण मनुष्य का ज्ञान केवल 'प्रत्यक्ष' तक सीमित होता है—जो कुछ सामने आँखों से दिखाई देता है, केवल उसी को सत्य मानता है और बाकी सबको नकार देता है। परंतु यह प्रत्यक्ष ज्ञान सर्वथा अपूर्ण और भ्रमपूर्ण है। हमारे प्रपितामह (परदादा) का कोई नाम था, हमने उन्हें अपनी आँखों से कभी नहीं देखा, तो क्या इसका यह अर्थ है कि वे कभी थे ही नहीं?

इसी प्रकार यदि हम आज अपनी इन चर्म-चक्षुओं से भगवान को नहीं देख पा रहे हैं, तो इसका अर्थ यह नहीं है कि भगवान नहीं हैं। लोग कहते हैं: "हमें भगवान को दिखाओ!" अरे, तुम भगवान को इन मलिन आँखों से कैसे देखोगे? पहले अपनी आँखें तो बनाओ!
प्रेमाञ्जनच्छुरितभक्तिविलोचनेन
सन्तः सदैव हृदयेषु विलोकयन्ति ।
यं श्यामसुन्दरमचिन्त्यगुणस्वरूपं
गोविन्दमादिपुरुषं तमparam भजामि ॥
(ब्रह्मसंहिता 5.38)

पहले भगवद्-प्रेम प्राप्त करो। किस प्रकार भगवद्-प्रेम प्राप्त करना होता है, उसको शास्त्र और गुरु के सान्निध्य में सीखो। जब आँखों में प्रेम का अंजन लगेगा, तब चौबीसों घंटे भगवान का ही दर्शन होगा! वह आँख बनाने का तरीका क्या है?
सर्वोपाधिविनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम् ।
हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते ॥
(भक्तिरसामृतसिंधु 1.1.12)

अभी हमारी आँखों पर उपाधियों का पर्दा पड़ा है—"यह मेरा देश है, यह मेरा परिवार है, यह मेरा शरीर है, यह मेरा पुत्र है, यह मेरा धन है।" जब यह उपाधियाँ दूर होंगी, तब दिखाई देगा कि यह शरीर भी भगवान का है, यह धन भी भगवान का है, और यह सारा संसार भगवान का ही है।

जैसे भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में सिखाते हैं:
"रसोऽहमप्सु कौन्तेय प्रभास्मि शशिसूर्ययोः" (श्रीमद् भगवद्गीता 7.8)।
कि हे कौन्तेय! जल में जो रस (स्वाद) है, वह मैं हूँ। इसी प्रकार देखना प्रारंभ करो। जल तो प्रत्येक व्यक्ति पीता है। जब भी जल पियो और उसकी तृप्ति का आस्वादन करो, उसी क्षण भगवान का स्मरण करो कि "यह जो जल की प्यास बुझाने वाली शक्ति और रस है, यही साक्षात भगवान श्री कृष्ण हैं।" शास्त्र के निर्देशानुसार इस प्रकार देखना प्रारंभ करो। सांसारिक दृष्टि वाला देखता है कि यह हमारे देश का पानी है, परंतु भगवद्-भक्त देखता है कि इस जल का रस साक्षात भगवान हैं—इतना ही अंतर है।

यही भगवद्-भक्ति है। सब समय भगवान का स्मरण, श्रवण और कीर्तन करना:
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम् ।
अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.5.23)

भगवान ने नवधा भक्ति की इतनी सुंदर सुविधाएं दी हैं। चाहे इन नौ अंगों का एक साथ पालन करो, या इनमें से किसी एक को ही पूर्ण निष्ठा से पकड़ लो। जैसे हमारे इस केंद्र में श्रवण भी होता है, कीर्तन भी होता है, विग्रहों का अर्चन भी होता है, दास्य भी होता है—सब कुछ उपस्थित है। यदि कोई सब न भी कर सके, तो कम से कम एक अंग का तो आश्रय ले! जैसे केवल श्रवण करना। हम संसार भर में इतने केंद्र किसलिए खोल रहे हैं? ताकि साधारण जन को भगवद्-कथा के श्रवण का सुयोग प्राप्त हो सके। केवल यहाँ आकर शांति से श्रवण करते-करते ही उसका उद्धार हो जाएगा।

श्रीविष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद् वैयासकिः कीर्तने
प्रह्लादः स्मरणे तदङ्घ्रिभजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने ।
अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपिपतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनः
सर्वस्वात्मनिवेदने बलिरभूत् कृष्णाप्तिरेषां परा ॥
(भक्तिरसामृतसिंधु 1.2.265)

महाराज परीक्षित को जब सात दिन का समय मिला, जब ब्राह्मण बालक श्रृंगी ने उन्हें शाप दे दिया कि सातवें दिन तक्षक सर्प के डसने से तुम्हारी मृत्यु होगी, तो उस समय पृथ्वी के समस्त बड़े-बड़े ऋषि-मुनि और देवता वहाँ एकत्र हो गए। उसी समय श्रील शुकदेव गोस्वामी भी पधारे। परीक्षित महाराज ने पूछा कि "अब मेरे अंतिम समय में मुझे क्या करना चाहिए?" किसी ने कहा योग करो, किसी ने कहा तपस्या करो, किसी ने कहा कर्मकांड के यज्ञ करो। परंतु शुकदेव गोस्वामी ने कहा: "महाराज! आप केवल भगवान श्रीकृष्ण की पावन कथाओं का श्रवण कीजिए, श्रीमद्भागवतम् सुनिए।" सब ऋषियों ने इसका अनुमोदन किया। और परीक्षित महाराज ने सात दिन तक अनशन व्रत रखकर केवल भागवत का श्रवण किया, और वे सीधे भगवद्धाम को प्राप्त हो गए! और शुकदेव गोस्वामी केवल कीर्तन करके मुक्त हो गए।

'कीर्तन' का अर्थ केवल झांझ और मृदंग बजाना ही नहीं है; भगवान के दिव्य नाम, रूप, गुण और लीलाओं का जो प्रवचन और व्याख्यान होता है, वह भी कीर्तन ही है। परंतु वह कीर्तन किसका होना चाहिए? "श्रवणं कीर्तनं विष्णोः"—केवल भगवान विष्णु का! हम लोग संसार की राजनीतिक सभाओं में जाकर नेताओं के भाषण सुनते हैं, वह श्रवण नहीं है। यूनाइटेड नेशंस (United Nations) में पिछले बीस-पच्चीस वर्षों से केवल व्यर्थ का श्रवण-कीर्तन चल रहा है, शांति स्थापित करने के नाम पर केवल वाक्युद्ध चल रहा है; उस सांसारिक श्रवण-कीर्तन से कभी संसार की अशांति दूर नहीं हो सकती। जब तक भगवान विष्णु का संकीर्तन नहीं होगा, तब तक इस संसार की दावाग्नि कभी शांत नहीं हो सकती।

यह सब शास्त्रीय विचार है, महान आचार्यों का विचार है। साधारण बद्धजीव में चार मूलभूत दोष होते हैं: भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा (धोखा देने की प्रवृत्ति), और करणापाटव (इन्द्रियों की अपूर्णता)। परंतु शास्त्र अपौरुषेय हैं, वे मुक्त महापुरुषों और साक्षात भगवान की वाणी हैं, जिनमें ये चार दोष लेशमात्र भी नहीं होते।

इसीलिए पाँच हज़ार वर्ष पूर्व जो श्रीमद्भागवतम् लिखी गई थी और भगवान ने जो श्रीमद् भगवद्गीता कही थी, वह आज भी उतनी ही नूतन और प्रामाणिक है। श्रीमद्भागवतम् में पाँच हज़ार वर्ष पूर्व ही भगवान बुद्ध के प्राकट्य की भविष्यवाणी लिख दी गई थी:
ततः कलौ संप्रवृत्ते संमोहाय सुरद्विषाम् ।
बुद्धो नाम्नाञ्जनसुतः कीकटेषु भविष्यति ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.3.24)
उस समय लिखा था 'भविष्यति'—कि भविष्य में मगध (बिहार) में बुद्धदेव का अवतार होगा। और बुद्धदेव का प्राकट्य आज से ढाई हज़ार वर्ष पूर्व हुआ। इसका नाम शास्त्र है! जो भूत, भविष्य और वर्तमान तीनों कालों के ज्ञाता (त्रिकालज्ञ) हैं।

भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में अर्जुन से कहते हैं:
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः ।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 2.12)
कि हे अर्जुन! ऐसा कोई समय नहीं था जब मैं, तुम अथवा ये समस्त राजागण नहीं थे; और न ही भविष्य में कभी ऐसा होगा कि हम सब नहीं रहेंगे। हम भूतकाल में भी नित्य व्यक्ति थे, वर्तमान में भी हैं, और भविष्य में भी नित्य रहेंगे। जो इस प्रकार भूत, भविष्य और वर्तमान को यथार्थ रूप से जानते हैं, उन्हीं से हमें ज्ञान ग्रहण करना चाहिए। अन्यथा एक अंधा दूसरे अंधे को मार्ग दिखाएगा, तो दोनों ही गड्ढे में गिर पड़ेंगे।

जीव चौरासी लाख योनियों में भटकता है। जलचर नौ लाख, स्थावर (पेड़-पौधे) बीस लाख, कीड़े-मकोड़े ग्यारह लाख, पक्षी दस लाख, पशु तीस लाख, और मनुष्य केवल चार लाख योनियों में हैं। तो मनुष्य योनि बहुत ही दुर्लभ है। और जितने भी प्राणी हैं—जल से लेकर आकाश तक—सबको भोजन कौन प्रदान करता है? भगवान प्रदान करते हैं।
नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान् ।
(कठ उपनिषद् 2.2.13)
भगवान भी नित्य चेतन हैं, और हम जीव भी नित्य चेतन हैं। परंतु अंतर क्या है? भगवान 'एक' हैं जो अनंत जीवों का भरण-पोषण करते हैं; और हम जीव अपने पेट के लिए दर-दर भटकते हैं! और कुछ मूर्ख कहते हैं कि "मैं ही भगवान हूँ!" अरे, तुम अपने परिवार का तो भरण-पोषण कर नहीं सकते, संन्यास लेकर भाग जाते हो, और दावा करते हो कि तुम भगवान हो!

भगवान तो समस्त चौरासी लाख योनियों के जीवों के आहार, निद्रा, भय और मैथुन की व्यवस्था करते हैं:
एतद्योनीनि भूतानि सर्वाणीत्युपधारय ।
अहं कृत्स्नस्य जगतः प्रभवः प्रलयस्तथा ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.6)
भगवान समस्त चराचर जगत की सृष्टि, स्थिति और प्रलय के मूल कारण हैं। इसलिए भगवान का एक नाम है 'सर्वकारणकारणम्'।

साधारणतः सृष्टि करते हैं ब्रह्मा जी (रजोगुण के अधिष्ठाता), पालन करते हैं भगवान विष्णु (सत्त्वगुण के अधिष्ठाता), और संहार करते हैं देवाधिदेव महादेव शिव जी (तमोगुण के अधिष्ठाता)। जैसे किसी राज्य में अलग-अलग विभागों के संचालक होते हैं, वैसे ही इस भौतिक ब्रह्मांड रूपी भवन को बनाने वाले ब्रह्मा जी हैं, इसका पालन करने वाले विष्णु हैं, और इसका विध्वंस करने वाले संहारकर्ता शिव जी हैं।

यह चक्र निरंतर चलता रहता है—भूत्वा भूत्वा प्रलीयते। यह भौतिक शरीर भी एक घर के समान है। हम एक मकान में रहने गए, कुछ दिन रहे, फिर नोटिस आया कि मकान खाली करो, इसे तोड़ा जा रहा है। फिर दूसरे मकान में गए, वह भी टूट गया। तो बुद्धिमान मनुष्य विचार करता है कि कोई ऐसा अपना नित्य धाम बनाया जाए जो कभी नष्ट न हो। इसी प्रकार यह जो चौरासी लाख योनियों में बार-बार जन्म लेना और मरना पड़ता है, इसको कैसे समाप्त किया जाए—यह मनुष्य जीवन का मुख्य विचार होना चाहिए।

इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु उपदेश देते हैं:
ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव ।
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज ॥
(चैतन्य-चरितामृत, मध्य 19.151)
इस प्रकार चौरासी लाख योनियों में भटकते-भटकते जब कोई जीव अत्यंत भाग्यवान होता है, तो भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से उसे प्रामाणिक गुरु मिलते हैं, और गुरु की कृपा से वह भगवान श्रीकृष्ण के चरणों को प्राप्त करता है। दोनों की कृपा अनिवार्य है—गुरु-कृष्ण-प्रसादे। तब जाकर यह जन्म-मृत्यु का आवागमन समाप्त होता है।

भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं:
मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनञ्जय ।
मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.7)
कि हे धनंजय! मुझसे श्रेष्ठ अन्य कोई भी परम तत्व नहीं है। भगवान के समान भी कोई नहीं है, और भगवान से ऊपर भी कोई नहीं है—इसलिए भगवान का एक नाम है 'असम-ऊर्ध्व'। जब भगवान ने अर्जुन को अपना विश्वरूप दिखाया था, तो अर्जुन ने भी यही स्तुति की थी कि आपके समान भी कोई नहीं है, तो आपसे श्रेष्ठ भला कौन हो सकता है?

तो जो बुद्धिमान है, वह केवल भगवान श्री कृष्ण के ही चरण-कमलों को दृढ़ता से पकड़ लेता है। और जो भगवान की शरण ग्रहण कर लेता है, वह तत्काल माया के बंधन से मुक्त हो जाता है।

बाकी जो अल्पज्ञानी हैं, वे कहते हैं कि परम तत्व तो केवल निराकार ब्रह्म है, और वह जब सगुण रूप धारण करता है तब भगवान बनता है। ऐसे लोगों को भगवान स्वयं श्रीमद् भगवद्गीता में 'अबुद्धयः' (बुद्धिहीन) कहते हैं:
अव्यक्तं व्यक्तिमापन्नं मन्यन्ते मामबुद्धयः ।
परं भावमजानन्तो ममाव्ययमनुत्तमम् ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 7.24)
जिनके पास वास्तविक ज्ञान का अभाव है (poor fund of knowledge), वे सोचते हैं कि भगवान मूलतः निराकार हैं और अब साकार होकर आए हैं।

शास्त्रों में परम सत्य की तीन अवस्थाएं बताई गई हैं:
वदन्ति तत्तत्त्वविदस्तत्त्वं यज्ज्ञानमद्वयम् ।
ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥
(श्रीमद्भागवतम् 1.2.11)
अद्वय ज्ञान तत्व एक ही है, परंतु अपनी-अपनी अनुभूति के अनुसार साधक उसे निराकार ब्रह्म, अंतर्यामी परमात्मा अथवा साक्षात पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान के रूप में अनुभव करते हैं।

इसको सूर्य के दृष्टांत से सहज ही समझा जा सकता है। जैसे आकाश में सूर्य का प्रकाश (धूप) है, फिर सूर्य का गोला है, और सूर्य-लोक के भीतर सूर्य के अधिष्ठाता देवता सूर्यनारायण (विवस्वान्) हैं। अब बताइए, सूर्य का प्रकाश बड़ा है या सूर्यनारायण बड़े हैं? स्वाभाविक रूप से सूर्यनारायण ही मूल स्रोत हैं जहाँ से समस्त प्रकाश निकलता है। इसी प्रकार भगवान के श्रीअंगों की जो असीम ज्योति है, उसी का नाम 'ब्रह्मज्योति' है।
"ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाहम्" (श्रीमद् भगवद्गीता 14.27)—भगवान कहते हैं कि उस निराकार ब्रह्म की प्रतिष्ठा (आधार) भी मैं ही हूँ।
यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि-
कोactiveष्वशेषवसुधादि विभूतिभिन्नम् ।
तद् ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेषभूतं
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि ॥
(ब्रह्मसंहिता 5.40)

बाकी जो मूर्ख लोग भगवान को साधारण मनुष्य समझते हैं, उनके लिए भगवान कहते हैं: "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्" (श्रीमद् भगवद्गीता 9.11)। क्योंकि भगवान अपने भक्तों पर कृपा करने के लिए मनुष्य के समान लीला करते हैं। परंतु मनुष्य कभी अपनी कनिष्ठिका अँगुली पर गोवर्धन पर्वत नहीं उठा सकता! भगवान ने सात वर्ष की बाल-अवस्था में विशाल गोवर्धन पर्वत को सात दिनों तक अपनी उँगली पर उठाए रखा, और द्वारका में 16,108 रानियों के साथ एक ही समय में भिन्न-भिन्न महलों में निवास किया—क्या यह किसी साधारण मनुष्य से संभव है?

भगवान कहते हैं:
जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः ।
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 4.9)
जो भगवान के इन दिव्य जन्म और कर्मों को तत्वतः जान लेता है, वह इस देह को त्यागने के बाद फिर इस संसार में जन्म नहीं लेता, बल्कि सीधे भगवान के नित्य गोलोक-धाम को प्राप्त होता है।

"मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव"—जैसे मणियों की माला में एक ही धागा समस्त मणियों को पिरोए रखता है, वैसे ही संपूर्ण ब्रह्मांड भगवान के आश्रित है। मूल पुरुष केवल श्री कृष्ण ही हैं: "गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि"।

हमारा यह जो गौड़ीय संप्रदाय है, यह प्रामाणिक ब्रह्म-माधव-गौड़ीय संप्रदाय है। ब्रह्मा जी से मध्वाचार्य, मध्वाचार्य से परंपरा में माधवेन्द्र पुरी, उनके शिष्य ईश्वर पुरी, और उनके शिष्य साक्षात श्री चैतन्य महाप्रभु। और महाप्रभु की शिष्य-परंपरा में हम लोग आते हैं।
"एवं परंपराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः" (श्रीमद् भगवद्गीता 4.2)।
भगवद्-ज्ञान परंपरा के माध्यम से ही प्राप्त किया जाना चाहिए, अपने मनमाने मत से नहीं। आजकल लोग कहते हैं: "हमारे मत में ऐसा है!" अरे, तुम्हारे मत का क्या मूल्य है? कोई भी प्रामाणिक आचार्य मनमाना मत नहीं चलाता। जो विचार श्री चैतन्य महाप्रभु ने दिया, जो विचार रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य और अर्जुन ने स्वीकार किया, वही वास्तविक सिद्धांत है: "कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्"।

अंत में भगवान साधारण जनों को समझाने के लिए बताते हैं कि यदि तुम सीधे भगवान के द्विभुज मुरलीधर रूप का ध्यान नहीं कर सकते, तो संसार की प्रत्येक वस्तु में भगवान की अनुभूति कैसे करो। भगवान कहते हैं: "रसोऽहमप्सु कौन्तेय"—जल में जो रस और तृप्ति है, वह मैं हूँ; चंद्र और सूर्य का जो दिव्य प्रकाश है, वह मैं हूँ।

वेद कहते हैं: "रसो वै सः"। भगवान अखिल रसामृत-सिंधु हैं। जब भी आप जल पिएं, उस समय स्मरण कीजिए कि "इस जल की प्यास बुझाने वाला जो तृप्ति-दायक रस है, वह साक्षात मेरे प्रभु श्री कृष्ण हैं।" इस प्रकार जल पीते हुए भी आपका भगवद्-स्मरण हो जाएगा। जब सूर्य और चंद्रमा का प्रकाश देखें, तो स्मरण करें कि यह मेरे प्रभु का ही तेज है। यदि इस प्रकार अभ्यास करेंगे, तो सहज ही आपका चित्त शुद्ध हो जाएगा और आप परम गति को प्राप्त करेंगे।

बहुत-बहुत धन्यवाद। हरे कृष्ण!
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥