Now, son of Pritha, Arjuna, how by practicing yoga in full consciousness, with my mind attached to me, you can know me and all free from doubt. Which language I shall use? English or Hindi? If I speak in Hindi... but if I speak Hindi, they will not understand. As you say, majority... So shall I speak in English? नहीं, हमारा नहीं, हम तो आप लोग के सेवक हैं। हम इसीलिए तो आपका परमिशन है। Thank you, sir. They want me to speak in Hindi. You have got permission partially. नहीं, एक बात है ना, ये लोग बहुत दूर से आए हैं सुनने के लिए, ये भी एक बात है ना। तो आप आपकी इंग्लिश नहीं दो, तो shall I speak in Hindi? Both, little.
श्रीभगवानुवाच। भग... पहले थोड़ा हिंदी में ही बोल रहा हूं, then English. ऐसा ये 'भग', ये शब्द का अर्थ होता है opulence. अब देखिए, हिंदी-इंग्लिश में, क्योंकि ज्यादा इंग्लिश में ही बोलने में अभ्यास है। बाबा, आप लोग समझते हैं जैसा कोई व्यक्ति को कहा जाता है भाग्यवान। भाग्यवान, ये 'भाग्य' शब्द जो है, यह 'भग' शब्द से आया। 'भग' शब्द का जो भाव है, उसको भाग्य कहा जाता है। भावार्थ... ये संस्कृत व्याकरण का एक वृत्त है। So, भगवान जो सबसे बड़ा भाग्यवान है, उसको भगवान कहा जाता है। Six opulences, ऐश्वर्य पूर्ण। भगवान... 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः। ज्ञानवैराग्ययोश्चैव षण्णां भग इतीङ्गना॥' ये छह प्रकार का भग, ऐश्वर्य जिसके पास है, वो भगवान है। आजकल जैसे भगवान रास्ता-रास्ता में ऐसा घूमता है, वो भगवान नहीं। असल भगवान, असल भगवान जो है, वो कृष्ण—'कृष्णस्तु भगवान स्वयं'। भगवान... किसी के पास कुछ ऐश्वर्य है, उसको भगवान आप कह सकते हैं, बाकी जो असल भगवान है, वह भगवान कृष्ण। यह शास्त्र का निर्देश है।
कभी-कभी भगवान शिव जी को भी भगवान कहा जाता है। नारद जी को कभी-कभी भगवान बताया है। ब्रह्मा जी को भी बताया है। बाकी भगवान और God... God का अर्थ होता है ईश्वर, जो हुकुम देने वाला ईश्वर। तो शास्त्र में यह भी बताया है: 'ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः'। हां, ये जो भगवान कृष्ण हैं, यह जो ईश्वर हैं, इनके सामने और जितने ईश्वर हैं... 'शिव-विरिञ्चि-नुतम्'। हां, भगवान शिव हैं, भगवान ब्रह्मा जी हैं और सब देवता हैं, वो भी सब नमस्कार करते हैं—'शिव-विरिञ्चि-नुतम्'। इसलिए 'भगवान' शब्द एकमात्र कृष्ण में ही लगाया जा सकता है।
व्यासदेव जो श्रीमद् भगवद्गीता लिख रहे हैं, वो 'श्रीभगवानुवाच'—यह नहीं बताया जो 'कृष्ण उवाच' या 'भगवान कृष्ण उवाच'। 'भगवान कृष्ण उवाच' कहने से और सब भगवान हैं और कृष्ण भी भगवान हैं, नहीं—साक्षात 'भगवानुवाच'। साक्षात 'ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्वकारणकारणम्॥' भगवान कृष्ण जो हैं, सबका कारण हैं, देवता लोगों का भी कारण हैं। ये श्रीमद् भगवद्गीता में बताया: 'अहमादिर्हि देवानाम'। देवानाम... देवता लोग ब्रह्मा जी से देवता सब शुरू होते हैं। ब्रह्मा जी से [गला साफ़ करने की आवाज़] महादेव जी पैदा हुए। तो और जितने भगवान हैं, देवता हैं, सब उसका आदि जो है, वो कृष्ण हैं। 'गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि'। ये श्रीमद् भगवद्गीता में अर्जुन जब श्रीमद् भगवद्गीता ठीक-ठीक समझा, तो कृष्ण को बताया कि 'परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥'—आदि पुरुष। तो इसलिए इधर बताया है कि 'भगवानुवाच', 'कृष्ण उवाच' नहीं होता।
भगवान, भगवान का अर्थ होता है जो ऐश्वर्य जिसके पास संपूर्ण धन-संपत्ति है। आपके पास होगा दो करोड़ और किसी के पास ₹1 करोड़ होगा और किसी के पास और कुछ और कुछ, ऐसा बढ़ते जाइए। बाकी कोई नहीं बता सकते हैं कि हमारे पास सब धन है, यह कोई नहीं बता सकता। इसीलिए शास्त्र में कहते हैं: 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य'। समग्र का जो मालिक है, वो भगवान, वो असल भगवान। खाली ऐश्वर्य नहीं—'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य'। वीर्य यानी बल। भगवान कृष्ण जब उपस्थित थे, बड़े-बड़े असुरों से लड़ाई हुई, बाकी भगवान को कोई दबा नहीं सका बल से। 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः'। और उनका यश, भगवान कृष्ण से और किसी का यश आगे बढ़ा नहीं। अभी देखिए, 5000 वर्ष पहले भगवान कृष्ण इधर अवतीर्ण हुए इस भारतवर्ष में, उनका यश अभी तक चल रहा है। यह श्रीमद् भगवद्गीता है, देखिए, सारा दुनिया में सब कोई पढ़ता है। यश, भगवान कृष्ण, Krishna Consciousness Movement चल रहा है। तो उनका जो यश है, उनसे बढ़कर के यश और किसी का है? आप लोग तो विचार करते हैं।
इसलिए भगवान... 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः'। श्री यानी सौंदर्य। भगवान कृष्ण कितने सुंदर हैं! 'अट्रैक्ट', कृष्ण का अर्थ होता है 'अट्रैक्ट'—सबका आकर्षण करते हैं। सौंदर्य, beautiful, most beautiful Krishna. Have you seen Krishna's picture? वो इंग्लिश आ जाता है। भगवान कृष्ण, कभी उनका तस्वीर आप लोग नहीं देखा होगा कि भगवान बुड्ढा हो गया। नहीं, सब समय नवयुवक। सौंदर्य, ब्रह्मसंहिता में है भगवान के विषय में: 'अद्वैतमच्युतमनादिमनन्तरूपम् आद्यं पुराणपुरुषं नवयौवनं च'। पहले तो भगवान ही होते हैं ना, उससे सब कुछ हुआ है। 'जन्माद्यस्य यतः', सब कोई का जन्म भगवान से हुआ, वेदांत सूत्र में ऐसा ही बताते हैं: 'जन्माद्यस्य यतः'। तो आदि पुरुष भगवान हैं, कृष्ण। हां, सबसे बुड्ढा होना चाहिए, बाकी नहीं, नवयौवन, सब समय नवयौवन। कृष्ण का यह जो तस्वीर है, कुरुक्षेत्र में जब लड़ाई हुई थी, उस समय उनका ग्रेट-ग्रैंडसन (प्रपौत्र) था, उनका चेहरा देखिए, कोई 20 बरस का एक जवान लड़का। इसलिए उनका सौंदर्य... तो 'ऐश्वर्यस्य समग्रस्य वीर्यस्य यशसः श्रियः ज्ञान...' और ज्ञान भी, उनसे बढ़कर ज्ञान किसी का है नहीं। यह जो श्रीमद् भगवद्गीता ज्ञान का पुस्तक है, जैसा भगवान बताए हैं, ऐसी दूसरी किताब और है नहीं दुनिया में आज तक।
और वैराग्य, भगवान का सब ऐश्वर्य होते हुए भी, जैसा यह material, भौतिक जगत जो है, यह भगवान का एक अंश है—'एकांशेन स्थितो जगत्'। बाकी यह भौतिक जगत में भगवान नहीं रहते हैं, भगवान रहते हैं परस्मात् भाव, अप्राकृत जगत में रहते हैं। जैसा कि मालिक जिसका बहुत फैक्ट्री है, तो इसका मतलब नहीं है वो मालिक फैक्ट्री में रहता है, वह अपना जगह में रहता है। गवर्नर शासन करता है, बाकी अपना मकान में रहता है। इसी प्रकार कृष्ण, कृष्ण बताते हैं: 'भोक्तारं यज्ञतपसां सर्वलोकमहेश्वरम्'। सर्वलोक, जितने लोक हैं... एक-एक पृथ्वी, एक-एक ब्रह्मांड में अनंत कोटि लोक हैं। 'यस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्डकोटि-' भगवान की प्रभा, जैसे सूर्य के प्रभा-प्रकाश में अनंत कोटि प्लैनेट हैं, भूगोल हैं, इसी प्रकार भगवान का जो ब्रह्मज्योति है, उसमें अनंत कोटि ब्रह्मांड हैं। उनके निश्वास से अनंत कोटि ब्रह्मांड निकलता है: 'यस्यैकनिश्वसितकालमथावलम्ब्य जीवन्ति लोमविलजा जगदण्डनाथाः'। ये सब शास्त्र का विचार है। भगवान क्या चीज है, थोड़ा समझना चाहिए। यह अनंत कोटि ब्रह्मांड भगवान के निश्वास से निकलता है और निश्वास से फिर भीतर में चला जाता है।
निश्वास... ये भगवान। भगवान साधारण... आजकल जैसा विशेष करके भारतवर्ष में भगवान बहुत cheap हो गया। सब भगवान का अवतार हैं। नहीं, वो शास्त्र में उसको भगवान नहीं... वो ऐसा मान लीजिए दो-चार आदमी बोल दिया भगवान है। असल जो भगवान है, वो कृष्ण—'कृष्णस्तु भगवान स्वयं'। भागवत में विचार किया, सब भगवान के अवतारों की सब लिस्ट दी गई, ये भगवान हैं, वो भगवान हैं। भगवान का अवतार, आखिरी में कंक्लूजन किया, सिद्धांत किया: 'एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान स्वयं'। ये जितने बताए गए हैं, सब होते हैं... ये भगवान के अंश हैं, कला हैं। असल जो भगवान हैं, ये स्वयं कृष्ण—'कृष्णस्तु भगवान स्वयं'। इसलिए इधर बताया है कि 'भगवान'। तो भगवान जो बताते हैं, उसमें कोई भूल नहीं होती, कोई दोष नहीं, क्योंकि भगवान संपूर्ण हैं ना, उसमें भूल नहीं हो सकती। हम लोग हैं असंपूर्ण, इसलिए हम लोग जो बोलते हैं, ज्ञान देते हैं, वो सब असंपूर्ण। और हम लोग क्या ज्ञान दे सकते हैं? क्योंकि ज्ञान जो हम लोग संग्रह करते हैं, वो इंद्रियों से, और हमारी जो इंद्रियां हैं, ये सब अपूर्ण हैं, ये परफेक्ट नहीं हैं। इसलिए अपूर्ण इंद्रियों से जो ज्ञान हम लोग संग्रह करते हैं, वो सब पूर्ण नहीं है, संपूर्ण नहीं है। जैसा हम लोग सूरज को देखते हैं रोजाना और देखते हैं जैसा थाली है। बाकी सूरज है fourteen hundred thousand times bigger than this. तो हमारा देखने से क्या फायदा? हम लोग कहते हैं, 'हम देख के लेंगे।' तुम्हारा देखने का क्या है? क्या शक्ति है? कुछ शक्ति तो है नहीं। थोड़ा दूर देख सकते हो, और अंधेरा हो जाए तो तब भी नहीं देख सकते हो। तो फिर जो बोलते हैं, 'हम देख लेंगे', तुम्हारा देखने से क्या फायदा? इसलिए सब इंद्रियां अपूर्ण हैं। और अपूर्ण इंद्रियों से जो ज्ञान हम लोग लेते हैं, वो ज्ञान असंपूर्ण है। असंपूर्ण ज्ञान से हमारा क्या फायदा? इसलिए हमको ज्ञान लेना चाहिए भगवान से।
ये जो Krishna Consciousness Movement है, इनका हम लोग का पहली बात यह है कि हम लोग संपूर्ण व्यक्ति से ज्ञान, जिसमें, जिसके ज्ञान में कोई भूल नहीं है। इसलिए भगवान कहते हैं: 'असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु'। दूसरे से ज्ञान लेने से उसमें, उसमें संशय होता है, doubt. और भगवान से ज्ञान लेने से उसमें कोई संशय का कारण नहीं, यानी संपूर्ण वस्तु है ना। इसका उदाहरण स्वरूप, एक बच्चा है, उसको जन्म के पहले उसके पिताजी कहीं चले गए थे, फिर आए होंगे, तो उनको कौन पिता है मालूम करने के लिए कहां से ठीक-ठीक संवाद मिलेगा? अगर दुनिया में पूछते फिरे, 'हमारा पिताजी कौन है? पिताजी कौन है? पिताजी कौन है?' तो किसी के पास से उसको ठीक-ठीक संवाद नहीं मिल सकता। बाकी अपनी माताजी से पूछे, 'हमारा पिताजी कौन है?' तो माताजी, 'बेटा, यह तुम्हारा पिता।' वो ठीक है, असंशय, उसमें कोई संशय नहीं। और कोई बता दे, 'यह तुम्हारा पिताजी है', उसमें संशय हो सकता है। अथॉरिटी, जैसे माताजी अथॉरिटी हैं पिता को समझने के लिए, इसी प्रकार ज्ञान लाभ करने के लिए यदि आप संपूर्ण ज्ञानी जो हैं, भगवान कृष्ण, उनसे आप ज्ञान लें, तो वो संपूर्ण।
इसलिए भगवान कृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता छोड़ दिया। ऐसे दुनिया से चले जाने के पहले ही अर्जुन को उपलक्ष्य करके ये ज्ञान को जो छोड़ दिया, वास्तविक भगवान क्या चीज है, भगवान से हमारा संपर्क क्या है, और दुनिया क्या चीज है, और मैं किधर से आया हूं, और किधर हमको जाना है, और क्यों हम दुनिया में इतना दुख भोग रहे हैं, और यह दुख नाश करने के लिए क्या उपाय है, सब चीज अच्छी तरह से यही श्रीमद् भगवद्गीता में बताया। इसलिए भगवान... अगर भगवान से हम लोग ज्ञान लेते हैं, तो संपूर्ण ज्ञान हमको मिल सकता है, और नहीं... इसलिए भगवान ने बताया है: 'असंशयं समग्रं मां...'। भगवान को अगर समझ लिया, वेद में कहते हैं: 'कस्मिन् नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति'। यदि आप भगवान को ठीक-ठीक समझ लिया... भगवान को समझना बहुत सरल बात नहीं है, बहुत कठिन है। बाकी भगवान की कृपा से भगवान को समझा जा सकता है। क्योंकि भगवान ने बताया है श्रीमद् भगवद्गीता में: 'तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः। नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता॥' जो भगवान का भक्त होता है, भगवान अपने को बताते हैं। किसको बताते हैं? जो भक्त होता है, दूसरे को नहीं बताते। यह भी भगवान बता सकते हैं: 'तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्'। जो सब समय भगवान की सेवा के लिए, भगवान की खुशी के लिए, भगवान को आनंद देने... साधारण जो भगवान को कुछ समझने के लिए प्रयास करते हैं, वो भगवान से कुछ अदा करने को चाहते हैं—'आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी'। और जो भक्त होते हैं, वह भगवान को खाली देना चाहते हैं, इतना ही। तो जो भगवान से लेना चाहते हैं, वो शुद्ध भक्त नहीं हैं, उनको सुकृतिमान कहा गया है: 'चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन'। अगर भगवान के पास कोई जाता है, 'हे भगवान, हम बहुत गरीब हैं, हम बहुत दुखी हैं, हमको थोड़ा सुखी कीजिए, हमको थोड़ा धन दीजिए', उसको पुण्यवान कहा जाता है। बाकी जो भगवान से कुछ मांगता नहीं, केवल भगवान की सेवा करने के लिए तैयार है, उसका नाम है शुद्ध भक्त। जैसा वृंदावन में हैं। वृंदावन में गोपी लोग, नंद महाराज, ये भगवान से कुछ मांगते हैं नहीं, केवल भगवान के सुख के लिए नियुक्त हैं। वहां यशोदा केवल देख रही हैं कि उनकी जो बच्चा है, वो ठीक से खाया, ठीक से सोया, सुखी है कि नहीं। भगवान से कुछ मांगती नहीं। नंद महाराज भी हैं, गोपी लोग भी हैं, भगवान किस तरह से सुखी हैं, ये शुद्ध भक्त का प्लेटफॉर्म है।
तो ये जो आसक्ति, भगवद्-सेवा किस तरह से ये बढ़ सकती है, ये भगवान खुद बता रहे हैं। क्योंकि भगवान का... आपका यह प्रश्न था कि भगवान की सेवा किस तरह से आगे बढ़ती है, ये भगवान खुद बता रहे हैं: 'मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः'। ये एक योग है, इसका नाम है भक्ति-योग। वो भक्ति-योग का अर्थ क्या होता है ना, भगवान में आसक्ति, इसका नाम भक्ति। आसक्ति हम लोग की है, आसक्ति एक चीज है हमारे भीतर। बाकी किसी की आसक्ति धन में है, किसी की दुनिया में है, किसी की अपने देश में है, किसी की अपने समाज में है, और कुछ किसी का कुछ है नहीं, तो कम से कम एक कुत्ता में उसकी आसक्ति है, एक बिल्ली में उसकी आसक्ति है। आसक्ति जरूर है, कोई भी व्यक्ति ऐसी नहीं है जिसकी आसक्ति... आसक्ति जरूर है। ताकि वह आसक्ति फिर करके जब भगवान में आप लगाइएगा, उसमें आपका जीवन संपूर्ण। इसलिए भगवान कहते हैं: 'मय्यासक्तमनाः'। मन को ऐसी बनाना चाहिए जो भगवान में आसक्ति खूब बढ़े, खूब। 'मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्...' ये एक योग है, 'मदाश्रयः'। और भगवान के आश्रय से ही यह संपूर्ण हो सकता है। Without taking shelter... भगवान का, बिना आश्रय में... कहते हैं भगवद्-भक्ति, भगवान... ये तो एक भक्ति से ही मालूम हो सकता है, इसलिए 'मदाश्रयः'। भगवान का आश्रय पहले लेना चाहिए। और भगवान का आश्रय लेने के पहले, भक्त-पूजा, भगवद्-भक्त जो हैं, उनका आश्रय लेना चाहिए।
यह जो आसक्ति किस तरह से बढ़ती है, यह रूप गोस्वामी ने विचार किया है कि: 'आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया। ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः॥' जैसा आप लोग सुन रहे हैं भगवान का विषय, ये सुनते-सुनते श्रद्धा होती है कि 'अब मैं भी भगवान का भक्त...' ये सब विचार अच्छी तरह से बताया गया है श्रीमद् भगवद्गीता में। 'श्रुत्वाप्यन्ये उपासते'। केवल श्रवण करने से... ये जो प्रोसेस है: 'श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्'। ये शुरू है श्रद्धा, इसका नाम है श्रद्धा। 'आदौ श्रद्धा', पहले श्रद्धा। जिसकी श्रद्धा है नहीं, वो आगे नहीं बढ़ सकता। 'श्रद्धा ततः साधुसङ्गः'। यदि श्रद्धा है, तो साधु-संग कीजिए, यानी जो लोग भगवद्-भक्त हैं, उनका संग कीजिए। जैसे आप लोग बिजनेस करते हैं, शेयर का बिजनेस करते हैं, तो शेयर बिजनेस जो करने वाले हैं, स्टॉक एक्सचेंज, उसके मेंबर हैं। इसी प्रकार यदि आप भगवान को चाहते हैं, तो भगवान का जो भक्त है, उसके association में mix कीजिए। 'सच्चा भक्त, सच्चा भक्त कहां ढूंढेगा?' नहीं, नहीं, ढूंढने... हम लोग ढूंढते हैं आपको। आप कृपा करके आइए। हम लोग का क्या बिजनेस है? भगवद्-भक्ति सब कुछ सिखा रहे हैं आपको, ढूंढना नहीं पड़ेगा। इसीलिए तो सारा दुनिया हम लोग घूम रहे हैं। तो कोई आए, तो आता भी नहीं, सुनता भी नहीं। तो पहले ये था कि कहां भगवद्-भक्त है, ढूंढ के निकालो। अब तो भगवद्-भक्त को ढूंढना पड़ता है, 'कौन भगवद्-भक्त होगा? आइए जी आइए, कृपा करें।' यह बिजनेस। बाकी होना चाहिए जो नियम है, जो 'आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गः'। साधु कौन है? साधु वही भगवद्-भक्त जो है, वही साधु है, और सब साधु नहीं हैं, चोर हैं, ये शास्त्र का सिद्धांत है। जैसे भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बताते हैं: 'अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्। साधुरेव स मन्तव्यः...'। साधु कौन है? जो भगवान का भक्त है—'भजते मामनन्यभाक्'। और कुछ नहीं जानता, कृष्ण छोड़ के कुछ नहीं जानता, वो साधु। साधु ये भगवा ड्रेस पहनने से साधु नहीं। 'स महात्मा सुदुर्लभः'। सब भगवान बताते हैं कौन साधु है, कौन महात्मा है: 'बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥' जो केवल भगवान कृष्ण को ही जानते हैं सब कुछ, ऐसे महात्मा मिलना मुश्किल है। 'महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो...' ये महात्मा का लक्षण है, केवल कृष्ण भजन। तो साधु-संग का अर्थ होता है जो महात्मा, जो साधु केवल भगवद्-भजन करता है और कुछ नहीं जानता अनन्य भाव से, अनन्य भक्ति। अनन्य भक्ति का अर्थ होता है: 'अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्'। भगवान से कुछ अदा कर लेंगे, यह बात नहीं—'शून्य', 'अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम्'। ज्ञान से, कर्म से... ज्ञान से चाहते हैं भगवान से एक हो जाएंगे, merge into the existence, ज्ञान-पंथा है, वो भी नहीं। और कर्म का पंथा है कि हम स्वर्ग लोक में जाएंगे और आगे जाके हमारा खूब सुख-समृद्धि... कि इसी दुनिया में हमारा खूब सुख-समृद्धि बनेगा, वो भी 'अनावृतम्'। 'आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा'। केवल भगवान किस तरह से सुखी होंगे, भगवान क्या चाहते हैं, उसको समाधान करो, ये विचार से जो है, वो भक्ति उत्तम भक्ति है।
तो वो उत्तम भक्ति, भगवद्-भाव बढ़ाने के लिए शास्त्र ने बताया: पहले तो श्रद्धा चाहिए, और उसके बाद साधु-संग। 'आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया'। साधु-संग से भजन-क्रिया। साधु... जैसे ये लड़के लोग जो हमारे पास हैं, पहले सुनते, सुनते-सुनते-सुनते-सुनते कोई आगे बढ़ आया, 'महाराज, हमको आप शिष्य बनाइए।' तो शिष्य बनने से क्या? गुरु क्या सिखाता है? भजन-क्रिया, किस तरह से भजन करना, वो सिखाता है। साधु-संग का फल होता है भजन-क्रिया। और नहीं तो जन्म भर साधु-संग किया, जन्म भर सुना, और कभी भजन किया नहीं, भजन-क्रिया सीखा नहीं, वो साधु-संग, वो association... वही एग्जांपल, आप स्टॉक एक्सचेंज में जाइए, तो कुछ बिजनेस कीजिए, कुछ लाभ कीजिए। लाभ नहीं हुआ, तो केवल स्टॉक एक्सचेंज में जाने से क्या फायदा? तो साधु-संग, वास्तविक साधु-संग करने से उसका फल होता है भजन-क्रिया। और भजन जब शुरू करेगा: 'ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात्'। जितने अनर्थ... अनर्थ क्या? जो चीज हमको नहीं चाहिए, कोई जरूरत नहीं है, वो सब निवृत्त। अनर्थ का अर्थ और होता है जो पाप कार्य हैं, वो निवृत्त। जो भगवद्-भजन करेगा, उसका पाप कहां से आएगा? तो इसलिए उदाहरण स्वरूप, जैसे हम लोग, इनको, हमारे शिष्य लोग जितने हैं, चार चीज छोड़ दिया है। क्या चीज? [गला साफ़ करने की आवाज़] अवैध स्त्री-संग—अपनी विवाहित स्त्री छोड़ के कोई स्त्री से संपर्क नहीं, यह महापाप है। यह तो भगवद्-भजन का नहीं... चाणक्य पंडित जो नीति वाक्य बताया है, उसमें कहा है: 'मातृवत् परदारेषु'। पंडित कौन होता है? पंडित खाली संस्कृत दो-चार बात बोलने से, इंग्लिश बोलने से पंडित नहीं होता, उसका गुण क्या है देखना चाहिए। ये पंडित, चाणक्य पंडित बताया, पंडित किसको कहा जाए ना: 'मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः॥' जो दूसरे स्त्री को, अपनी स्त्री छोड़ के सबको मातृवत्, अपनी मां के समान देखता है—'मातृवत् परदारेषु'। 'परद्रव्येषु लोष्टवत्'—और दूसरे का जो धन है, उसको देखता है रास्ता का कूड़ा, छूता भी नहीं। 'आत्मवत् सर्वभूतेषु'—और अपने के समान, अपना सुख-दुख जैसा है, दूसरे का भी समझता है। 'हमारे गले में छुरी देने से जैसा दुख होता है, दूसरे के गले में छुरी क्यों दें, उनको भी दुख...' ये जो समस्या है, ये तीन चीज जो लाभ किया है—'मातृवत् परदारेषु परद्रव्येषु लोष्टवत्। आत्मवत् सर्वभूतेषु यः पश्यति स पण्डितः'—वो पंडित। तो [गला साफ़ करने की आवाज़] अनर्थ का... ये जो जितना हम लोग सीखते हैं, दूसरे के गले में छुरी देने के लिए और दूसरे की औरत को फंसाने के लिए, यह सब अनर्थ है, ये सब महापाप है। इसलिए भजन-क्रिया, भगवद्-भजन करने से यह सब अनर्थ जो है, मिट जाएगा। 'आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गोऽथ भजनक्रिया ततोऽनर्थनिवृत्तिः स्यात्'। ये उनका पहचान है कि वास्तविक वो भगवद्-भजन कर रहा है कि नहीं। ये theoretical नहीं है, practical. ये सब गुण उसमें अगर आ जाए, तो मालूम होता है जो भगवद्-भजन कर रहा है। 'आदौ श्रद्धा ततः साधुसङ्गः ततो भजनक्रिया अथ अनर्थनिवृत्तिः स्यात्'। यह अनर्थ निवृत्त होने से, ये पाप कार्य से निवृत्त हो जाने से, फिर उनकी आसक्ति तथा शक्ति, रुचि... भगवान खुद भी बताते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में कि: 'येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्। ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥' भगवद्-भजन कौन कर सकता है? 'येषां त्वन्तगतं पापं'—जिसका पाप बिल्कुल नष्ट हो गया हो। 'जनानां पुण्यकर्मणाम्'—केवल पुण्य कार्य करते हैं। इस प्रकार जो व्यक्ति हैं, वो भगवद्-भजन कर सकते हैं। तो वो भी बड़ा मुश्किल नहीं है। यदि वास्तविक हम भगवद्-भजन करने को चाहते हैं, भगवान कहते हैं: 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥' यदि वास्तविक कोई भगवद्-भजन करता है, उसको पाप छू भी नहीं सकता। 'भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्वपाकानपि सम्भवात्'।
तो 'मय्यासक्तमनाः'—भगवान में आसक्ति बनाने के लिए भगवान जैसे बताते हैं श्रीमद् भगवद्गीता में, उसको पालन कीजिए, तो आहिस्ते-आहिस्ते आसक्ति हो जाएगी। और आसक्ति होने से ही भगवद्-प्रेम। आसक्ति किससे होती है? जैसे कोई लड़का है, लड़की है, आसक्ति जब बढ़ती है—प्रेम। तो भगवद्-प्रेम जीवन में लाभ करना ही सबसे उच्च कोटि लाभ है। चैतन्य महाप्रभु का विचार: 'प्रेमा पुमर्थो महान्'। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष नहीं, भगवद्-प्रेम—'प्रेमा पुमर्थो महान्'। भगवद्-प्रेम, that is the first-class system. 'स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे'। वो धर्म संप्रदाय जिससे भगवद्-प्रेम बढ़ रहा है, that is first-class. 'स वै पुंसां परो...' 'परो' मींस उत्कृष्ट, और trans... अप्राकृत। प्राकृत भगवद्-भक्ति वो टूट जा सकती है, बाकी अप्राकृत भक्ति जो है, वो टूटने वाली नहीं। 'अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सम्प्रसीदति'। यदि आत्मा को प्रसन्न करने को चाहते हैं, तो वही धर्म का याजन कीजिए जिसके जरिया से भगवद्-भक्ति। ये सब शास्त्र के विचार हैं। और भगवान खुद बता रहे हैं, एक-एक शब्द अगर विचार करके ग्रहण करेंगे और उसको तजना... और उसको जीवन में वास्तविक अपनाएंगे, तो आहिस्ते-आहिस्ते भगवद्-भक्ति हो जाएगी।
और पहली बात है जो श्रद्धा, जो इस जीवन में जैसा हम लोग प्रचार करते हैं कि भगवद्-भक्ति लाभ करना एकमात्र जीवन का उद्देश्य है, इसमें जिसकी श्रद्धा है, वो आगे बढ़ सकता है। Without श्रद्धा ये संभव नहीं है। इसलिए इसका नाम है जो 'मदाश्रयः'—पहले आश्रय। भगवान, भगवान कहते हैं: 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज'। तो जो ये भगवान का आश्रय ग्रहण कर लिया, 'तो भगवान, इतने दिन तो आपको हम भूला था, अब आपके चरण में मैं आश्रय ले रहा हूं, आप कृपा करके हमको आश्रय दीजिए।' तो भगवान का आश्रय देने के लिए खुद दौड़ के इधर आते हैं जो 'सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं...'। आदमी लेता नहीं, भगवान की बात सुनता नहीं, तो भगवान बेचारी क्या करें, मुश्किल है। 'मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः'। जो दास भगवान का आश्रय ले, ये जो भक्ति-योग प्रैक्टिस करे, जीवन में लगाए, उसके लिए भगवान की आसक्ति बढ़ती जाएगी। और भगवान की आसक्ति हमेशा से जीवन सफल।
धन्यवाद।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥