श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  750913LE-VRNDAVAN--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
वृंदावन, 13-सितंबर-1975
 
 
 
ॐ अज्ञान-तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन-शलाकया ।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ॥

श्रीचैतन्य-मनो-ऽभीष्टं स्थापितं येन भूतले ।
स्वयं रूपः कदा मह्यं ददाति स्व-पदान्तिकम् ॥

हे कृष्ण करुणा-सिन्धो दीन-बन्धो जगत्-पते ।
गोपेश गोपिका-कान्त राधा-कान्त नमोऽस्तु ते ॥

तप्त-काञ्चन-गौराङ्गि राधे वृन्दावनेश्वरि ।
वृषभानु-सुते देवि प्रणमामि हरि-प्रिये ॥

वाञ्छा-कल्प-तरुभ्यश्च कृपा-सिन्धुभ्य एव च ।
पतितानां पावनेभ्यो वैष्णवेभ्यो नमो नमः ॥

श्रीकृष्णचैतन्य प्रभु नित्यानन्द ।
श्रीअद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौरभक्तवृन्द ॥

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे ।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे ॥

आज बहुत शुभ दिन है—श्रीमती राधारानी, वृषभानु-नन्दिनी, उनका आविर्भाव-तिथि। सब वैष्णव लोग, वृन्दावन-वासी बहुत उल्लासित हैं। राधारानी के जन्मतिथि दर्शन करने के लिए देश-देशान्तर से आप लोग सब आए हैं। इस अवसर में हम लोग और कुछ आगे बढ़ने के लिए चेष्टा कर रहे हैं कि आज गुरुकुल का शिलान्यास करने का प्रयत्न किया। इसमें आप लोगों के शामिल होने से बहुत ही हर्ष है।

तो राधारानी की सेवा बहुमूल्य है। श्रीमती राधारानी को 64 प्रकार की कलाएँ सब मालूम थीं—किस तरह से कृष्ण को सुखी किया जाए। यह राधारानी के लिए कहा गया है: "राधे जय जय माधव-दयिते"। इसलिए कृष्ण भी राधारानी से बहुत आकृष्ट होते हैं। 'कृष्ण' का अर्थ होता है जो सबको आकर्षित करता है—कृष्ण; और कृष्ण को भी जो आकर्षित करती हैं, वे हैं श्रीमती राधारानी। कृष्ण का नाम है 'मदन-मोहन'। जो कृष्ण की शरण में आ जाएँगे, वे मदन (कामदेव) के प्रभाव से सुरक्षित हो जाएँगे।

श्रीपाद यामुनाचार्य यह श्लोक बताते हैं:
यदवधि मम चेतः कृष्ण-पदारविन्दे
नव-नव-रस-धामन्युद्यतं रन्तुमासीत् ।
तदवधि बत नारी-सङ्गमे स्मर्यमाणे
भवति मुखविकारः सुष्ठु निष्ठीवनं च ॥
(स्तोत्र-रत्न)

श्रीपाद यामुनाचार्य कहते हैं कि जब से कृष्ण-चरणारविन्द में हमारा मन लगा है, उस दिन से स्त्री-सङ्ग का स्मरण होने मात्र से ही मन में विरक्ति होती है और हम उस पर थूक देते हैं—"भवति मुखविकारः सुष्ठु निष्ठीवनं च"। तो दुनिया यह सब नारी-सङ्गम में ही व्यस्त है।
यन्मैथुनादि-गृहमेधि-सुखं हि तुच्छं
कण्डूयनेन करयोरिव दुःख-दुःखम् ।
तृप्यन्ति नेह कृपणा बहु-दुःख-भाजः
कण्डूतिवन्मनसिजं विषहेत धीरः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.9.45)

मनुष्य जीवन का जो उद्देश्य है, वह है संयम—शम, दम, सत्यम्, शौचम्, ज्ञानम्, विज्ञानम्, आस्तिक्यम्—इन्द्रियों का दमन करना, तपस्या। ऋषभदेव ने बताया है:
नायं देहो देह-भाजां नृलोके
कष्टान् कामानर्हते विड्-भुजां ये ।
तपो दिव्यं पुत्रका येन सत्त्वं
शुद्ध्येद्यस्माद् ब्रह्म-सौख्यं त्वनन्तम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 5.5.1)

ऋषभदेव अपने पुत्रों को ज्ञान देते हुए कहते हैं: "बेटा! यह जो मनुष्य जीवन है, यह शूकर (सूअर) के जैसा नहीं होना चाहिए।" सूअर क्या काम करता है? दिन भर परिश्रम करके विष्ठा खाता है, और जब थोड़ा शरीर मोटा-ताज़ा हो गया, तो इन्द्रिय-भोग करता है; उसमें कोई विचार नहीं है। तो मनुष्य जीवन इसलिए नहीं है। तो किसलिए है? "तपो दिव्यं"—तपस्या करने के लिए। और किसलिए तपस्या? "दिव्यं"—भगवान से सम्पर्क करने के लिए। नहीं तो हिरण्यकशिपु ने भी बहुत तपस्या की थी, रावण ने भी बहुत तपस्या की थी, बाकी भोगने के लिए वह तपस्या थी। "तपो दिव्यं"—दिव्य तपस्या करनी चाहिए, जिससे हमारी जो सत्ता है, वह शुद्ध हो जाए।

क्या अभी अशुद्ध है? क्या हम तो बहुत स्नान-वस्नान करके आए हैं? नहीं, यह स्नान शुद्ध नहीं है। शुद्ध तभी होगा जब जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि से मुक्त हो जाएँ, वह शुद्ध है। यह जो contamination (दूषण) है कि "भूत-ग्रामः स एवायं भूत्वा भूत्वा प्रलीयते"—एक जन्म होता है, फिर यह ख़त्म हो जाता है, फिर और एक जन्म लेना पड़ता है, इसका क्या कारण है? अशुद्धता। नहीं तो जीवात्मा जो है, परमात्मा का अंश है—"न हन्यते हन्यमाने शरीरे"। जैसे भगवान कहते हैं "अजोऽपि"—मैं अजन्मा हूँ, हमारा जन्म नहीं होता। इसी प्रकार जीवात्मा भगवान का अंश होने के कारण उसका भी जन्म-मरण नहीं होना चाहिए। बाकी जन्म क्यों होता है? अशुद्धता के कारण, सत्ता शुद्ध नहीं है।

तो यह सत्ता शुद्ध करने के लिए ही हमारी वैदिक सभ्यता है—केवल सत्ता शुद्ध करने के लिए, और कुछ नहीं। बाकी अब तो सब उल्टा-सीधा हो गया है। इसलिए हम लोगों का जो प्रयास है—यह Krishna Consciousness Movement—किंचित चेष्टा है कि किस तरह से लोग वैदिक सभ्यता ग्रहण करें, और कुछ नहीं। इसमें कोई और लाभ उठाने का कोई प्रयत्न नहीं है। हाँ, तो आहिस्ता-आहिस्ता हम लोग आगे बढ़ने के लिए प्रयत्न कर रहे हैं। तो वृन्दावन में आज यही गुरुकुल खोलने के लिए, उद्घाटन करने के लिए एक प्रयास है। अभी कुछ ठीक नहीं है कि कहाँ से क्या रुपया आएगा, क्या होगा, बाकी शिलान्यास तो हो गया।

तो गुरुकुल का उद्देश्य यही है कि जो बालक है, उसको शुरू से ही भागवत-धर्म सिखाया जाए:
कौमार आचरेत् प्राज्ञो धर्मान् भागवतानिह ।
दुर्लभं मानुषं जन्म तदप्यध्रुवमर्थदम् ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.6.1)

प्रह्लाद महाराज को अपने विद्यालय में जब मौक़ा मिलता था, वे असुर बालकों के बीच में कभी-कभी भगवान की कथा सुना देते थे। तो सब बालक जो थे, वे सब बोलते थे: "प्रह्लाद! अभी आओ, हम लोग खेलें-कूदें। अभी भगवान की बात सुनने का तो समय नहीं है।" बाकी वे कहते हैं: "नहीं, नहीं मित्र! यह जो 'कौमार आचरेत् प्राज्ञो'... बिल्कुल कुमार अवस्था से, यानी चार-पाँच वर्ष की उम्र जब हो, वहीं से भागवत-धर्म सीखना चाहिए।" क्यों इतना जल्दी? "दुर्लभं मानुषं जन्म"—यह जो मनुष्य शरीर मिला है, यह दुर्लभ है, और "अध्रुवम्"—यह भी टिकेगा नहीं, बाकी "अर्थदम्"। 'अर्थदम्' का अर्थ होता है जो कुछ वास्तविक मूल्य मिलने के लिए है, वह क्या चीज़ है? भगवान को प्राप्त करना। और यह सब अन्य योनियों के जन्म में नहीं मिलेगा। शेर होता है बड़ा बलवान, बाकी उसको भगवान नहीं मिलेंगे। मनुष्य चाहे जितना दुर्बल हो, उसको यदि सिखाया जाए शुरू से, तो उसको भगवान मिल सकते हैं। इसलिए दुर्लभ जन्म में शुरू से ही सिखाना चाहिए।

हाँ, ऐसा स्कूल-कॉलेज दुनिया में कहीं भी है नहीं जहाँ सिखाया जाता हो कि तुम शरीर नहीं हो। सब जगह सिखाया जाता है—तुम शरीर हो, तुम American हो, तुम Indian हो, तुम हिन्दू हो, तुम मुसलमान हो, बस शरीर का परिचय!
यस्यात्म-बुद्धिः कुणपे त्रि-धातुके
स्व-धीः कलत्रादिषु भौम इज्य-धीः ।
यत्तितीर्थ-बुद्धिः सलिले न कर्हिचिद्
जनेष्वभिज्ञेषु स एव गो-खरः ॥
(श्रीमद्भागवतम् 10.84.13)

'गो' का अर्थ होता है गाय, 'खर' का अर्थ होता है गधा। यह गधा और गाय की civilization (सभ्यता) है। तो इससे सभी दुखी हैं। यह go-khara civilization की वजह से कोई सुखी नहीं है। इसलिए ये लोग उल्टा-सीधा एक पार्टी बनाते हैं, वह पार्टी बनाते हैं... बाकी उसमें काम क्या होगा? असल जो बीमारी है—देहात्म-बुद्धि, वह तो रह गई। इसलिए कुछ उपकार नहीं होगा। उपकार तभी होगा जब वे समझेंगे कि "मैं यह शरीर नहीं हूँ।"
देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारं यौवनं जरा ।
तथा देहान्तर-प्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति ॥
(श्रीमद् भगवद्गीता 2.13)

हमको देहान्तर-प्राप्ति करनी है, उसको लोग believe (विश्वास) ही नहीं करते हैं। शरीर छूट जाने से और एक शरीर मिलेगा, और जब तक शरीर मिलेगा, हमको दुःख भोगना होगा। चाहे हम रईस हों, चाहे गरीब हों, शरीर मिलना ही माने दुःख भोगना। यह education (शिक्षा) है ही नहीं।

इसलिए ज़्यादा समय आप लोगों का नहीं लेंगे। इस International Society for Krishna Consciousness ने ऑलरेडी (already) Dallas, Texas में एक गुरुकुल खोला है। उसमें बहुत progress हो रहा है। Even education member of the government, वह आकर certificate दिया कि "इधर बालक लोग जैसे सुखी हैं, ऐसा किसी स्कूल-कॉलेज में हमने नहीं देखा।" सुखी क्यों न होंगे? यह Krishna Consciousness ऐसी चीज़ है।

जब हम Los Angeles से Hawaii जा रहे थे, तो एक पादरी साहब आकर बोले: "Swamiji, can I talk?" मैंने कहा: "Yes, why?" उन्होंने कहा: "I see your students so bright-faced!" उनका यही आश्चर्य होता है। Western countries में तो सभी full of anxiety हैं। Western country हो या Eastern, भौतिक जगत में जो कोई भी है, वह full of anxiety है। प्रह्लाद महाराज का श्लोक है:
तत् साधु मन्येऽसुर-वर्य देहिनां
सदा समुद्विग्न-धियामसद्-ग्रहात् ।
हित्वात्म-पातं गृहमन्ध-कूपं
वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत ॥
(श्रीमद्भागवतम् 7.5.5)

असत्-वस्तु जो ग्रहण किया है। "असतो मा सद्गमय"—वैदिक सारांश है: असत् में नहीं रहो, सद्-वस्तु में जाओ, "ॐ तत् सत्"। तो प्रह्लाद ने बताया: "असद्-ग्रहात्"—यह जो material body (भौतिक शरीर) हम लोगों ने ग्रहण किया है और इसको इन्द्रिय-तर्पण करने के लिए हम लोग प्रयत्न कर रहे हैं, इसमें केवल anxiety (चिन्ता) बढ़ेगी और कुछ नहीं, लाभ कुछ होगा नहीं। तो असत् ग्रहण किया है, तो anxiety कैसे जाएगी? इसलिए प्रह्लाद महाराज ने advice (उपदेश) किया था: "हित्वात्म-पातं गृहमन्ध-कूपं वनं गतो यद्धरिमाश्रयेत।"

यह सब शास्त्र में उपदेश मौजूद हैं, बाकी हम लोग लेते नहीं, यही दुःख की बात है। तो हम लोगों ने जो Texas में गुरुकुल बनाया है, उसकी तस्वीर सब मौजूद है, आप लोग चाहें तो देखिएगा, so it is progressing very much.

तो हम लोग चाहते थे कि इधर वृन्दावन में भी एक गुरुकुल हो जाए। और गुरुकुल का विषय जो शास्त्र में बताया गया है, वह हमारे पण्डित जी पुण्डलीक जी हैं, थोड़ा पढ़कर सुना दीजिए। आप पढ़कर सुना दें। Give, give in this mike. आप इधर आइए। यह पण्डित जी को हम Texas में भेज रहे हैं, he is a very nice teacher. उनके permit और passport की व्यवस्था की है। Just give...
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥