हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
भक्त महोदय, मातृ... हमारे शिष्य श्रीमान गिरिराज ब्रह्मचारी and श्रीमान... एवं श्रीमान अधिकारी आपको English में कुछ यह "भगवद्-भक्ति-रस-भाविता मतिः" संघ का विषय कुछ सुनाएं। मैं देख रहा हूँ कि मातृ समझ में नहीं आया होगा, इसलिए मैं हिन्दी में आप लोगों को प्रस्तुत कर रहा हूँ।
हरि-भक्ति-सुधोदय एक भक्ति ग्रंथ है। उसमें एक श्लोक आया है जिसमें कहते हैं:
"जाति"—आजकल सारी दुनिया में बड़े-बड़े और छोटे-छोटे अनेक जाति उद्भूत हैं। परन्तु महाभारत आदि शास्त्र देख के पता चलता है कि पहले, 5000 वर्ष पहले सारी दुनिया यह भारतवर्ष के जो राजा-सम्राट होते थे, वो शासन करते थे। महाराज परीक्षित, अर्जुन के पौत्र, वो भी सारी दुनिया को शासन किए थे। उसके बाद आहिस्ते-आहिस्ते, जैसा आपके सामने अभी भारतवर्ष में दो विभाजन हो गया—पाकिस्तान और हिन्दुस्तान। इसी प्रकार जैसे-जैसे कलयुग का प्रभाव बढ़ते गया, भारतीय प्रभाव घटता गया। यानी पहले सारी दुनिया भारतवर्ष थी। यह जो planet है, भूगोल, इसका नाम पहले इलावृत-वर्ष था। उसके बाद महाराज भरत के पश्चात इसका नाम हुआ है भारतवर्ष।
यह भारतवर्ष जो अभी हम लोग समझते हैं भारतवर्ष, यह नहीं, सारी दुनिया, 'स-सागरा पृथ्वी', इसका नाम था भारतवर्ष। भारतीय, कृष्ण, वैदिक सभ्यता कलयुग के प्रभाव से जैसे-जैसे हीन होता गया, ऐसे-वैसे अनेक प्रकार धर्म का, अनेक प्रकार सृष्टि का आविर्भाव हुआ। यदि आप इतिहास की आलोचना करेंगे, तो हिन्दू धर्म, मुसलमान धर्म, Christian धर्म, Jewish धर्म, बौद्ध धर्म—यह सब तात्कालिक, इसका एक history है। एक कोई विशेष संवत् में इसका उत्थान हुआ।
परन्तु जो भारतीय वैदिक धर्म है, जिसका नाम है सनातन धर्म, उसका कोई पता नहीं लगा सकता कब से यह चालू हुआ। क्योंकि जैसे जीवात्मा सनातन है, भगवान सनातन हैं, और भगवान से जीवात्मा का जो संपर्क है, उसका नाम कहा जाता है सनातन धर्म। सनातन धर्म का अर्थ होता है जो सब दिन रहने वाला, जिसका उत्पत्ति और नाश है नहीं, उसका नाम है सनातन धर्म।
तो यह सनातन धर्म जो है, भगवान यह सनातन धर्म सिखाने के लिए ही आविर्भूत होते हैं:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
जब-जब धर्म की हानि होती है। धर्म की हानि माने—धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः। जब धर्म से हीन हो जाता है, तो वो पशु जैसा हो जाता है; उसका कोई मनुष्यत्व नहीं रहता। मनुष्य से और पशु से इतना ही फर्क है:
आहार-निद्रा-भय-मैथुनं च सामान्यमेतत् पशुभिर्नराणाम्।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीनाः पशुभिः समानाः॥
खाना और सोना (आहार, निद्रा), भयभीत होना और मैथुन (इन्द्रिय-तर्पण करना)—यह सब जो दैहिक शरीर के संपर्क में जो काम है, वो पशु में भी है और मनुष्य में भी है। बाकी धर्म जो है, वह पशु के लिए नहीं है; धर्म है मनुष्य के लिए। और धर्म का अर्थ होता है जो सब दिन रहने वाला, तात्कालिक धर्म धर्म नहीं है।
जैसे पानी है, जल; जल का धर्म क्या है? तरलता। परन्तु कभी-कभी प्राकृतिक संजोग से तरलता कठिन हो जाती है, जैसे बर्फ हो जाता है। यह जो बर्फ पानी का स्वरूप है, यह असल स्वरूप नहीं है; असल स्वरूप है तरलता। इसी प्रकार भगवान और जीव का परस्पर नित्यकाल संपर्क है। वो नित्यकाल संपर्क, जैसा अभी गिरिराज ब्रह्मचारी आपको बताया कि चैतन्य महाप्रभु हम लोगों को सुनाए हैं:
जीवेर 'स्वरूप' हय—नित्य-कृष्ण-दास।
वास्तविक जीव का स्वरूप है नित्यकाल भगवान का दास। और वो जब भगवान की दासता भूल जाता है, तो कठिन हो जाता है; जैसे जल कोई प्राकृतिक संजोग से बर्फ बन के कठिन हो जाता है। इसी प्रकार जीवात्मा असत्-संग द्वारा भगवद्-विद्वेषी हो जाता है, भगवद्-विरोधी हो जाता है।
इस प्रकार भगवद्-विरोधी जो कोई हो, यह कोई विशेष जाति की बात नहीं है—चाहे भारतीय हो, चाहे American हो, चाहे German हो, चाहे English हो, जो जाति हो; चाहे ब्राह्मण हो, क्षत्रिय हो, शूद्र हो। जो कोई यदि भगवद्-भक्ति-विहीन हुआ, उसकी जाति, जप, तप, क्रिया—उसकी जो उच्च कोटि की जाति और उसका जप, तप आदि धर्म-श्रद्धा, यह सब कैसे हैं? जैसे मुर्दे को सजाना!
असल में उद्देश्य है धर्म का। हमारा वैदिक असल है, क्योंकि सब धर्मों का इतिहास मिलता है, वैदिक धर्म का इतिहास नहीं है। अभी ऐतिहासिक विचार से बौद्ध धर्म जो है, वो सबसे पुराना माना जाता है, 2600 वर्ष उसका हुआ; मुसलमान धर्म हज़ार वर्ष से कुछ ज़्यादा, और Christian धर्म जो है 2000 वर्ष। परन्तु सनातन धर्म यदि इतिहास के दृष्टिकोण से आप देखेंगे, तो कम से कम 5000 वर्ष पहले का, क्योंकि 5000 वर्ष पहले भगवान श्री कृष्ण श्रीमद् भगवद्गीता अर्जुन को सुनाए थे। इस हिसाब से पता चलता है कि वैदिक धर्म अथवा Krishna consciousness, यह जो धर्म है, कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता, यही सबसे पुराना है।
तो हम लोग यह जो दुनिया में प्रचार कर रहे हैं, कोई नवीन धर्म का प्रचार नहीं; सबसे पुराना। पुराना से तो बहुत पुराना, परन्तु नित्यकाल के लिए। और जितने धर्म हैं, तात्कालिक। जैसे बौद्ध धर्म; बौद्ध धर्म उस समय आवश्यक था, क्योंकि जब सारा मनुष्य-समाज केवल पशु-हनन करता था यज्ञ के नाम से। अभी तक बहुत से कहते हैं यज्ञ के नाम से अनेक पशु-हत्या करते हैं। उस समय 2600 वर्ष पहले भारतवर्ष में कर्मकांड से पशु-हनन का काम बहुत जारी हो गया। उस समय भगवान कृष्ण ने अपने शक्त्यावेश-अवतार भगवान बुद्ध को भेज दिया। यह भागवत में वर्णन है, आप लोग सब जानते हैं:
कलयुग की प्रथम संध्या में असुर लोगों को सम्मोहित करने के लिए भगवान बुद्ध रूप से, 'अञ्जन-सुतः'—माता जी का भी नाम दे दिया गया है, और 'कीकटेषु' गया प्रदेश, आप लोग जानते हैं कि भगवान बुद्धदेव गया प्रदेश में उनका उत्थान हुआ। यह शास्त्र में लिखा है 'भविष्यति', और क्योंकि भागवत 5000 वर्ष पहले लिखा गया था, इसलिए भविष्यत् कहा गया कि प्रथम संध्या में अञ्जना के पुत्र बुद्ध नाम से गया प्रदेश में उनका जन्म होगा।
जैसे शास्त्र में वर्णन है कलयुग के कल्कि देव का, वो आज से 4 लाख वर्ष आगे जाकर उनका जन्म होगा। उनके पिताजी का नाम भी शास्त्र में लिखा है, और उनके गाँव का नाम भी लिखा है सम्भल ग्राम, और पिताजी का नाम विष्णुयशा। इसका नाम है शास्त्र! शास्त्र में कोई भ्रम नहीं है और कोई धूर्तता भी नहीं है। यह जो चार दोष बद्ध-जीव के होते हैं—भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव—यह शास्त्र में नहीं है; और जिन्होंने शास्त्र बनाया है, जैसे वेद, उनमें भी नहीं है। इसलिए वेद-प्रमाण को 'शब्द-प्रमाण' माना जाता है।
प्रमाण अनेक प्रकार के होते हैं—प्रत्यक्ष प्रमाण होता है, अनुमान (अनुभूति) प्रमाण होता है, और शास्त्र प्रमाण होता है। सबसे बड़ा प्रमाण है शास्त्र प्रमाण। और भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में भी कहते हैं:
यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः।
न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम्॥
शास्त्र-विधि उल्लंघन करने का किसी को अधिकार नहीं है।
शास्त्रों में यह जो कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता है, यह सब समय के लिए है। इसी का नाम है सनातन धर्म। भगवान और जीवात्मा के नित्यकाल संपर्क के विषय में जो अभिधेय कार्यक्रम है, उसका नाम है सनातन धर्म। सनातन धर्म की और कोई धर्म से तुलना नहीं हो सकती, और सब धर्म तात्कालिक हैं।
इसीलिए सनातन धर्म का जो background है, उसका नाम है:
सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
भगवान कहते हैं, "सब धर्म छोड़ के हमारे चरणों में शरणागत हो जाओ।" इसका नाम है सनातन धर्म। क्योंकि जीवात्मा सनातन, भगवान सनातन, और जीवात्मा को चाहिए भगवान के चरणों में शरणागत हो जाना। वो जब नहीं होता है, तब उसका नाम है असानातन धर्म, तात्कालिक। तो हम लोग जो यह कृष्ण-भक्ति सारी दुनिया में प्रचार कर रहे हैं, यही असल सनातन धर्म है। आप लोग विचार करके देखिए। भगवान जब कहते हैं 'सर्वधर्मान् परित्यज्य', भगवान सनातन, सत्य सनातन; और जीवात्मा भगवान का अंश होने के कारण वो भी सत्य सनातन; और भगवान से जीवात्मा का जो नित्य कार्यक्रम है, उसका नाम है सनातन धर्म।
यह जो सनातन धर्म की जब ग्लानि होती है—यानी मनुष्य-जाति... जीव बोलने से सभी जीव हैं, 84 लाख योनियों में अनेक प्रकार के जीव होते हैं, परन्तु विशेष करके मनुष्य-जाति, क्योंकि मनुष्य-जाति में धर्माधर्म ज्ञान होता है, पशु में नहीं। इसलिए धर्म जो है मनुष्य-जाति के लिए है। तो मनुष्य-जाति जब धर्म को भूल जाती है, उसका नाम है धर्म की ग्लानि; अर्थात् भगवान से जो नित्य संपर्क है, उसको भूल जाती है, उसका नाम है धर्मस्य ग्लानि:
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
तो आजकल दुनिया में, कोई केवल भारत के लिए नहीं, सब जगह भगवान को उड़ा देना यह एक धर्म बन गया है। भगवान हमारे देश में, भगवान कृष्णचन्द्र आविर्भूत हुए थे, और हमारे देश के जो लड़के-लड़कियाँ सब आजकल होते हैं university के, एक भारतीय लड़की हमको पूछी, "स्वामी जी महाराज, भगवान क्या है?" देखिए! जो भगवान के देश में जिनका जन्म हुआ... भगवान का कोई देश है नहीं, परन्तु यह भारतवर्ष में, इस स्थान में भगवान कृपा करके आते हैं, इसलिए इसको आप भगवान का देश कह सकते हैं।
इसका उदाहरण सुनो: जैसे मलय देश में चन्दन होता है। चन्दन कहीं भी पैदा हो सकता है, परन्तु मलय देश में विशेष करके पैदा होता है, इसी से चन्दन को 'मलयज चन्दन' कहते हैं। वैसे भगवान कोई भी वंश में... हाँ, भगवान कभी-कभी शूकर वंश (वराह) में भी आ जाते हैं, कभी मत्स्य रूप में आ जाते हैं, कभी कच्छप (कूर्म) रूप में भी आ जाते हैं। इसी प्रकार भगवान यदुवंश में आते हैं, रघुवंश में आते हैं, इसलिए भगवान को राघवेंद्र कहते हैं, यादवेन्द्र कहते हैं। तो भगवान तो पूर्ण स्वाधीन हैं, कहीं भी आ सकते हैं, उनकी खुशी की बात है। इसका मतलब यह नहीं है कि क्योंकि भगवान भारतवर्ष में आए थे, इसलिए भगवान केवल भारतीय हैं; यह बात नहीं है, भगवान सबके लिए हैं।
यह जो दर्शन है कि भगवान कृष्णचन्द्र सबके लिए हैं, यह दर्शन अच्छी तरह से आजकल पाश्चात्य देशों में समझ रहे हैं। और उसको समझने के लिए यह जो पुस्तकें आपके सामने हैं, यह पुस्तकें हमारे दार्शनिक विचार से, शास्त्रीय विचार से वे ग्रहण कर रहे हैं। ऐसा नहीं है कि केवल sentiment में ये लोग नाच रहे हैं; नहीं, यह साधारण sentiment नहीं है, यह तो अप्राकृत sentiment है। इसका नाम है भगवद्-भक्ति भाव। यह भाव साधारण नहीं है, परन्तु यह भाव सब कोई अर्जन कर सकता है, कोई मुश्किल नहीं है।
उसका क्रम-पंथा जो है, शास्त्र में बताया गया है। वो क्या है?
आदौ श्रद्धा—यदि भगवान में श्रद्धा हो, तो भाव का रास्ता खुलता है। जैसे आप लोग श्रद्धा से इधर आए हैं कि हम लोग क्या कहेंगे, कैसा संकीर्तन गाएंगे सुनने के लिए; इसका नाम है श्रद्धा। आदौ श्रद्धा, ततः साधु-संग—यह श्रद्धा को बढ़ाना ही भगवद्-भक्ति है। श्रद्धा को और आगे बढ़ाने का क्या कार्यक्रम है? साधु-संग। जो लोग भगवद्-भक्त हैं, उनके साथ मिलना-जुलना, उनसे मैत्री करना, उनको खिलाना, उनसे खाना, उनको सुनाना, उनसे सुनना। इसी प्रकार भगवद्-भक्त से मैत्री बनाना, उसका नाम है साधु-संग।
साधु-संग का अर्थ यह नहीं होता कि कोई साधु है, उसके पास जबरदस्ती बैठ गए; नहीं। साधु-संग का अर्थ होता है:
उनको कुछ देना चाहिए, उनसे कुछ लेना चाहिए (ददाति प्रतिगृह्णाति)। उनको कुछ खिलाना चाहिए, और वो अपने हाथ से उठाकर प्रसाद दें, उसको खाना चाहिए (भुङ्क्ते भोजयते)। और अपने मन की बात साधु के सामने खुल के कहनी चाहिए, और साधु का जो उपदेश है, उसको ग्रहण करना चाहिए (गुह्यमाख्याति पृच्छति)। यह छः प्रकार से साधु-संग होता है।
तो श्रद्धा आने के पश्चात साधु-संग, उसके बाद साधु-संग थोड़ा गंभीर होने से, फिर वो जो साधु-संग करने वाला है, खुद ही साधु से कहता है, "हमको आप अपना शिष्य बनाइए।" उसका नाम है भजन-क्रिया। और वो गुरु के उपदेशानुसार यदि कार्य ठीक-ठीक करेंगे, तो उसके जो अनर्थ हैं, यह सब मिट जाएंगे (अनर्थ-निवृत्ति)। अनर्थ-निवृत्ति हो जाने से भगवद्-भक्ति में उसकी निष्ठा बढ़ेगी, रुचि बढ़ेगी, आसक्ति बढ़ेगी, फिर उसके बाद भाव।
तो जब भाव आएगा, तभी वो अपने भाव से भगवद्-गीत में, भगवद्-संगीत में, कीर्तन में नाचते हैं—भाव-विभोर! यह भाव जो है, भगवद्-प्रेम का पहला लक्षण है। तो भाव की वृद्धि हो जाने से भगवद्-प्रेम लाभ होगा, और भगवद्-प्रेम लाभ होने से आपका जीवन सार्थक हो जाता है।
यह जो भगवद्-भक्ति-रस-भाविता मतिः, यह जो हम लोग विचार करते हैं, इसका उद्देश्य है कि सब मनुष्य यह भगवद्-भाव और भगवद्-प्रेम प्राप्त करें। वो प्रेम उसके पास है, उसके भीतर है; उसको केवल जगाने की आवश्यकता है। और वो जगाने के लिए बहुत सरल उपाय है, जैसे चैतन्य महाप्रभु आप लोगों को शास्त्र से वचन सुनाए हैं:
वो लोग मन्द-मति हैं; इस जीवन में भगवान को ही प्राप्त करना चाहिए, यह समझता ही नहीं। अगर कोई समझता भी है, थोड़ा-बहुत आगे बढ़ने को चाहता है, तो बहुत से तथाकथित धर्म-संप्रदाय हैं जो भगवान को उड़ा देने वाले हैं, उसमें पड़ जाता है (सुमन्द-मतयः)। और मन्द-भाग्य—उसका भाग्य भी कलयुग में कोई वास्तविक नहीं है, और उपाधि-उपद्रव बहुत सारे हैं।
सतयुग में जो ध्यान-धारणा, जिसका आज लोग meditation करते हैं, वो meditation सतयुग में संभव था, कलयुग में संभव नहीं है। त्रेता में बड़े-बड़े यज्ञों का साधन करके भगवान की कृपा प्राप्त होती थी; वो यज्ञ भी साधन आजकल कोई नहीं कर सकता, क्योंकि यज्ञ साधन के लिए सामग्री भी नहीं है और वैसे योग्य ब्राह्मण भी नहीं हैं। इसलिए यज्ञ-साधन कलयुग में संभव नहीं है। और परमायु बहुत कम होने के कारण और सब समय हृदय उपद्रुत होने के कारण meditation, ध्यान-धारणा, यह भी संभव नहीं है। द्वापर युग में भगवान की परिचर्या, अर्चन-विधि, मंदिरों में बहुत अच्छी तरह से सेवा-पूजा—यह भी आजकल बड़ा मुश्किल है। आप लोग जानते हैं बहुत से पुराने मंदिर इधर-उधर बिल्कुल पड़े हुए हैं। केवल मंदिर ही नहीं, हम सारी दुनिया में घूम रहे हैं, चर्च में भी आजकल कोई जाता ही नहीं; चर्च बहुत से बिक्री हो रहे हैं। हम लोगों ने Los Angeles में बहुत भारी चर्च खरीदा है। तो यह साधन भी मठ-मंदिर का, यह भी बड़ा मुश्किल है।
इसलिए—कलौ तद् धरि-कीर्तनात्। कलयुग में इसी प्रकार एकत्रित होकर हरे कृष्ण मंत्र का कीर्तन करना ही कलयुग का साधन है।
तो हम लोगों का जो प्रचार का विषय है, चाहे आप यह सनातन धर्म मंदिर में आकर सुनिए, या तो गृहस्थ में अपने घर में बैठकर बाल-बच्चे, स्त्री-पुत्र लेकर सवेरे-शाम को ज़रूर हरि-कीर्तन कीजिए। देखिएगा आप लोगों का बहुत उपकार होगा। और आगे जाकर भगवद्-भक्ति और भगवान से आपका क्या संपर्क है, और उस संपर्क से आपका क्या कार्यक्रम है, और फिर आपका प्रयोजनीय वस्तु क्या है... हाँ, भगवद्-भजन करने का प्रयोजन क्या है? यह तो पूछने की चीज़ है। क्यों भगवान का भजन किया जाए?
भगवद्-भजन करने से: प्रेम पुमर्थो महान्। भगवद्-प्रेम लाभ होने से ही आपको शांति होगी, भगवद्-प्रेम लाभ नहीं होने से नहीं। अभी हमारा जो प्रेम है, अनेक जगह विस्तृत हो गया है; यही प्रेम भगवद्-चरणों में यदि अर्पित होगा, तभी उसको सफलता मिलेगी।
इसलिए आप लोगों से निवेदन है कि यह कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता संघ दुनिया में कृष्ण-भक्ति का प्रचार कर रहा है, इसमें आप लोग अच्छी तरह से सहयोग कीजिए। विदेशी, जिनको हम लोग म्लेच्छ कहते हैं, यवन कहते हैं, ये लोग साथ दे रहे हैं; और आपका जो पैतृक धर्म है, सनातन धर्म, आप इसको भूल गए हैं, इसको ग्रहण नहीं करते हैं। आपको स्वाभाविक तौर से इसमें आकर्षण है, नहीं तो क्यों आप लोग इधर आते? ज़रूर आकर्षण है। परन्तु वातावरण की ऐसी सृष्टि हुई है कि आजकल भारतीयों को भगवद्-भक्ति से दूर ले जाया जा रहा है। इससे आप लोग सावधान होइए। आप लोग इसको बहुत ही ज़रूरी कार्य जो है जीवन में, इस प्रकार गंभीरता से ग्रहण कीजिए और हम लोगों को सहयोग कीजिए।
इतना ही आप लोगों से प्रार्थना है। Thank you very much. हरे कृष्ण।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥