श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  761018BG-CHANDIGARH_Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भगवद्-गीता 13.8
चंडीगढ़, 18-अक्टूबर-1976
 
 
 
संस्कृत श्लोक (Sanskrit Verses)
अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः।
इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम्।
असक्तिरनभिष्वङ्गः पुत्रदारगृहादिषु।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु।
मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि।
अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।

अनुवादक (English Translation):
"Humility, pridelessness, nonviolence, tolerance, simplicity, approaching a bona fide spiritual master, cleanliness, steadiness and self-control; renunciation of the objects of sense gratification, absence of false ego, the perception of the evil of birth, death, old age and disease; nonattachment to children, wife, home and the rest, and even-mindedness amid pleasant and unpleasant events; constant and unalloyed devotion to Me, resorting to solitary places, detachment from the general mass of people; accepting the importance of self-realization, and philosophical search for the Absolute Truth—all these I thus declare to be knowledge, and what is contrary to these is ignorance."

प्रवक्ता (श्रील प्रभुपाद):

अच्छा, भगवद्गीता में 18 अध्याय, परिच्छेद हैं। जिसमें छह chapter आपको कर्मयोग, और छह chapter भक्तियोग, और छह chapter ज्ञानयोग।

तो यह 13वाँ परिच्छेद है ज्ञानयोग। भगवद्गीता—ज्ञान, कर्म, भक्ति। शुद्ध भक्ति जो है, वो ज्ञान-कर्म से कोई सम्पर्क नहीं है। तो भक्तियोग भगवान बीच में बैठा... बताया। जैसे पुस्तक है, इसका दोनों तरफ़ cover है। और बीच में substance है।

इसी प्रकार भगवान एक तरफ़ कर्मयोग और एक तरफ़ ज्ञानयोग। यह किताब का जैसा जिलद होता है, सुवर्ण covering। और जो असल माल है, वक्तव्य है भक्तियोग, वो सातवाँ परिच्छेद से शुरू करके 12।

तो यह ज्ञानयोग में श्रीभगवान पहले ही दिया कि—
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते

ज्ञान... ज्ञान की पहली... भगवान हैं। पहले ज्ञान किसका विषय है? यह शरीर का विषय ज्ञान बाहरी है। असल ज्ञान आत्म-तत्व।

आत्म-तत्व अगर नहीं हम लोग समझेंगे, केवल बाह्य तत्व से, शरीर तत्व से यदि हम लोग काम करेंगे, जो कुछ काम हम लोग करेंगे, वो सब पराभव। Defeat. पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम्। जब तक आत्म-तत्व में नहीं पहुँचेंगे, ब्रह्म-तत्व में नहीं पहुँचेंगे, जो कुछ हम लोग काम कर रहे हैं, वो सब defeat है, पराभव है। हार जा रहा है।

यह जो हम लोग समझते हैं कि हम आगे बढ़ रहे हैं, आगे नहीं बढ़ रहे हैं। पीछे... नहीं, बिल्कुल गिर जा रहे हैं। पराभव, जैसे लड़ाई में हार जाना।

इसी प्रकार यह जो दुनिया है, struggle for existence, मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति। यह संघर्ष में, संघर्ष में हम लोग हार जा रहे हैं। इसीलिए आत्म-तत्व... यह भगवान बार-बार समझा रहे हैं कि यह देहात्म-बुद्धि जो है, इसको पहले छोड़ो।

तो, अर्जुन को जब गया... एक तरफ़ तो ज्ञान, अर्जुन का अपना जो था कि "हम काम करते हैं, जैसे किसान। उसका पास क्षेत्र है, ज़मीन। और ज़मीन में खेती-बाड़ी करते हैं, अपना योग्यता का अनुसार। जितना मेहनत करे, उतना उसको खाद्य द्रव्य मिल सकता है। इसी प्रकार यह शरीर है क्षेत्र। और इसमें काम करने वाला जो है, वो आत्मा। यह दोनों मिलकर के ज्ञान होता है। क्षेत्र-ज्ञान। एतज्ज्ञानम्। ज्ञान का अर्थ होता है, ज्ञान जो है 13वें अध्याय से...

तो पहले तो यह ज्ञान मालूम होना चाहिए कि मैं शरीर नहीं हूँ, यह शरीर छोड़ के और। पहले ही भगवान समझाया, द्वितीय अध्याय में। प्रत्येक जीव को पहले यह ज्ञान कर लेना चाहिए कि यह शरीर हमारा काम करने के लिए दिया गया। अपना कर्म का अनुसार जैसा हम... project.

इसी प्रकार कर्म साधन करने के लिए भगवान हमको यह शरीर दिया। जैसा आप भगवान से हुकुम करें कि हमको एक राजा का शरीर चाहिए। ठीक है, बोलता है, "जैसा आप कर्म करेंगे, उस प्रकार शरीर मिलेगा।" बाक़ी आपका इच्छानुसार ही मिलेगा। बाक़ी इच्छा करने से ही नहीं मिलेगा, योग्यता भी होना चाहिए।

जैसे एक श्लोक में कहा है—first deserve, then desire. योग्यता भी होना चाहिए। बोलने से ही नहीं। प्रकृति आपको शरीर देगा। यह जो प्रकृति, माया, दुर्गा देवी। दुर्गा देवी प्रकृति है।

शास्त्र में ऐसे बताया है कि दुर्गा देवी अपने ख़ुशी से कुछ नहीं करते। हम लोग दुर्गा-पूजा करते हैं, माँगते हैं—"माताजी, हमको धन दीजिए, यश दीजिए, और रूपवती भार्या दीजिए।" ये सब दुर्गा-पूजा करते हैं, माँगते हैं। बाक़ी वो अपनी ख़ुशी से नहीं दे सकती। उनका शास्त्र में ऐसे बताया है कि दुर्गा देवी वो भी परम वैष्णवी है। सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साधन-शक्तिरेका। दुर्गा देवी यह सृष्टि-स्थिति-पालन अकेले ही कर सकती है। इतना बड़ा भारी उसका शक्ति है।

सृष्टि-स्थिति-प्रलय-साधन-शक्तिरेका
छायेव यस्य भुवनानि बिभर्ति दुर्गा

दुर्गा देवी यह दुनिया को सब पालन करते हैं, शासन करते हैं, superintendent. बाक़ी किस तरह से करते हैं?
इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा
वो दुर्गा देवी भगवान की इच्छानुसार काम करती है। अकेले नहीं करती। भगवान के हुकुम से।

इच्छानुरूपमपि यस्य च चेष्टते सा
गोविन्दमादिपुरुषं तमहं भजामि

यह ब्रह्म-संहिता में बताया गया। और भगवान ख़ुद भी बताते हैं, भगवद्गीता में:
मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम्
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते

तो दुर्गा देवी, यह गोस्वामी लोग विचार किया है कि दुर्गा देवी जो है, यह राधारानी की और एक स्वरूप है। भगवान की शक्ति। भगवान शक्तिमान। यह शक्ति नहीं है।
परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते
स्वाभाविकी ज्ञान-बल-क्रिया च
भगवान की अनेक प्रकार शक्तियाँ हैं। इसमें यह दुर्गा देवी जो है, बहिरंगा शक्ति। और राधारानी जो है, अंतरंगा शक्ति।

दुर्गा देवी का काम है, हम भगवान को भूलने को चाहता हूँ, तो ख़ूब भुला देती है। "ले! तू जितना संसार चाहिए, ले!" और ख़ूब लंगोटी फाड़ कर दे, और डंडे दे, और सब कुछ दे। फिर भगवान को भूल जाए। बाक़ी राधारानी की कृपा होने से आप भगवान के पास पहुँच सकते हैं और भगवान की सेवा में नियुक्त हो सकते हैं। इसीलिए वृन्दावन में सब जितने भक्त हैं, वो सब समय 'जय राधारानी' ये सब बोलते हैं।

यह जो शरीर है, हमको मिला है, जिसका विषय भगवान बोल रहे हैं—
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते

यह शरीर हमको कौन दिया है? वही दुर्गा देवी। दुर्गा देवी ही हमको... बाक़ी भगवान का हुकुम से। हाँ, "देव जी, दुर्गा देवी, यह ऐसे शरीर माँगता है। इसका कोई खान-पान का विचार नहीं है। यह शास्त्र-सिद्धांत नहीं मानते हैं। जो चीज़ चाहे उठा लेते हैं। तो इसको एक योग्य शरीर दो।" तो दुर्गा देवी उसको सूअर का शरीर देता है। "लो! अब तुम खाओ।"

यह जो खान-पान का विचार नहीं है, आजकल चल रहा है, उसको आगे में कोई शरीर मिलेगा कि वो जो मैला है, वो भी खाएगा। यह शरीर मिलता है दुर्गा देवी से।

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते

क्षेत्र में आप जो कुछ पैदा कर लीजिए। आप गेहूँ-चावल पैदा कर लीजिए, और सिगरेट फूँकने के लिए तम्बाकू भी पैदा कर लीजिए। जैसा आप चाहेंगे।

आजकल जैसा चाय और coffee पैदा करते हैं। अफ़्रीका में सब ज़मीन दाल-चावल नहीं, पूरा सब foreigners लोग जाकर के coffee और चाय पैदा करते हैं। और वो छोड़ देते हैं, आधा-तीजा मोटा-ताज़ा हो गया। उसको काट के बाज़ार house में सारा दुनिया में बेचते हैं, export करते हैं। चाय बेचते हैं, coffee बेचते हैं, ये सब industry और economic development.

तो जैसा-जैसा हम चाहते हैं, उस प्रकार शरीर हमको मिलता है। वो भी भगवान की कृपा से।

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति

भगवान से तो आप छिपा नहीं सकते। आप दिल से चाहते हैं कि, "भगवान, हमको अगर ऐसा शरीर मिल जाता, हम बहुत मांस खाने चाहते हैं, वो ताज़ा रक्त भी पीने को चाहते हैं।" तो भगवान सब सुनता है, "अच्छा, ठीक है। देव जी, इसको एक शेर का शरीर दो।" लो, ख़ूब मांस खाओ!

ये यथा मां प्रपद्यन्ते

आप यदि ये सब भौतिक सुविधा के लिए नीच शरीर आप चाहते हैं, तो आपको मिल जाएगा। और यदि आप वो शरीर चाहते हैं, जैसा भगवान का शरीर है सच्चिदानन्द विग्रह, वो भी आपको मिल सकता है।

यान्ति देवव्रता देवान्पितॄन्यान्ति पितृव्रताः

जो भगवान को चाहते हैं, तो भगवान के पास जाने के लिए, भगवान की सेवा में नियुक्त होने के लिए, ये तो इस शरीर में होगा नहीं। उसके लिए वो जो आपका असल शरीर है, तेन संवेदितात्मने, वो जो आत्मा है, वो आत्म-शरीर से आप भगवान के पास पहुँच सकते हैं। वो भी आपको मिल सकता है।

तो जैसा आप चाहें। क्योंकि भगवान आपका हृदय में बैठे हैं। भगवान को ढूँढ़ने के लिए कोई मुश्किल नहीं है। क्योंकि आपका हृदय में बैठे हुए हैं।

भगवान—ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। ये भगवान सब के हृदय में बैठे हुए हैं। वो सूअर के हृदय में भी बैठे हुए हैं, और देवता का हृदय में भी।

उसका मतलब ये नहीं कि भगवान सूअर के हृदय में है तो भगवान सूअर हो गया। ये नहीं। भगवान वैकुण्ठ में ही रहते हैं। बाक़ी सूअर को, देवता को guide करते हैं।

जैसे उपनिषद् में है कि एक वृक्ष में दो पक्षियाँ बैठे हैं। एक पक्षी वो फल को खाते हैं और दूसरी पक्षी जो है, वो देखता है कि ये कैसा फल चाह रहा है। उसको देता है। "लो!" हर तरह से भगवान सुविधा देता है। "लो!"

ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया

इसको ख़्याल कीजिए। यह जो यंत्र मिलता है, यह शरीर हम लोग जानते हैं, यह यंत्र विशेष है। यह machine है। machine 'मैं' नहीं हूँ। जैसा motor car पे आप बैठे हुए हैं, आप motor car नहीं हैं। परन्तु motor car एक machine है, एक यंत्र है। यह शरीर एक यंत्र है।

और मूर्ख लोग यह यंत्र को समझता है 'मैं' हूँ। motor car में आप बैठे हैं, अगर आप समझें 'हम motor car हैं', यह बहुत ग़लत बात है, मूर्खता है। इसी प्रकार जो इस यंत्र को समझता है 'मैं' हूँ, यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके। भगवद्गीता में यंत्र बताया गया है और आयुर्वेद में बोलता है कि कफ़, पित्त, वायु के एक थैली है। बाक़ी यह जो शरीरी है, देही, वो अलग वस्तु है। यह सब शास्त्र में, आयुर्वेद में भी समझाया।

यह हमारा वैदिक शास्त्र इतना उच्च कोटि का है कि आयुर्वेद शास्त्र जो है, वो भौतिक शास्त्र है। उसमें भी मानते हैं कि यह जो शरीर है, यह कफ़, पित्त, वायु के एक थैली है। आत्मा नहीं है। इसलिए जो यह बाहरी चीज़ यंत्र को, यह थैले को आत्मा समझते हैं, वो गधा है। स एव गोखरः। गीता में आप लोगों को समझाया।

फिर भगवान यह ज्ञानयोग शुरू करने के पहले ही फिर इसको remind कर रहा है कि, "अर्जुन, यह जो शरीर है, यह क्षेत्र है। यह जो किसान है, वो अलग है। किसान को जैसा ज़मीन दिया जाता है, और उसमें काम करता है, खेती-बाड़ी करते हैं और उसमें अपना योग्यता अनुसार फल उसको मिलता है, अनाज मिलता है, फल मिलता है और कुछ मिलता है। इसी प्रकार यह शरीर को लेकर के जैसा आप काम कीजिएगा, उसी प्रकार आपको फल मिलेगा।"

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते

क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का ज्ञान, अर्जुन पूछा भगवान से। भगवान बड़ा सरल भाषा में समझाते हैं कि यह जो शरीर है, इसी को क्षेत्र कहा जाता है।

एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः

और यह जो क्षेत्र को जो समझता है, उसका नाम है क्षेत्रज्ञ, यानी आत्मा। जीव, जो समझता है। तो हम लोग थोड़ा-बहुत सभी समझते हैं। अत्यंत मूर्ख होते हुए भी, मैं यह समझता हूँ कि मैं यह शरीर नहीं हूँ। आप एक-एक शरीर का जो अंश है, विचार कीजिए। अपनी उँगली को देखिए। कोई नहीं बोलता है, "हम उँगली हैं।" बोलता है, "हमारा उँगली।" यह हमारा उँगली है। एक बालक भी उसको पूछिए, यह क्या है, वो कहेगा, "हमारा हाथ।" कोई बोलेगा नहीं, "हम हाथ हैं।" यह नहीं कोई बोलेगा।

तो यह तो समझता है, natural. फिर भी वो माया का अधीन होने का कारण वो भ्रम हो जाता है, जिसको कहा जाता है प्रमाद। एक चीज़ को और कुछ समझना। बाहरी चीज़।

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः

यह तो ज्ञान हो गया। और क्या ज्ञान होना चाहिए? वो भी बात समझना चाहिए कि—
क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत

"देखो जी, यह जो जीव है, केवल वही क्षेत्रज्ञ नहीं, मैं भी क्षेत्रज्ञ हूँ।" क्यों? अब बताया ना—ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। जो भगवान हैं, वो सब के हृदय में बैठे हुए हैं। तो वो भी एक आत्मा हैं, बाक़ी वो परमात्मा हैं। वो हमारे ऐसा आत्मा नहीं।

हम तो शरीर में बैठे हैं, उस शरीर का फल, सुख-दुःख जो है, हमको भोगने पड़ेगा। और और एक मित्र का बैठ गया है, ईश्वर। वो सुख-दुःख भोगने वाले नहीं, ख़ाली देखने वाले हैं। देखता है कि यह मूर्ख क्या चाहता है। भगवान ऐसे आपका मित्र है कि आपको जो कुछ शरीर मिले—वो देवता का शरीर मिले, चाहे कुत्ता का मिले, चाहे गधा का मिले, चाहे वृक्ष का मिले—सब जगह आपका साथ में हैं। यह आपको समझाने के लिए कि, "क्यों तुम इधर-उधर भटक रहे हैं, कभी यह शरीर, कभी वो शरीर? यह सब कर्म छोड़ो, मामेकं शरणं व्रज।"

यह भगवान की बातें जब नहीं सुनेगा, अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि। भगवान उसको सब समय अवसर देगा, "लो!" "नहीं, हमारा ऐसा..." नहीं सुनता।

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप

जो इसमें श्रद्धा नहीं है कि भगवान का बात... नहीं सुनता। "हम अपना मतलब है।" बड़ा जिद्दी। हम लोग तो सब प्रचार करने के समय अनेक प्रकार, हज़ारों किस्म का आदमी समझते हैं, सब जिद्दी हैं। जो भगवान को नहीं जानते, भगवान जो बोलते हैं उसको नहीं सुनते। अपना-अपना मतलब सब manufacture करते हैं। करोड़ों आदमी।

वो manufacture करके लाभ नहीं, क्योंकि वो प्रकृति के अधीन हैं। manufacture करके क्या होगा? वो जितना उनको मिलने का है, उतना ही मिलेगा। और प्रकृति से बोलने... बोलने से ही तो हमको दे देगा, हमको ₹1 करोड़ दे दो। यह नहीं। आप जितना कर्म किया है, आपको जितना योग्यता है... कोई नौकर अगर कहे कि हमको ₹10,000 तनख़्वाह दो, तो उसको योग्यता होने से तब तो देगा।

इसी प्रकार ईश्वर...

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया

भगवान सबको क्या... यह भ्रामयन्, उनको घुमाता-फिराता है। Wandering. यह जो सारा संसार है, ब्रह्मांड से शुरू होता है, त्रिजगत है। सब आब्रह्मभुवनाल्लोकाः... यह भी भगवान... आब्रह्मभुवनाल्लोकाः पुनरावर्तिनोऽर्जुन।

ये पुण्य कार्यों से कोई स्वर्गलोक में जाता है, गंधर्वलोक में जाता है, ब्रह्मलोक में जाता है, बड़े-बड़े सब लोग हैं। रात में आप लोग देखते हैं, आजकल modern scientist वो धोखा देता है कि और कहीं जीव नहीं है। सब जीव इधर ही है। महामूर्खता!

सब जगह में अलग-अलग जीव है, उसका योग्यता अनुसार उसको मिलता है। वो सब जगह भरपूर जीव है। यह सूर्यलोक में भी है। अगर सूर्यलोक में राज्य नहीं होता, तो भगवान किसको बोल रहा है—
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्
'विवस्वान' का अर्थ होता है सूर्यलोक में अभी जो राजा है, उसका नाम है विवस्वान। उसको बोला।

तो मैं सूर्यलोक में नहीं जा सकते हैं, बाक़ी भगवान जा सकते हैं। तो अगर भगवान नहीं गया होगा तो फिर झूठ बोल रहे हैं? चतुर्थ अध्याय में जो भगवान बोलते हैं—इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। सब जगह में अनेक जीव है। यह नहीं है कि केवल इधर ही जीव है, सब जगह में। अपना-अपना जो... शरीर उसका अलग।

जैसे मूर्ख कहते हैं समुद्र है, बिल्कुल ख़ाली है। नहीं, ख़ाली नहीं है। यदि आपको योग्यता है, समुद्र के भीतर जाइए, अनेक जीव आप देखिएगा। जलजा नव-लक्षाणि। 9 लाख किस्म के जीव समुद्र के भीतर है। एक-एक मछली ऐसा है कि बड़े-बड़े मछली को वो... गरासन कर लेता है। गरास, तिमिंगल।

यह जो भगवान का सृष्टि है, विचित्र सृष्टि है, अनेक प्रकार जीव है। सब जगह में। वो भ्रामयन्... यह सब कर्म का फल दिया है, वो सब जगह में घूमता है। जैसे-जैसे वो कर्म करते हैं, यह जो क्षेत्र है, यह शरीर से, यह शरीर से, मनुष्य शरीर से आप जैसे-जैसे कर्म किए, उस प्रकार आपको स्थान मिलेगा।

ऊर्ध्वं गच्छन्ति सत्त्वस्था मध्ये तिष्ठन्ति राजसाः
जघन्यगुणवृत्तिस्था अधो गच्छन्ति तामसाः

यह भ्रामयन्, भ्रमण हो रहा है। तो चैतन्य महाप्रभु जब रूप गोस्वामी को यह भक्ति की शिक्षा, शिक्षण दिया था, उसमें यही बताया था कि—
एइ रूपे ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोनो भाग्यवान् जीव
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज

यह जो हम लोग हैं, जीव, हम लोग ऐसे भ्रमण कर रहे हैं, अपना-अपना कर्म का अनुसार। कभी नीचे, कभी ऊपर। आब्रह्मभुवनाल्लोकाः... यह भ्रमण करते-करते वही मृत्युसंसारवर्त्मनि। यह संसार जो है, उस जगह ब्रह्मा भी हो जाए आप, तभी मरने पड़ेगा।

जैसे हिरण्यकशिपु तपस्या किया था। ब्रह्मा जी पहुँच गया, "बेटा, क्या चाहते हो? इतना घोर तपस्या किया।" "हमको अमर कर दीजिए।" ब्रह्मा जी बोले, "भाई, मैं ख़ुद ही अमर नहीं हूँ, तो तुमको हम कैसे अमर करेंगे?" तो देखिए, ब्रह्मा जी जो है, उसका दिन... एक दिन का हिसाब-किताब भगवद्गीता में है।

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः

यह ब्रह्मा जी का 12 घंटा है। क्या चीज़ है? ना, सहस्र युग। एक युग में 43 लाख वर्ष होता है। 4 युग—सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग। 18 लाख, 12 लाख, 8 लाख, 4 लाख। कितना लाख हुआ? 43 लाख। यह जो है, उसमें 1,000 गुणा कीजिए। सहस्रयुगपर्यन्तम्। 'सहस्र' का अर्थ होता है 1,000। यह जो 43 लाख वर्ष, 1 युग, 1 युग समष्टि—सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग, कलियुग—इसको 1,000 गुणा कीजिए। वो जो समय है, वो ब्रह्मा जी का 12 घंटा।

सहस्रयुगपर्यन्तमहर्यद्ब्रह्मणो विदुः

यह शास्त्र में है। तो 12 घंटा हुआ, फिर उसी प्रकार 12 घंटा—24 घंटा। तो 1 दिन हुआ, इसी प्रकार 1 महीना, इसी प्रकार 1 वर्ष, इसी प्रकार उनका 100 वर्ष की आयु। बाक़ी मरने पड़ेगा। यह बात नहीं।

केवल भगवद्धाम जाने से आपको...
यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम
पुनर्जन्म नैति
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति

जिसको यह भौतिक जगत में जन्म होगा, उसको मरने पड़ेगा। और उसको रोग भी होगा। यह ब्रह्मा से... आब्रह्मभुवनाल्लोकाः, सब यह जन्म-मृत्यु, मृत्यु-संसार-वर्त्मनि। सब।

तो कर्म का अनुसार, इसी प्रकार कभी उच्च लोक में, कभी नीच लोक में, कभी मनुष्य शरीर, कभी देवता शरीर—यह सब चल रहा है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु रूप गोस्वामी को उपदेश दिया कि, "देखो जी, यह जो भ्रमण करने वाले हैं, कोई बात... भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया। यह माया का दिया हुआ जो यंत्र है, शरीर, अनेक प्रकार शरीर है। ऐसा शरीर पे बैठ के जैसा आपका एक motor मिल गया, तो ख़ूब भ्रमण कीजिए।

motor तो टूटने वाला है, एक दिन टूट जाएगा। फिर और एक motor मिलेगा, उसका जैसा price दीजिएगा। अभी आपके पास कोई motor है, उससे अच्छा भी motor मिल सकता है, और बुरा भी मिल सकता है। इसी प्रकार यह शरीर को समझ लीजिए कोई motor car है। और भगवान माया के द्वारा आपको दिया है।

मायया यन्त्रारूढानि

और उसपे चढ़ के आप ख़ूब भ्रमण कीजिए। यह चल रहा है।

चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, यह जो motor चढ़ने वाला है साहब, यह भ्रामयन्। भगवान जो बोलता है, वही कह रहे हैं। इसका नाम है शास्त्र। शास्त्र यह नहीं कि भगवान कुछ कह दिया, हम कुछ और कुछ कह दिया, नहीं।

इसका नाम है परम्परा। इस प्रकार परम्परा से हम लोग ज्ञान लाभ करेंगे, तो ठीक ज्ञान लाभ होगा। और हम अपना बुद्धि से interpretation करके और कुछ अर्थ दिया, तो वो भी बेवकूफ़ है जो सुनने वाला है, और वो भी बेवकूफ़ है जो बोलने वाला है। उसमें कुछ काम नहीं।

तो देखिए, जैसे भगवान बोलता है—भ्रामयन्सर्वभूतानि। चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—एइ रूपे ब्रह्माण्ड भ्रमिते। भ्रमण माने वही, ऊपर-नीचे। जैसे नागरदोला होता है, कभी ऊपर, कभी नीचे। इसी प्रकार चल रहा है।

तो चैतन्य महाप्रभु यह उपदेश दे रहा है कि इस प्रकार भ्रमण करते-करते-करते यदि कोई जीव भाग्यवान हो जाए। भाग्यवान हो सकता है, किस तरह से? पुण्य कार्यों से। पुण्य कार्य करने से वो भाग्यवान... भाग्यवान का अर्थ क्या? कोई भग... भग, भगवान से कुछ कृपा लाभ होना। तो भगवान से, कोई वैष्णव से अगर...सब कोई भीख माँगते हैं। भीख माँगने वाला नहीं है। अगर कोई व्यक्ति के पास गया, भिक्षुक हो करके, 'माताजी, कुछ भिक्षा दीजिए।' अगर वो श्रद्धा से कोई अगर वैष्णव को भिक्षा देती है, वो भाग्यवान होगी। उसी बख़त। हाँ। क्योंकि वैष्णव से सम्पर्क हो गया। कुछ दिया ना? भगवान के पास आकर के, मंदिर में आकर के सिर झुकाया, वो भाग्यवान हो गया।

हाँ, यह आरती हो रही है। उसमें कुछ... यह मंदिर में आकर के, यह हरि संकीर्तन में आकर के, हाथ में थोड़ा नाच लिया और हम थोड़ा झाँझ भी बजा दिया और करताल भी बजा दिया। यह किसी के ऊपर एक फूल का माला चढ़ा दिया, वो भाग्यवान हो गया। हाँ। वो टूटने वाला नहीं है। हाँ।

स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयात्

ऐसी चीज़ है कि थोड़ा ही आप दीजिए, वो आपके लिए ठीक जमा हो जाएगा। इसी प्रकार जमा करते-करते-करते, जब थोड़ा ज़्यादा balance हो जाएगा, उस समय भक्ति शुरू होगी।

तो ये सब साधना है। चैतन्य महाप्रभु यही बताते हैं—
एइ रूपे ब्रह्माण्ड भ्रमिते
ये ब्रह्माण्ड में भ्रमण करते-करते जनता रूप यानी माया, जैसे भगवान का है। भगवान चैतन्य महाप्रभु भगवान के स्वरूप से बतलाया है, भगवद्गीता, "ऐसा करो।" ये भगवान हैं, हुकुम दे रहे हैं। और वही भगवान, ये मूर्ख लोग सीखता नहीं, तो भक्त रूप से आए। वही चैतन्य महाप्रभु, सिखाने के लिए कि, "देखो जी, कृष्ण भक्ति करने के लिए ऐसा करो, जैसा मैं कर रहा हूँ।" इसलिए रूप गोस्वामी चैतन्य महाप्रभु को पहचान लिया कि यही भगवान ही हैं। यह भक्त रूप से हम लोग को सिखाने को आए हैं।

ये बड़े-बड़े भक्त लोग समझ गए। इसलिए रूप गोस्वामी से और चैतन्य महाप्रभु जब पहले दफ़े मुलाक़ात हुआ, तो रूप गोस्वामी ये श्लोक से उनको प्रणाम किया:

नमो महा-वदान्याय
कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते
कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-
नाम्ने गौर-त्विषे नमः

गौर-त्विषे, अभी आप कृष्ण वर्ण रूप से नहीं आए हैं। बड़ा ख़ूबसूरत... पीत वर्ण, गोरा ऐसा वर्ण है। गौर-त्विषे, गौरांग रूप। तो, आप केवल वर्ण पलटा के आए हैं, बाक़ी आप स्वयं कृष्ण हैं। और इस समय आप महा-वदान्य होकर के आए हैं। 'वदान्य' किसको कहा जाता है? जो दान देता है ख़ूब, उसको वदान्य। तो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं, केवल वदान्य नहीं, महा-वदान्य! आपसे बढ़ करके कोई दाता है ही नहीं।

क्यों? कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते। कृष्ण तो अपने को देने के लिए condition किया कि—
सर्व-धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज
सब छोड़ कर के हमारे चरण में शरणागत हो। condition किया कि पहले सब छोड़ो और हमारे चरण में शरणागत हो, फिर तुमको हम रखेंगे। और यह जो स्वरूप में आप आए हैं, कोई condition नहीं है। अभी किसको-किसे कृष्ण-प्रेम आपने दिया। इसीलिए आप महा-वदान्य हैं। ये चैतन्य महाप्रभु का स्वरूप है।

कोई condition नहीं। लो! भगवद्-प्रेम लो! किस तरह से? खू़ब हरे कृष्ण महामंत्र, इसको उच्चारण करो और नाचो। बस, भगवद्-प्रेम हो जाएगा। देखिए, कितना बड़ा महामंत्र। कोई लिखा-पढ़ी की ज़रूरत नहीं है। कोई ब्राह्मण घर में, उच्च कुलीन घर में जन्म लेने का कोई ज़रूरत नहीं है। केवल हरि-कीर्तन कीजिए और वो उत्साह से ख़ूब नर्तन कीजिए।

कृष्ण-कीर्तन-गान-नर्तन-परा
ये गोस्वामी लोग क्या हैं, ये सिखाया हम लोग को। कि कृष्ण उत्कीर्तन... हाँ, ख़ूब चिल्ला-चिल्ला के 'हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण' बोलिए और नाचिए। बस! बस, कृष्ण-प्रेम आपको मिल जाएगा।

कृष्ण-कीर्तन-गान-नर्तन-परौ प्रेमामृताम्भो-निधी
उसी वख़त प्रेम रूप जो अमृत है, उसको समुद्र में आप गिर जाएँगे। उसी में। प्रेमामृता... धीराधीर-जन-प्रियौ। और कृष्ण-कीर्तन ऐसे हैं, वो जो धीर है और अधीर है, दोनों के लिए प्रिय है।

पहले धीर होता कौन? जो दुनिया से छुट्टी ले लिया। ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति... दुनिया से, उसको बोला जाता है धीर। बस, उसका और कुछ करने का है नहीं, आत्मज्ञान हो गया। उसका और कुछ करने का है ही नहीं। और अधीर जो है, वो केवल चाहता है भोग करने के लिए।

तो ये अधीर का विषय में भी चैतन्य-चरितामृत में बताया है कि कौन अधीर है। जो माँगता है, वो अधीर है। जिसको माँगने का कुछ है ही नहीं, वो धीर है। और जो माँगता है, वो अधीर है। अशान्ति! अधीर का अर्थ है जिसकी शान्ति नहीं है। वो अशान्त उसको कहा जाता है।

तो चैतन्य... चैतन्य महाप्रभु बताया है कि—
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी-सकलि 'अशान्त'
ये जितने हैं। कोई भुक्ति चाहते हैं, दुनिया का भोग चाहते हैं, कर्मी। और कोई ज्ञानी जो है, वो मुक्ति चाहते हैं। ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या, भगवान से एक हो जाएँ, मुक्त हो जाएँ। तो जो कर्मी है, वो भुक्तिकामी। और जो ज्ञानी है, वो मुक्तिकामी। और जो सिद्धिकामी, जो योगी है, वो सिद्धि चाहते हैं, magic दिखाना चाहते हैं। अष्ट-सिद्धि—अणिमा, लघिमा, महिमा, प्राप्ति, सिद्धि—ये सब दिखाने के चाहते हैं।

तो ये सब ज्ञानी, योगी, कर्मी जो है, हो सकता है कि बहुत भारी-भारी सब है, परन्तु वो माँगने वाला है। वो ऐसे नहीं, 'हमको कुछ नहीं चाहिए।' स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे—ये व्यक्ति नहीं है। वो भक्त है। भक्त को जब भगवान देने को चाहते हैं, वो बोलता है, 'हमको क्या चाहिए? भगवान, आपका चरण मिल गया, और हमको क्या चाहिए? नहीं-नहीं, हमको कुछ नहीं चाहिए।' स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे। इसका सब उदाहरण बहुत है। बोलने से बहुत समय लग जाएगा।

तो भक्त जो है, वो ही शान्त है, क्योंकि वो माँगने वाला नहीं है। वो भगवान को विरक्त नहीं करते, 'भगवान, हमको ये दीजिए, वो दीजिए। हमको भुक्ति दीजिए, हमको मुक्ति दीजिए, हमको सिद्धि दीजिए।' नहीं! कुछ नहीं माँगता।

जैसे ध्रुव महाराज। ध्रुव महाराज माँगने के लिए गया, तपस्या किया, बहुत तपस्या किया। ज़्यादा नहीं, छह महीना किया, बाक़ी कठोर तपस्या किया। बालक, पाँच वर्ष उम्र। भगवान बड़ा सन्तुष्ट हो करके उनको दर्शन दिया। भगवान... ध्रुव महाराज ध्यानावस्थित था, भगवान का दर्शन कर रहा था। हठात् देखा कि दर्शन नहीं हुआ, तो आँख खुल गया। देखा कि वही भगवान सामने। जिसको दर्शन कर रहा था हृदय में, ये भगवान के लिए क्या मुश्किल है क्या?

भगवान जब ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति। जब आपका हृदय में, सब का हृदय में बैठे हुए हैं, वो चाहें तो बाहर आ करके आपको दर्शन दें। सर्वशक्तिमान। भगवान के लिए मुश्किल है क्या? मुश्किल नहीं, कुछ नहीं है। भगवान हृदय में भी दर्शन दे सकता है, बाहर भी।

तो जब भगवान दर्शन दिया, और ध्रुव महाराज को बोला, "बेटा, क्या माँगते हो? माँग ले। अब तो हम सामने खड़ा हूँ।" तो भगवान को देख करके विभोर, विमोहित हो गया। बोलता है, स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे। भगवान... "स्वामी, आप तो हमारा स्वामी हैं, सब कुछ दे सकते हैं। बाक़ी मैं इतना सन्तुष्ट हो गया कि अब हमको माँगने का कुछ नहीं।" ये भक्त का... जिसको भगवान मिल जाता है, उसको क्या चाहिए? सब मिल गया। जो चाहे उसको मिल गया।

तो वो माँगने का... और जब तक भगवान को नहीं मिलेगा, वो माँगते ही रहेगा। चाहे कर्मी होय, चाहे ज्ञानी होय, चाहे योगी। इसलिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि भगवान और भक्त से जो dealings है, जो व्यवहार है, उसमें जो आनन्द है, उसका नाम है भक्ति। उसका नाम है भक्ति। इसलिए चैतन्य महाप्रभु बताया है—

एइ रूपे ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोनो भाग्यवान् जीव
गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्तिलता-बीज

तो यदि वो उसको जो अज्ञात सुकृति, उसको भर गई होगी, तो कोई ऐसी वैष्णव उनको मिल जाता है, जिसके ज़रिए से उसको भक्तिलता का बीज मिलता है। ये जैसा पेड़ का बीज मिलता है।

माली हञा सेइ बीज करे आरोपण
श्रवण-कीर्तन-जले करे सेचन

कि जैसा बीज मिलने से जो माली है, उसको रोपण करता है और आहिस्ता-आहिस्ता पानी सींचता है, फिर आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ जाती है। इसी प्रकार भक्तिलता बीज, भक्त का कृपा से, वैष्णव का कृपा से जब हम लोग को मिल जाती है और इसको हम लोग अगर ठीक दिल से रोपण करें और ये श्रवण-कीर्तन जल—जैसा बीज में पानी डालने पड़ता है, इसी प्रकार वो भक्तिलता बीज को बढ़ाने के लिए जो पानी है, ये श्रवण और कीर्तन। भगवान का विषय सुनना और कीर्तन करना। ये दो चीज़ हम लोग अगर करें और ये... वो बढ़ जाएगी और आगे जा करके प्रेम-फल देगा।

जैसा सब... पादप, वृक्ष का फल होता है। ये जो भक्तिलता बीज में जो वृक्ष उत्पन्न होता है, वो उसका फल होता है प्रेम-फल। भगवत्-प्रेम। उसको लाभ होगा। तो इधर भी रहते हुए भी यदि प्रेम-फल उसको लाभ हो गया, फिर वो कहेंगे कि, "भगवान, और हमको कुछ नहीं चाहिए। स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे।" उस समय वो असल मुक्ति।

और जब तक कुछ माँगेगा ये दुनियादारी में, चाहे कर्मी से, और ज्ञानी से, और योगी से—सब माँगने वाला है। जब कुछ नहीं माँगेगा कि हमको वरं न याचे, कुछ नहीं चाहिए, उस समय समझ लीजिए वो असल मुक्ति है। और नहीं तो मुक्ति का कोई बात ही नहीं है।

तो वो ज्ञान जो है, ये भगवान 13वें अध्याय में बताया है, अभी हमने सुनाया। अमानित्वम्, अदम्भित्वम्... 13वें अध्याय में, 8 से 12।

अमानित्वम्। अमानित्वम्—ये जो पहले हम लोग का material disease है, भौतिक रोग। ये जो मानित्वम् है। "अरे, हम भारतीय हैं और आप अमेरिकन हैं, आप हमसे नहीं मिल सकते हैं। ये मैं ब्राह्मण हूँ और आप शूद्र हैं।" ये सम्मानित... हम प्रमाणी हैं। क्योंकि हमको ये शरीर मिला है, अच्छा शरीर मिला है।

तो पहली ज्ञान है अमानित्वम्। अमानित्व! ये भूल धारणा है कि मैं शरीर हूँ। तुम ब्राह्मण है, तुम American है, तुम Indian है, तुम सफ़ेद है, तुम काला है, तुम विद्वान है, तुम मूर्ख है, तुम धनी है, तुम ग़रीब है—ये इस विषय में अज्ञान।

तो पहले इसको सीखना चाहिए कि मैं धनी भी नहीं है, मैं ग़रीब भी नहीं है। मैं सफ़ेद भी नहीं है, मैं काला भी नहीं है। मैं American भी नहीं है, मैं Indian भी नहीं है। मैं ब्राह्मण भी नहीं है, मैं शूद्र भी नहीं है। ये चैतन्य महाप्रभु सिखाया। नाहं विप्रो... और जो... "तो मैं ब्राह्मण नहीं है," चैतन्य महाप्रभु बोलते हैं। "मैं शूद्र भी नहीं हूँ, मैं संन्यासी भी नहीं हूँ, मैं गृहस्थ भी नहीं हूँ।" सब नहीं है, नहीं है। क्योंकि वास्तविक मनुष्य समाज में ये चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टम्। वर्णाश्रम, चार वर्ण और आश्रम, इसका विचार। ये जब तक नहीं है, वो कुत्ता-भेड़ी है।

ये भी छोड़ना चाहिए। पहले कुत्ता-भेड़ी का जो अवस्था है, उसको छोड़ करके, one cultured, one should become ब्राह्मण, और क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, कोई culture। उसको भी छोड़ने पड़ेगा। उसका नाम है सर्व-धर्मान्परित्यज्य। जब तक ये चातुर्वर्ण्य, वर्णाश्रम धर्म में भी रहेगा, तब तक ये भौतिक platform। उसको भी छोड़ने पड़ेगा। इसलिए भगवान बताया, सर्व-धर्मान्परित्यज्य।

कहने का मतलब है, ये जो तुम्हारा अभिमान है कि American है और Indian है, ब्राह्मण है, क्षत्रिय है, सादा है, काला है, और उसका अनुयायी जो तुम काम कर रहे हो, ये सब छोड़ना। इसका नाम है अमानित्वम्।

अदम्भित्वम्—और ये जो मानित्वम्, false prestige, "अजी, हम ब्राह्मण हैं, हम क्षत्रिय हैं, हम American हैं।" ये prestige एक झूठा है सभी का। सभी समझता है, 'हम बड़ा हैं और सब छोटा है।' ये एक material disease है।

तो उसको भी छोड़ो, अदम्भित्वम्। ये जो दम्भ है, prestigious position, इसको भी छोड़ दीजिए।

अमानित्वमदम्भित्वम्... अहिंसा। अहिंसा—एक-एक शब्द का अर्थ अगर विचार किया जाए, एक-एक रात लग जाएगी। थोड़ा संक्षेप में बताते हैं। अहिंसा—अब देखिएगा ये जो श्लोक में, 8 से 4, 8 से 12 तक, ये जो चार-पाँच श्लोक है, इसमें सब ज्ञान पूर्ण ज्ञान, ज्ञान योग का सोपान है, रास्ता है। सब सम्पूर्ण ज्ञान। कोई भी आप धर्म लीजिए, कोई भी moral instruction लीजिए, सब चीज़ इसमें मौजूद है।

जैसा अहिंसा। तो वो अहिंसा तभी हो सकेगा जब अमानित्वमदम्भित्वम्। नहीं तो अहिंसा कभी नहीं होगा। ये सब बड़ा विचार से भगवान स्वयं बता रहे हैं। अहिंसा तो तभी हो सकती है जब अमानित्वमदम्भित्वम्।

अहिंसा साधारण हिसाब है कि वृथा किसी से हिंसा ना करो। कोई कारण नहीं है। जैसा वो जानवर को मार के खाना। साधारण हम लोग यही समझते हैं। तो यदि आपको और अच्छी-अच्छी चीज़ सब मौजूद है, आपको खाने को मिलता है, उसमें आप शरीर पुष्टि कर सकते हैं, तो आप क्यों झूठ-मूठ एक बेचारी ग़रीब जानवर को मारें? इसका नाम है ज्ञान।

जब भगवान हमको गेहूँ दिया है, चावल दिया है, घी दिया है, दूध दिया है और फल दिया है, vegetable दिया है, उससे हम अच्छी-अच्छी सब खाने का चीज़ बना सकते हैं और उसको भगवान को भोग लगा करके प्रसाद पा सकते हैं, तो एक झूठ-मूठ एक क्यों ग़रीब जानवर को... इसका नाम अहिंसा। ये बात नहीं है कि जो बिना खा करके मर जाइए। नहीं। हिंसा सम्भव... यदि आप किसी को छोड़ सकते हैं, तो छोड़िए। उसका नाम अहिंसा।

आजकल जो मनुष्य समाज असभ्य रहता है, जब वो धान-चावल पैदा करने को नहीं जानते हैं, जंगल में रहता है, जंगल काट करके, वो खेती बना करके धान-चावल बना नहीं सकता है, उस समय जानवर मार के खाए, उसमें पाप नहीं। बाक़ी भगवान आपको सब बनाया है, आप ख़ूब अच्छी तरह से आपका खाद्यद्रव्य बना सकते हैं और झूठ-मूठ एक जानवर को मारें, वो जब आप सीखेंगे, उसका नाम अहिंसा।

भगवान कहते हैं:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं
ये आपका अधिकार है। ये एक जानवर को मार करके एक जानवर खाता है, ये प्राकृतिक नियम है। बाक़ी उसका मतलब नहीं है कि जीव को मार के हमारा खाना ही है, तब आपका लड़का को मार के खा लो। नहीं। उसका नियम है। मनुष्य के लिए भगवान बताते हैं:
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति
आपको ख़ाली खाने को नहीं है, आप भगवान को दे करके खाइए। प्रसाद बना करके खाइए। यो मे भक्त्या प्रयच्छति, पहले भगवान को दीजिए। तो भगवान को कौन चीज़ दीजिएगा? भगवान तो बोलते नहीं, "मांस और डिम्बा दीजिए।" भगवान बोलते हैं, पत्रं पुष्पं... दीजिए भगवान को, vegetable दीजिए, गेहूँ दीजिए, दूध दीजिए और उसको प्रसाद बना करके आप भोजन कीजिए। ये मनुष्य जीवन है। इसका नाम अहिंसा।

और नहीं तो जो ख़ुशी हम खा लिया, जो कुछ कर लिया, तो वो ज्ञान नहीं, वो अज्ञान। ये अज्ञानी लोग करते हैं। जो ज्ञानी होता है, वो नहीं करता।

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्
और सब समय सन्तोष रहना चाहिए कि भगवान की कृपा से जो कुछ हमको मिला है, बस ठीक है। भगवान सबको खाने को देता है, हमको जो दिया है, वो ठीक है।

और सरलता। आर्जवम्। ये मनुष्य जीवन का ज्ञान, सरल। सरलता शास्त्र में ऐसे बनाते हैं, बताते हैं कि अगर कोई दुश्मन आपको पूछे कि, "बोलिए सा'ब, आपका भीतर क्या ख़बर है?" "हाँ, यह सरल बात।" आर्जवम्, ये ब्राह्मण का काम है। ये सब विचार है।

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसा क्षान्तिरार्जवम्
आचार्योपासनम्

ये सब ज्ञान, भक्ति कब मिलेगा? आचार्योपासनम्। जो आचार्य हैं, परम्परा। जैसे हमारा भारतवर्ष में आचार्य सम्प्रदाय हैं—रामानुजाचार्य, मध्वाचार्य, विष्णुस्वामी, चैतन्य महाप्रभु, ये शंकराचार्य, इनको भी आचार्य मानते हैं हम लोग। तो कम से कम ये आचार्यों का उपासना कीजिए।

तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्
आचार्य के पास जाना चाहिए। वो आचार्य वो सम्प्रदाय में... रामानुज अभी उपस्थित नहीं हैं, बाक़ी रामानुज सम्प्रदाय का वैष्णव हैं। इसी प्रकार चैतन्य महाप्रभु उपस्थित नहीं हैं, बाक़ी चैतन्य महाप्रभु का सम्प्रदाय का आचार्य जो हैं, वो आचार्य के पास। तब तो आप सीखेंगे। बीड़ी वाले के पास जाने से क्या आप सीखेंगे? नहीं! जो तो आचार्य के पास जाइए और उपासना कीजिए। पहली पूजा आचार्य को, फिर भगवान को।

आचार्यं मां विजानीयान्
शास्त्रों में कहते हैं, भगवान कहते हैं, एकादश स्कन्ध में, "जो आचार्य है, वो मैं ही हूँ।" इसलिए आचार्य को सम्मान करना चाहिए भगवान जैसा। बाक़ी आचार्य नहीं कहते कि 'मैं भगवान हूँ'। बाक़ी उनका अधिकार है भगवान की तरफ़ से। जो शिष्य है, उनसे सेवा लेने का अधिकार है। वो भगवान के पास पहुँचा देते हैं। अपने के लिए नहीं लेते।

किन्तु वो अपने को जानते हैं, 'मैं क्षुद्र भगवान का नौकर हूँ।' तो जैसा viceroy होता है, viceroy को पहले था, उसको सम्मान दिया जाता, बाक़ी वो राजा के तरफ़ से सब काम करते हैं। इसी प्रकार आचार्य जो हैं, वो शिष्य से जो सेवा लेते हैं, वो भगवान को पहुँचाने के लिए। इसलिए विश्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर बताया है:

यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो
यदि आप आचार्य को सन्तुष्ट किया, तो समझ लीजिए भगवान सन्तुष्ट हो गए।
यस्य प्रसादाद् भगवत्-प्रसादो यस्याप्रसादान् न गतिः कुतोऽपि
और यदि आचार्य को आप सन्तुष्ट नहीं किया, तो आपका कोई स्थान नहीं है। आप बिगड़ गए।

इसलिए आचार्योपासनं शौचं। वो बाहर-भीतर शौच होना चाहिए।
अपवित्रः पवित्रो वा सर्वावस्थां गतोऽपि वा
यः स्मरेत्पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तरः शुचिः

तो ये जो, जैसे स्नान करना, अच्छी तरह से soda, ये साबुन, तेल लगा करके ख़ूब स्नान करना चाहिए सवेरे। वो तो बाहर का हुआ बाह्य शौच हुआ। और भीतर का भी शौच होना चाहिए। भीतर का शौच करने के लिए वही—
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे

तो ये तो एक-एक शब्द का जो भगवान बताए हैं, उसको विश्लेषण करने से... आहिस्ता-आहिस्ता आप लोग पढ़िएगा, सब चीज़ है भगवद्गीता में। उसको आप लोग चर्चा करिए, अच्छी तरह से समझिए और आचार्यों से सुनिए, तब आपका जीवन सफल होगा।

ये Krishna consciousness movement का उद्देश्य है जो सबको मनुष्य... जिसको-जिसको मनुष्य जीवन मिला है, वो इस मौक़ा को बर्बाद ना करे। वो अच्छी तरह से ये सब सीखे और जैसा भगवान बता रहे हैं, उसको अच्छी तरह से सोचे। और कुत्ता-गधा का ऐसा यदि हम लोग रहे, तो समझ लीजिए हम लोग वो मृत्यु-संसार-वर्त्मनि... फिर 84 लाख योनि के अंदर हमको जाना पड़ेगा। ये बड़ा उत्तरदायित्व है कि ठोकर खाए ऐसे जीवन-यापन नहीं करनी चाहिए। उत्तरदायित्व से भगवान जैसा बताते हैं, उसको सुनिए, उसको अपनाइए, जीवन आपका सफल होगा।

Thank you very much.

श्रोता (प्रश्नकर्ता): "हरे रामा हरे रामा रामा रामा हरे हरे" का अपने-आप जाप करना उचित है या गुरु धारण कर उनसे नाम लेकर जाप करना आवश्यक है?

प्रवक्ता (श्रील प्रभुपाद): नहीं, गुरु से सुनना चाहिए। जिसको दीक्षा कही जाती है। तद्विज्ञानार्थं... मंत्र आचार्य से ही लेना चाहिए।

श्रोता (प्रश्नकर्ता): प्रेम प्राप्ति या कृष्ण प्राप्ति अंतिम है या इससे भी आगे जाना होता है? क्या गोलोक धाम जाने के बाद जीव को वापस आवागमन में नहीं आना पड़ता? यदि नहीं, तो शिवलोक, विष्णुलोक में जाने वाला भी मुक्त किया जाता है या नहीं?

प्रवक्ता (श्रील प्रभुपाद): तो भगवद्गीता में बताया है कि—
यद् गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम
भगवान का धाम सभी है। बाक़ी परम धाम जो है, वो गोलोक वृन्दावन है। उधर जाने से... क्यों आएगा? परम सुख जब मिलता है।

चिन्तामणि-प्रकर-सद्मसु कल्पवृक्ष-
लक्षावृतेषु सुरभीरभिपालयन्तम्

तो क्यों आएगा? भगवान भगवद्गीता में बता रहे हैं:
त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति
वो इतना सुख मिलता है, वो क्यों इधर आएगा? वो आवागमन से छुट्टी हो जाती है। अगर चाहे तो आ सकता है। ये स्वतंत्रता सब समय है। और कभी भगवान का हुकुम से भी आते हैं, जीव को उद्धार करने के लिए। जैसे भगवान आते हैं, उसी प्रकार कोई भक्त को भेज देते हैं कि, "जाओ जी, तुम उधर जाओ, प्रचार करो।" वो आते हैं। वो साधारण व्यक्ति नहीं हैं। वो नित्य-मुक्त हैं।

वो भगवद्गीता में बताया है कि दो प्रकार के जीव होते हैं। एक नित्य-मुक्त होते हैं और एक नित्य-बद्ध होते हैं। तो जो भगवान के तरफ़ से आते हैं, वो मुक्त जीव हैं। जैसे भगवान आते हैं, नित्य-शुद्ध-पूर्ण-मुक्त। उसी प्रकार जो भगवान के भक्त उधर से आते हैं, वो भी नित्य-शुद्ध-पूर्ण-मुक्त। वो चाहे किसी जगह में जन्म ले, किसी तरह में आए, परन्तु वो नित्य-शुद्ध-पूर्ण-मुक्त।

भगवान के पास चले जाने से, फिर भगवान की सेवा में... जो भगवान के पास नहीं जा सकते, ये ख़ुशी से जाता नहीं। जैसे ज्ञानी लोग, वो ब्रह्म, निर्विशेष ब्रह्मज्योति में रहने चाहते हैं। ब्रह्मज्योति जो है, बाहरी चीज़। है तो वैकुण्ठ लोक में, spiritual world में, परन्तु वैकुण्ठ के बाहर में। जैसे सूर्य लोक है और सूर्य रश्मि जो है, वो सूर्य लोक से बाहर। इसी प्रकार ब्रह्मज्योति जो है, वो वैकुण्ठ से बाहर।

यस्य प्रभा—ये ब्रह्मज्योति जो है, वैकुण्ठ लोक का प्रभाव विशेष। तो उसमें जाने से वो नित्य सत्ता मिलता है, परन्तु आनन्द नहीं मिलता। आनन्द नहीं मिलता। जैसा आपको ये तजुर्बा है, जब aeroplane में जाते हैं बहुत दूर में और अगर 8 घंटा, 6 घंटा, 10 घंटा हो गया, फिर दिल घबरा जाता है। कब नीचे जाएँगे, कब नीचे जाएँगे।

इसी प्रकार जो monist है, ब्रह्मज्योति में रहने से क्या होगा?
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः पतन्त्यधो
उसमें आनन्द नहीं मिलता है। इसलिए फिर ये दुनिया में आ करके, भौतिक जगत् में आ करके, बड़े-बड़े सब संन्यासी लोग—'ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या', ये सब छोड़-छाड़ के ब्रह्म सत्य में जाता है, उधर कुछ मिला नहीं, फिर जाके school खोलो, college खोलो, और homeopathic दवाई खोलो, और ये सब काम में लग जाते हैं। क्योंकि असल चीज़ मिला नहीं।

आयोजक / अन्य वक्ता: जब गुरु महाराज जी गीता के ऊपर में व्याख्यान देते थे, तो उन्होंने कहा था कि एक-एक जो शब्द है, उसको समझाने के लिए एक-एक रात लग सकती है। तो अभी time तो बहुत ज़्यादा हो गया और प्रश्न भी आप लोग के बहुत आए हैं। तो मैंने सोचा कि बहुत आप लोग का प्रश्नों का हल बहुत आसान हल... क्योंकि अगर आपने प्रश्न... तो उन्होंने जो शब्द उच्चारण किए हैं, वो तो आपको याद नहीं रहेगा, और प्रश्न का वो उत्तर जो है, वो भी याद नहीं रहेगा। इसके लिए... हमारी संस्था एक 'भागवत दर्शन' नाम का एक magazine जो है, वो प्रकाशित करती है।

जिसमें गुरु महाराज जी के व्याख्यान हैं और उसी में जितने भी आपके प्रश्न हैं, उनका उत्तर है। मैं नहीं समझता कि कोई ऐसा प्रश्न होगा आप लोग के मन में जिसका इसमें उत्तर नहीं मिलेगा। वैसे तो इसकी जो cost price थी, हम लोग पैसे के लिए नहीं, ऐसे मतलब donation के लिए इसको देते थे ₹1.50 को। लेकिन आज मैंने सोचा क्योंकि आप लोग के पास बहुत प्रश्न हैं, तो इसका सिर्फ़ ₹1 होगा।

₹1 में आपके जितने भी उत्तर हैं, वो सब हल हो जाएँगे। तो इसकी हम लोग के पास कुछ copies हैं। तो अभी हमारे कुछ भगतगण 5 मिनट के लिए या 3-4 मिनट के लिए आपके बीच में आएँगे और आप लोग ₹1-1 निकाल के रखिए और जिसको-जिसको magazine चाहिए...
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥