श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  751102LE-BOMBAY--Hindi.MP3
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
हरि कथा
बॉम्बे, 02-नवंबर-1975
 
 
 
भाइयों, मुझे भी हिंदी बोलने में ज्यादा अभ्यास नहीं है और हमारा शरीर भी कलकत्ता का है, हिंदी हमारी मातृभाषा भी नहीं है। [गला साफ़ करने की आवाज़] और गुजराती, गुजराती भी बोल नहीं सकता। थोड़ा-थोड़ा तो समझ लेता हूँ। जैसे दामजी भाई गुजराती में बताया, वह हम सब समझ गया, बाकी बोल नहीं पाता। तो जहाँ तक है, हिंदी में आपको सुनाऊँगा। अभी व्यक्तिगत हमारे जो शिष्य, श्रीमान Alfred Ford का विषय श्रीमान दामजी बताया, उनको अभी-अभी नाम दिया है अम्बरीष महाराज। अम्बरीष महाराज सारा पृथ्वी के सम्राट थे। बाकी उनको काम था भगवद्-भजन।

sa vai manaḥ kṛṣṇa-padāravindayor vacāṁsi vaikuṇṭha-guṇānuvarṇane (मनः कृष्ण-पदारविन्दयोः वाचांसि वैकुण्ठ-गुणानुवर्णने)। अम्बरीष महाराज सब राज-कार्य करते हुए भी सब समय अपना मन जो है, भगवान का चरणारविन्द में लगा देते थे। सभी मन, जो मन है, इसको यदि भगवान का चरण में कोई लगा देते, तो फिर उसी से उनको सब लाभ हो जाएगा। तो अम्बरीष महाराज सब समय अपना जो मन है, वह भगवान का चरण में लगा रखते थे। और vacāṁsi vaikuṇṭha-guṇānuvarṇane, जब बातचीत करते थे, तो भगवान का विषय ही करते थे। राजा थे, उनको तो ज्यादा बात करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि बड़े-बड़े minister लोग, secretary लोग, वह सब उनसे अगर कोई खास बात करने को है, तो वह vaikuṇṭha-guṇānuvarṇane। वैकुण्ठ का अर्थ होता है भगवान, और वैकुण्ठ लोक भी होता है जहाँ भगवान रहते हैं। वैकुण्ठ का अर्थ होता है जिधर कुण्ठा नहीं है, anxiety। यह दुनिया में सब समय anxiety है। सबको, मनुष्य भी हो और चाहे देवता भी हो, और चाहे पशु हो, पक्षी हो, सबको लिए वह जो anxiety, सब समय चिन्तन, आगे जाकर क्या होगा, यह सब सबका भीतर में। वैकुण्ठ का अर्थ होता है जहाँ यह anxiety नहीं है, कुण्ठा नहीं है, सब आनन्द है। brahma-bhūtaḥ prasannātmā na śocati na kāṅkṣati (ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति)। वह वैकुण्ठ लोक, mad-bhaktiṁ labhate parām (मद्भक्तिं लभते पराम्)। वह अब अम्बरीष महाराज, वह जब बातचीत करते थे, तो वैकुण्ठ का विषय; और चलते-फिरते थे, तो मन्दिर जाते थे; और रूप दर्शन करता था, भगवान का रूप दर्शन करते; और भगवान का चरण में जो फूल, तुलसी दी जाती थी, उसको घ्राण लेते; और जिह्वा में भगवान का प्रसाद ग्रहण करते। यानी सब इन्द्रिय है—आँख है, कान है, जिह्वा है, हाथ है, पैर है, सब कुछ है। अम्बरीष महाराज यह जानते थे कि यह सब इन्द्रिय किस तरह से भगवान में लगाना चाहिए। इसका नाम है भक्ति। hṛṣīkeṇa hṛṣīkeśa-sevanam bhaktir ucyate (हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते)। भक्ति का अर्थ क्या? sarvopādhi-vinirmuktaṁ tat-paratvena nirmalam (सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्)। यह जो हमारा सब इन्द्रिय है, इसको निर्मल करना चाहिए। अभी निर्मल नहीं है। जैसा हम लोग समझते हैं यह शरीर हमारा है, बाकी यह निर्मल ज्ञान नहीं है। निर्मल ज्ञान है—यह शरीर भगवान हमको दिया है। जैसा आप लोग हमारे जैसे संन्यासी को एक रहने का जगह देते हैं, इसी प्रकार यह जो शरीर है, यह हमको भगवान देता है। असल में, जैसे मकान मालिक एक कमरा हमको रहने को दिया है, उसका मतलब नहीं है जो कमरा हमारा सम्पत्ति हो गया। नहीं, सम्पत्ति तो मकान मालिक का है, बाकी हमको रहने को दिया गया है। इसी प्रकार यह जो शरीर है, इन्द्रिय है, यह सब भगवान की है, भगवान का उपकार करने के लिए है, और हमको रहने दिया गया है। मैं यदि यह शरीर से भगवान जो चाहते हैं, उस काम को मैं करता हूँ, तो उसकी नाम है भक्ति। और कुछ काम जो आप कर रहे हैं, sva-karmaṇā tam abhyarcya siddhiṁ vindati mānavaḥ (स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः), भगवान बताएं, अपना जो काम है करो, उसमें कोई दोष नहीं है। अगर दोष भी है, तब भी अपना काम नहीं छोड़ना। यह भगवान sadoṣam api (सदोषमपि)। दुनिया में कोई भी काम कीजिए, सभी चीज कुछ-न-कुछ दोष रहता ही है। भगवान खुद बताया है, जैसे अग्नि है पवित्र, उसमें भी एक दोष है—धूम है, धुआँ है। तो यह दुनिया में बिल्कुल पवित्र चीज हो ही नहीं सकती। परन्तु कोई भी चीज हो, कोई भी काम हो, यदि वह भगवान की सेवा के लिए है, तो उसका नाम है भक्ति। tat-paratvena nirmalam, वह निर्मल होता है। tat-paratvena, वह भगवान के लिए किया जाता है, इसलिए वह निर्मल है। इसलिए भगवान खुद बताते हैं कि api cet su-durācāro bhajate mām ananya-bhāk (अपि चेत् सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक्)—कि कोई व्यक्ति भगवद्-भक्ति शुरू किया है, अभी प्रवीण नहीं हुआ है, पूर्व अभ्यास के कारण कुछ-कुछ दोष भी मालूम होता है, तो उसके लिए भगवान क्या कहते हैं? su-durācāro, कोई व्यक्ति भगवद्-भजन कर रहे हैं, बाकी बहुत से दोष भी दिखाई देते हैं, तो भगवान उसके लिए बोलते हैं, अगर दुराचार नहीं, अगर सुदुराचार भी हो, api cet su-durācāro, बाकी एक गुण अगर उसका है, जो भगवान को छोड़ के और कुछ जानता नहीं, अनन्य भाव, केवल कृष्ण को ही जानते हैं, kṛṣṇas tu bhagavān svayam। इस प्रकार गुण जिसका है, उसका अगर काम में कभी दोष भी दिखाई पड़े, तो sādhur eva sa mantavyaḥ (साधुरेव स मन्तव्यः)—वह साधु है।

यह हमारा दामजी भाई जैसा साधु का महिमा वर्णन कर रहे थे, वास्तविक साधु महिमा सम्पन्न है। चैतन्य महाप्रभु बताए हैं: sādhu-saṅga, sādhu-saṅga, sarva-śāstra-kaya / lava-mātra sādhu-saṅge sarva-siddhi haya (साधु-सङ्ग, साधु-सङ्ग, सर्व-शास्त्र कय। लव-मात्र साधु-सङ्गे सर्व-सिद्धि हय॥) सब शास्त्र में साधु-सङ्ग करने के लिए उपदेश दिया है। हाँ, tato duḥsaṅgam utsṛjya (ततो दुःसङ्गम् उत्सृज्य), बुद्धिमान। इसलिए जो बुद्धिमान है, वह दुःसङ्ग को त्याग करके साधु का सङ्ग... यह भगवद्-भक्ति लाभ करने के लिए साधु-सङ्ग प्रधान है। ādau śraddhā tataḥ sādhu-saṅgo 'tha bhajana-kriyā / tato 'nartha-nivṛttiḥ syāt tato niṣṭhā rucis tataḥ / athāsaktis tato bhāvas tataḥ premābhyudañcati / sādhakānām ayaṁ premṇaḥ prādurbhāve bhavet kramaḥ (आदौ श्रद्धा ततः साधु-सङ्गोऽथ भजन-क्रिया। ततोऽनर्थ-निवृत्तिः स्यात् ततो निष्ठा रुचिस्ततः॥ अथासक्तिस्ततो भावस्ततः प्रेमाभ्युदञ्चति। साधकानामयं प्रेम्णः प्रादुर्भावे भवेत् क्रमः॥) भगवद्-प्रेम लाभ करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। दुनिया प्रेम में हम लोग फँसे हुए हैं। यह दुनिया का प्रेम को छुट्टी लेकर के... प्रेम तो रहेगा, बाकी भगवद्-प्रेम सबका भीतर है। जानवर का भीतर भी प्रेम है। कुत्ता भी अपना बच्चा को पालन करते हैं, शेर भी अपना बच्चा को पालन करते हैं। शेर, छोटे-छोटे बच्चे जब महान भयंकर शेर का ऊपर उछलता है, खेलता है, वह आराम पाते हैं। यह प्रेम का भाव है। तो प्रेम सभी में है, जीव मात्र में है। बाकी वह प्रेम, यह जो हम लोग दुनिया में लगाते हैं, यह इसके नाम है माया। और वही प्रेम जब भगवान में लगाइएगा, उसके नाम है भक्ति। [नाक से की जाने वाली आवाज़] इसलिए शास्त्र में कहता है कि sarvopādhi-vinirmuktaṁ tat-paratvena nirmalam / hṛṣīkeṇa hṛṣīkeśa-sevanam bhaktir ucyate (सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्-परत्वेन निर्मलम्। हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते॥)। हृषीकेश भगवान का नाम है, हृषीकेश, और हृषीक का अर्थ होता है इन्द्रिय। सो इन्द्रिय शुद्ध होकर, tat-paratvena nirmalam, भगवान की सेवा में लगाया जाएगा, उसके नाम है भक्ति।

तो यह हमारे पास जो पुस्तक है, यह चैतन्य-चरितामृत, इसका English में हम लोग भाषान्तर किया है। यह जैसा किताब आप हमारे सामने देख रहे हैं, ऐसी 17 किताब से सम्पूर्ण है। [नाक से की जाने वाली आवाज़] और यह सारा दुनिया में बड़े आदर से इसको ग्रहण करते हैं, चैतन्य-चरितामृत का। तो उसी से एक आज श्लोक आप लोग को सुनाऊँगा। यह उनके विषय है, सनातन गोस्वामी। चैतन्य महाप्रभु के छह गोस्वामी थे: रूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ, श्री-जीव, गोपाल-भट्ट, दास-रघुनाथ। यह चैतन्य महाप्रभु के प्रधान शिष्य थे और वृन्दावन में रहकर चैतन्य महाप्रभु का जो mission है, उसको प्रचार किया था। उसी धारा अनुसार, उनका पदानुसरण करके जो हम लोग विचार दुनिया में प्रकट कर रहा हूँ, यह चैतन्य महाप्रभु का विचार और उनका mission जो कि गोस्वामी लोग प्रचार किया था। और सभी शास्त्र छोड़ दिया है, उसी को हम लोग खास करके English language में, भाषा में रूपान्तर करता हूँ, और German भाषा में, French भाषा में, Spanish भाषा में, यह सब European भाषा। तो किताब हमारा खूब बिकता है। आप सुनकर तो आश्चर्य हो जाएँगे कि हम लोग 25 से 30 लाख रुपया की किताबें हर महीना में बेचता हूँ। और इसी में हम लोग का खर्च चलता है। और जैसा यह बालक, श्रीमान Alfred Ford, यह हम लोग को कम से कम ढाई करोड़ दिया है। [प्रशंसा] तभी हम लोग का खर्च चलता है। हमारा खर्च है कम से कम 40 लाख माहवारी। 100 center हैं, तो सब भगवान की कृपा से चल रहा है। एक center आपका Nairobi में खोला गया है। उसमें आप लोग सबको अच्छी तरह से सहयोग कीजिए और किताबें पढ़िए, और क्या हम लोग mission प्रचार कर रहा हूँ, उसको समझिए।

यह कोई धर्म विशेष का बात नहीं है, असल में यही धर्म है। धर्म क्या चीज है? हाँ, उसको यमराज ने बताया, जो कि धर्मराज हैं, धर्म का विचार करते हैं। वह धर्म का विषय, उनको जब पूछा गया, उनका अनुचर वर्ग... यह अजामिल महापापी थे और इसको यमदूत ले आना था, बाकी विष्णुदूत आकर इसको रक्षा की और लाने को नहीं दिया। धर्म-अधर्म का क्या विचार है? उस समय धर्मराज बोला था: dharmaṁ tu sākṣād bhagavat-praṇītam (धर्मं तु साक्षाद् भगवत्-प्रणीतम्)। धर्म जो है, वह जो भगवान जो कानून बता देता है, उसका नाम है धर्म, और सब अधर्म। और सब अधर्म है। इसलिए भागवत में पहले ही बताया है: dharmaḥ projjhita-kaitavo 'tra śrīmad-bhāgavate (धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र श्रीमद्-भागवते)। कोई धर्म प्रोज्झित... प्रोज्झित का अर्थ होता है प्रकृष्ट रूप से उज्झित। जैसे आप लोग कमरे को साफ करते हैं और खूब अच्छी तरह से झाड़-पूँछ करके मैला सब निकाल बाहर कर देते हैं, इसी प्रकार जो धर्म नहीं है, उसको अच्छी तरह से झाड़ू देकर के निकाल बाहर कर दिया गया है। यह भागवत धर्म है, projjhita-kaitavo 'tra paramo nirmatsarāṇāṁ satām (परमो निर्मत्सराणां सतां)। और यह जो धर्म है, परम धर्म, वह किसके लिए है? वह निर्मत्सराणां के लिए, जिसको हिंसा नहीं है, मत्सरता। मत्सरता का अर्थ प्रकाश क्या है? श्रीधर स्वामी: matsaratā para-utkarṣa-asahanam (मत्सरता पर-उत्कर्ष-असहनम्)—दूसरे की तरक्की हो रही है, उसको देखकर के जो जलता है, उसका नाम है मत्सरता। para-utkarṣa-asahanam, दूसरे का उत्कर्ष सहन नहीं हो रहा है। यह दुनिया का नियम है। अपना भाई का भी तरक्की हो रही है, तो भाई देखकर जलेगा, दूसरे का बात छोड़ दीजिए। Person to person व्यक्तिगत तो होता ही है, लेकिन समाज का तो होता है, कौम, फिर धर्म—हिन्दू, मुसलमान, और फिर national, फिर party। यह केवल मत्सरता, केवल मत्सरता। इसलिए यह जो भागवत धर्म है, उसके लिए है जो कि मत्सरता छोड़ दिया। vāstavaṁ vastu (वास्तवं वस्तु), वास्तव वस्तु जो है, झूठा वस्तु नहीं, जो वास्तव वस्तु है उस विषय में। तो वह जो धर्म है, dharmaḥ projjhita-kaitavo, यही वास्तविक लक्ष्य वस्तु है। जैसे भगवान स्वयं कहते हैं कि: paritrāṇāya sādhūnāṁ vināśāya ca duṣkṛtām / dharma-saṁsthāpanārthāya sambhavāmi yuge yuge (धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे)। "मैं धर्म स्थापन करने के लिए युग-युग में अवतरण करता हूँ।" तो वह धर्म भगवान क्या बताया? जो धर्म का संस्थापन करने के लिए भगवान आते हैं, वह क्या धर्म है? वह है: sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ vraja (सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज)। "वह धर्म... जितने दुनिया में धर्म सब बनाया गया है, यह सब धर्म नहीं है, यह सब कोई कपट धर्म है। असल धर्म है भगवान में शरणागति।" जो भगवान, "इतना दिन आपको मैं भूल के रहा और सारा ब्रह्माण्ड में घूम-घूमते घूमते, अनेक प्रकार 84 लाख योनि में भ्रमण करते-करते हमारा ज्ञान नहीं हुआ। अब जाकर के आपकी कृपा से, tvat-prasādād..." जैसे अर्जुन बताया: naṣṭo mohaḥ smṛtir labdhā tvat-prasādān mayācyuta (त्वत्-प्रसादात्... नष्टो मोहः)। "आपकी कृपा से नष्ट मोह, हमारा मोह नष्ट हो गया।" और क्या मोह नष्ट होकर क्या करोगे? kariṣye vacanaṁ tava (करिष्ये वचनं तव)। "जैसा आप बोलते हैं, वैसे ही।" इसका नाम मोह नष्ट। हाँ, हमारी मन-माफिक आप काम नहीं करेंगे, जो आप बोलेंगे वही करेंगे। भगवान वही बोलता है: sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ—"हमारा शरणागत हो जाओ।" तो शरणागत होना माने मतलब क्या होता है? जो भगवान जो कहेंगे, उसको मानना, इसका नाम है भक्ति। या मन-माफिक जो भगवान कहते हैं, उसको करो, उसका नाम है भक्ति और उसका नाम है धर्म। जो भगवान का शरणागत हो जाते हैं और भगवान जैसे बोलते हैं, ऐसी बात करते हैं, वह है भक्त। और जो भक्त हुआ, वह मुक्त हो गया। वही भक्त मुक्त हो गया, क्योंकि भगवान खुद कहते हैं: "तुम शरणागत हो जाओ, ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi (अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि)।" जब भगवान उनको पाप से सब मुक्त कर देते हैं, फिर मुक्त होने का बाकी क्या रहेगा? आदमी दुःख भोगता है पाप से, और भगवान कहते हैं: ahaṁ tvāṁ sarva-pāpebhyo mokṣayiṣyāmi। तो जो भगवान के शरणागत हो जाते हैं, उसको तो पाप नहीं है, पाप सब खत्म हो गया। यद्यपि वह फिर पाप नहीं करे, तो फिर उसका पाप नहीं है, मुक्त हो गया। इस विषय में भगवान बताया है कि: māṁ ca yo 'vyabhicāreṇa bhakti-yogena sevate / sa guṇān samatītyaitān brahma-bhūyāya kalpate (मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते। स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते॥) जो अपनी भक्ति भगवान के चरण में लगा देते हैं, अव्यभिचारिणी। अव्यभिचारिणी भक्ति का अर्थ होता है जो भगवान जैसा बताते हैं और भगवान का कथनानुसार साधु-शास्त्र जैसे बताते हैं, उसका नाम है अव्यभिचारिणी भक्ति, विधि-भक्ति। ऐसे बड़े-बड़े आचार्य लोग विधि बताए हैं, कि विधि सब भगवान ही बताया है, दूसरे का बात छोड़ दीजिए। आचार्य जो होता है, जो भगवान जो विधि बताया है, उसी का अनुसरण करके काम करते हैं, उसका नाम है आचार। हाँ, तो भगवान जब कहते हैं: sarva-dharmān parityajya mām ekaṁ śaraṇaṁ—"हमारा चरण में शरणागत हो जाओ और कोई धर्म याजन करने की आवश्यकता है ही नहीं।" तो उसके नाम है शुद्ध भक्त। जो शास्त्र में जैसा दूसरे देवी-देवता को पूजन करने के लिए बताया, तो किसके लिए बताया? जो कि कामी है, जो कि दुनिया में भोग करने को चाहते हैं, उसके लिए: kāmais tais tair hṛta-jñānāḥ prapadyante 'nya-devatāḥ (कामैस्तैस्तैर्हृतज्ञानाः प्रपद्यन्तेऽन्यदेवताः)। जो अन्य-अन्य देवता का भजन करते हैं, पूजन करते हैं, कौन हैं? वह hṛta-jñānāḥ, वह काम के द्वारा उसका ज्ञान शून्य हो गया है, इसलिए दूसरी देवता को भक्ति करते हैं। वह दूसरी देवता से जो कुछ माँगते हैं, वह क्या भगवान नहीं दे सकते? दूसरी देवता लोग क्या हैं? वह तो भगवान का नौकर-चाकर हैं, तो मालिक क्या नहीं दे सकता? यदि कुछ आपको दुनियादारी के लिए कुछ चीज चाहिए, तो भगवान से प्रार्थना करने से भगवान क्या नहीं दे सकता है? इसलिए शास्त्र में बताया है: akāmaḥ sarva-kāmo vā mokṣa-kāma udāra-dhīḥ / tīvreṇa bhakti-yogena yajeta puruṣaṁ param (अकामः सर्वकामो वा मोक्षकाम उदारधीः। तीव्रेण भक्तियोगेन यजेत पुरुषं परम्॥) परम पुरुष कौन है? कृष्ण। जैसा अर्जुन समझा: paraṁ brahma paraṁ dhāma pavitraṁ paramaṁ bhavān / puruṣaṁ śāśvataṁ divyam ādi-devam ajaṁ vibhum (परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्। पुरुषं शाश्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम्॥)। यह भगवान कृष्ण हैं, आदि पुरुष, गोविन्द। तो दुनिया में तीन प्रकार के लोग होते हैं। एक तो है अकामी, जिसको कोई कामना है ही नहीं, जिसको भगवान मिल गया है, उसका कुछ कामना ही नहीं है। ध्रुव महाराज, 5 वर्ष के बालक, उनको सौतेली माताजी अपमान किया था, तो उसकी प्रतिज्ञा है कि "मैं पिताजी का जैसा राज्य है, उससे भी कोई बड़ा चीज मैं लाभ करूँगा।" तो भगवान का भजन किया। तो जब भगवान का दर्शन हुआ, क्योंकि भगवद्-भजन करते-करते पवित्र हो गया, फिर उसकी कुछ कामना ही नहीं रही। तो जब भगवान का दर्शन हुआ, भगवान बोला, "बेटा, क्या चाहिए? क्यों इतना बालक हो तुम, तपस्या कर रहे हो, क्या चाहिए? माँग लो।" तो उस समय ध्रुव महाराज कहते हैं: svāmin kṛtārtho 'smi varaṁ na yāce (स्वामिन् कृतार्थोऽस्मि वरं न याचे), kācaṁ vicinvann api divya-ratnam (काचं विचिन्वन्नपि दिव्य-रत्नम्)। "मैं काँच के टुकड़ा ढूँढने के लिए आया था, अब हमको हीरा का टुकड़ा मिल गया, तो फिर हमको और क्या चाहिए? बस, और कुछ नहीं चाहिए। आपको जब दर्शन हो गया, फिर हमको क्या चाहिए?" कृतार्थोऽस्मि, यह भगवद्-भक्ति का लाभ है कि भगवद्-भक्ति लाभ होने से उसको सब चीज लाभ हो जाता है।

देखिए, business का point of view आप study कीजिए। यह जो Hare Krishna movement हमने शुरू किया था 40 रुपये से, अभी हमारे पास 40 करोड़ है। और 10 वर्ष में लाइए, कोई businessman लाइए, कोई businessman, और 102 center हैं। Businessman कितना branch खोल सकता है? तो यह बात सही है कि yaṁ labdhvā cāparaṁ lābhaṁ manyate nādhikaṁ tataḥ (यं लब्ध्वा चापरं लाभं मन्यते नाधिकं ततः)—जिसको लाभ हो जाने से फिर कोई लाभ का चीज ही नहीं होता, सब लाभ हो, ऐसी चीज है भगवद्-भक्ति। तो मनुष्य जीवन में चाहिए कि किस तरह से भगवद्-भक्ति लाओ, भगवद्-प्रेम। भगवद्-भक्ति का अर्थ होता है भगवद्-प्रेम, भगवान के लिए सब कुछ करने के लिए राजी। जैसे गोपी लोग, गोपी लोग कृष्ण रात 12:00 बजे बंशी बजा रहे हैं और गोपी लोग सब उधर दौड़ रहे हैं। कोई अपना बच्चा को पाल रहा था, उसको छोड़ दिया; कोई दूध पकाती थी, उसको छोड़ दिया; कोई गृहस्थ का काम छोड़ दिया। उनके पिताजी, ससुर, यह भाई, "कहाँ जाती है? कहाँ जाती है?" कौन पूछता है? चलो। समझ गए? इसलिए चैतन्य महाप्रभु बताए हैं जो गोपी लोग जैसा भजन किया था, यह भगवान के लिए अपना धन, प्राण, मन और यह संसार और प्रतिपत्ति, कोई नहीं, सब छोड़ दिया, इससे बढ़कर भजन नहीं है। चैतन्य महाप्रभु: ārādhyo bhagavān vrajeśa-tanayas tad-dhāma vṛndāvanaṁ / ramyā kācid upāsanā vraja-vadhū-vargeṇa yā kalpitā (आराध्यो भगवान् व्रजेश-तनयस्तद्धाम वृन्दावनं रम्या काचिदुपासना व्रजवधूवर्गेण या कल्पिता)। "व्रज-वधू लोग जिस तरह से भक्ति भगवान के लिए की थी, उसके बढ़कर के और कोई उपासना है नहीं।" आखिरी पल, और सब गोपियों से सबसे बड़ी गोपी जो है, राधा रानी। anayārādhito nūnaṁ... anayārādhate iti rādhā। यह सब विचार है भगवद्-भक्ति। और हम लोग यह श्रीमद्भागवतम् के अनुसार, śrīmad-bhāgavatam amalaṁ purāṇam, महापुराण है, इसको प्रचार कर रहे हैं और बड़े-बड़े आचार्य लोग जिस तरह से, जिस line में प्रचार किया है, उसको अनुसरण करते हैं, और भगवान की कृपा से फल भी हो रहा है।

तो ज्यादा समय नहीं रह गया, दो-चार बात और कह देंगे कि यह जो भगवद्-भक्ति प्रचार के लिए जो छह गोस्वामी लोग अपना जीवन दिया था, उसके भीतर सनातन गोस्वामी... यह सनातन गोस्वामी कौन थे? उस समय बांग्लादेश में जो मुसलमान पठानी राज्य था, नवाब हुसैन शाह, हाँ, वह बांग्लादेश के राजा थे, उनके minister, finance minister। तो यह चैतन्य महाप्रभु से जब उनकी मुलाकात हुई, तो अपना राज-काज छोड़कर के और चैतन्य महाप्रभु के पास चले आए। बड़ा मुश्किल से, वह राजा छोड़ नहीं रहा था, छोड़ नहीं रहा था, क्योंकि प्रधानमंत्री हैं और उनके ऊपर सब छोड़कर के... वह मुसलमान थे, मज़ा करते थे, यह बाकी राज-काज जो चलाने वाले यह दो भाई, रूप गोस्वामी हैं, सनातन गोस्वामी। तो वह resign देने से उनको बहुत हर्जा हुई, सनातन गोस्वामी को जेल में रख दिया था कि "तुम नहीं जा सकोगे।" ऐसी बात नहीं है, तो तब भी कोई किसी तरह से वह चले आए। तो वह सनातन गोस्वामी जब चैतन्य महाप्रभु यह काशी, वाराणसी में प्रचार कर रहे थे, उस समय वह आया बांग्लादेश से और उनको फिर संस्कार दिया गया कि परमहंस वेष, और उनको दो महीना तक भगवद्-भक्ति का विषय उनको खूब सिखाया। तो जब पहले मिला चैतन्य महाप्रभु से, तो सनातन गोस्वामी का यही प्रश्न था कि [गला साफ़ करने की आवाज़] कहते हैं: kṛpā kari' yadi more kariyācha uddhāra / āpana-kṛpāya kaha 'kartavya' āmāra (कृपा करि' यदि मोरे करियाछ उद्धार। आपन-कृपाय कह 'कर्तव्य' आमार॥) "अपनी कृपा से कहो कर्तव्य हमारा। आप तो कृपा करके हमको यह ministry से हटा करके और आपके चरण में ले आए हैं, तो कृपा करके बोलिए हमारा कर्तव्य क्या?" इसका नाम है गुरु के पास जाना। गुरु कोई official चीज नहीं है—गुरु बना लिया, गुरु अपने घर में रहे, हम घर में रहे, नहीं। यह सनातन गोस्वामी सिखा रहे हैं कि गुरु करने के बाद फिर क्या काम है? फिर काम है गुरु से शिक्षण लो कि जीवन में कर्तव्य क्या है। sad-dharma-pṛcchā, ādau gurv-āśrayaḥ (सद्-धर्म-पृच्छा, आदौ गुरु-आश्रयः)। हाँ, sādhu-vartmānugamanam, sad-dharma-pṛcchā—यह सब नियम है। हाँ, sad-dharma-pṛcchā, गुरु करके उनसे पूछना चाहिए सद्-धर्म क्या चीज है, जीवन को किस तरह से बनाना चाहिए। tasmād guruṁ prapadyeta jijñāsuḥ śreya uttamam (तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्)। गुरु किसके लिए जरूरत है? जो कि उत्तम विषय में जिज्ञासु है, उसके लिए। गुरु एक fashion नहीं है कि एक गुरु कर लिया हमने। गुरु उसके लिए जरूरत है: tasmād guruṁ prapadyeta jijñāsuḥ śreya uttamam। śreya uttamam, श्रेय माने भलाई, सभी चाहते हैं अपनी भलाई के लिए। तो सबसे उत्तम भलाई क्या है, उसको पूछने के लिए इसलिए गुरु की जरूरत है: tasmād guruṁ prapadyeta jijñāsuḥ śreya uttamam। तो फिर गुरु इस तरह से होने चाहिए जो कि उत्तम विषय में बता सकेंगे: śabde pare ca niṣṇātaṁ brahmaṇy upaśamāśrayam (शब्दे परे च निष्णातं ब्रह्मण्युपशमाश्रयम्)—यह गुरु का लक्षण है। शब्दे वेदे, शास्त्र में पारंगत हैं, śabde pare ca niṣṇātaṁ। जैसा पानी में हम लोग स्नान कर लेते हैं, बिल्कुल पानी में डूब करके और पवित्र हो जाते हैं, इसी प्रकार व्यक्ति जो ब्रह्म में स्नान किया है, śabde pare ca niṣṇātaṁ। और उसका फलस्वरूप क्या है? brahmaṇy upaśamāśrayam, और सब चीज छोड़कर, उपशम करके केवल ही ब्रह्म पद में उसको लगना है, यह गुरु का लक्षण है। तो चैतन्य महाप्रभु के पास आकर के यह सनातन गोस्वामी पूछा कि "हमारा कर्तव्य क्या है? आप तो कृपा करके हमको ministry से छुटा के ले आए हैं, और अभी हमारी क्या कर्तव्य है, यह आप बताइए।" [गला साफ़ करने की आवाज़] ke āmi', 'kene āmāya jāre tāpa-traya' / ihā nāhi jāni, 'kemane hita haya' (के आमि', 'केने आमाय जारे ताप-त्रय'। इहा नाहि जानि, 'केमने हित हय'॥) तो सनातन गोस्वामी बताए हैं कि "अब आपके पास आए हैं, तो हमको बताइए, मैं हूँ कौन? हम minister हैं, कि हम सनातन गोस्वामी हैं, कि और कुछ हैं? और कुछ, यही तो मैं जानता नहीं। जब जैसा समय हुआ, हम बन गया, उसी में बैठ गया, उसी में काम किया। लेकिन असल में हूँ मैं क्या, यह बताइए।" यह गुरु को प्रश्न होना चाहिए, यानी self-realization। प्रत्येक व्यक्ति अपने को समझता है यह शरीर को ही, देहात्म-बुद्धि—"मैं हिन्दू हूँ, मैं मुसलमान हूँ, मैं बंगाली हूँ, मैं गुजराती हूँ, मैं American हूँ, मैं Indian हूँ।" ऐसे-ऐसे अनेक प्रकार उपाधि से विभूषित होकर मैं अपने को समझता हूँ। असल में मैं हूँ क्या? यह पूछना। हाँ, हम कौन हैं? हम हिन्दू हैं, ना मुसलमान हैं, ना Christian हैं, गुजराती हैं, बंगाली हैं, और काला हैं या सफेद हैं? हैं क्या? हाँ, यह पूछना। यह गुरु के पास पूछना चाहिए, यानी self-realization, आत्मज्ञान। śrotavyādīni rājendra nṛṇāṁ santi sahasraśaḥ / apaśyatām ātma-tattvam... (अपश्यताम् आत्म-तत्त्वम्)। जो आत्म-तत्त्व नहीं जानते हैं, वह मूर्ख ही रह जाता है। तो इसलिए सनातन प्रभु, सनातन गोस्वामी यह पूछ रहे हैं: ke āmi', 'kene āmāya jāre tāpa-traya'। भगवद्-भक्ति पहले अपने को समझना कि मैं हूँ कौन, और यह तीन प्रकार के जो भौतिक यह जो pains हैं, उसको क्यों हमको सहना पड़ता है? हम तो चाहता... कौन मरने को चाहता है? बाकी सब मरता है। यह पूछना चाहिए कि "हम तो मरने को नहीं चाहता हूँ, हम तो अब बुढ़ापा में आने को नहीं चाहता हूँ, सब समय नौजवान रहना चाहता हूँ, फिर हमको जबरदस्ती क्यों बुड्ढा बनाया गया?" यह प्रश्न होना चाहिए। इसका नाम है सत्सङ्ग, और इसके लिए हमारा भारतवर्ष में अनेक प्रकार साधु-सङ्ग का विचार है, विशेष करके श्रीमद् भगवद्गीता जो कि स्वयं भगवान बता रहे हैं। तो हम लोग के लिए उचित है जो जैसा श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है, उस प्रकार शिक्षण लेकर के अपना जीवन धन्य करें।

और इधर जो हम लोग यह center खोला है, हमारा mission यही है और कुछ नहीं है, चैतन्य महाप्रभु का mission है। चैतन्य महाप्रभु का क्या mission है? यही mission है कि चैतन्य महाप्रभु ने बताया: bhārata-bhūmite manuṣya-janma haila yāra / janma sārthaka kari' kara para-upakāra (भारत-भूमितै मनुष्य-जन्म हइल यार। जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार॥) "जिसका भारतवर्ष में जन्म हुआ, साधारण मनुष्य नहीं है।" यह देवता लोग भी प्रार्थना करते हैं भगवान से कि "जब हमको और एक भारतवर्ष में जन्म दे दिया जाए।" हाँ, भारतवर्ष का जन्म ऐसे है। अभी तक इतना नास्तिकवाद फैलाया जाता है, तब भी भारतवर्ष में कुम्भ मेला होता है, करोड़ों आदमी आते हैं। और हम लोग को ऐसे ही कोई हीन-दीन व्यक्ति कोई अगर उत्सव करते हैं, तो रोजाना 20-30 हजार आदमी सब देखने को, सुनने को आते हैं। यह भारतवर्ष है अभी। इसलिए चैतन्य महाप्रभु विशेष करके बताया है कि: bhārata-bhūmite manuṣya-janma haila yāra / janma sārthaka kari' kara para-upakāra। तो आप लोग सब भारतीय हैं, भारतवर्ष में आप लोग का जन्म हुआ, इधर आए हैं व्यवसाय के खातिर में और कुछ देंगे, बाकी ठीक है। बाकी चैतन्य महाप्रभु कहते हैं: āmāra ājñāya guru hañā tāra' ei deśa (आमार आज्ञाय गुरु हञा तार' एइ देश) "जो हमारी आज्ञा है, आप लोग सब भारतीय जितने हैं, सब गुरु हो जाइए।" āmāra ājñāya guru hañā tāra' ei deśa। आप लोग Africa में आए हैं, यह Africa देश को उद्धार कीजिए, यह आप लोग का कर्तव्य है। खाली रुपया कमाना नहीं, रुपया कमाइए, बाकी परोपकार के लिए खर्च कीजिए इसको, यह भारत का कर्तव्य है, यह चैतन्य महाप्रभु का। और किस तरह से आप गुरु हो जाइए? "कैसे गुरु हैं? हमारे तो कोई विशेष विद्वान हैं नहीं, कुछ जानते ही नहीं।" नहीं, नहीं, कोई विद्वान होने की जरूरत नहीं है। फिर कैसे गुरु? yāre dekha, tāre kaha 'kṛṣṇa'-upadeśa (यारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश)। बस, गुरु हो जाओ। कोई ढोंग दिखाने की जरूरत नहीं है, सोना बनाने की जरूरत नहीं, केवल कृष्ण ने जो बताया है, उसको बताओ और गुरु हो जाओ। यही आप लोग से हमारा प्रार्थना है कि आप लोग भारतीय हैं, इस देश को उद्धार कीजिए। अब देखिए, American लोग कैसे कीर्तन कर रहे हैं। यह सभी आप लोग... हम परदेश से आदमी लाकर यह नचाते हैं, आप लोग नहीं नचा सकते हैं? क्यों? यह हमारी प्रार्थना है, आप लोग नचाइए। आप लोग इधर हैं, यह बेचारी परदेशी, Śyāmasundara जैसे, Europe से लाकर के इसको नचाना पड़ेगा हमको? यह आपसे प्रार्थना है, यह निवेदन है, इसको ग्रहण कीजिए। इस तरह से काम कीजिए, center मौजूद है, अच्छी तरह से उसको बनाइए। जैसे-जैसे शास्त्र में लिखा है, वैसे काम कीजिए, गुरु बन जाइए, उसको उद्धार कीजिए।

Thank you very much. Hare Kṛṣṇa.
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥