हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
अनंत कोटि वैष्णव वृन्द की जय!
नामाचार्य श्रील हरिदास ठाकुर की जय!
प्रेम से कहो श्री कृष्ण चैतन्य, प्रभु नित्यानन्द, श्री अद्वैत, गदाधर, श्रीवासादि गौर-भक्त-वृन्द की जय!
श्री श्री राधा-कृष्ण, गोप-गोपीनाथ, श्यामकुण्ड, राधाकुण्ड, गिरि-गोवर्धन की जय!
श्री वृन्दावन धाम की जय! नवद्वीप धाम की जय! जगन्नाथ पुरी धाम की जय!
गंगा माई की जय! यमुना माई की जय! तुलसी देवी की जय! भक्ति देवी की जय!
समवेत भक्तवृन्द की जय!
All glories to the assembled devotees! Hare Krishna.
All glories to the assembled devotees! Hare Krishna.
All glories to the assembled devotees! Hare Krishna.
गोविंद गोपाल, हरि गोविंद जय जय।
गोविंद गोपाल, गोविंद जय गोपाल॥
राधा-मुरारी गोविंद जय जय।
गोविंद जय जय, गोपाल जय जय॥
राधा-रमण हरि गोविंद गोपाल।
गोविंद गोपाल, गोविंद गोपाल॥
श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द।
श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर-भक्त-वृन्द॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
[Lecture]
सज्जनों, मात्र अंग्रेजी में जो आपको भाषण सुनाया गया... मैं जानता हूँ कि इधर अंग्रेजी बोलने की कोई आवश्यकता है नहीं। परंतु यह परदेश में जिस प्रकार प्रचार हो रहा है, उसमें कई अंग्रेज, American, Canadian और French, German नौजवान और युवतियाँ—ये सब हमारे जो श्रीमद् भगवद्गीता और कृष्ण भक्ति का प्रचार कर रहे हैं।
चैतन्य महाप्रभु ने ऐसा कहा था:
"भारत-भूमिते हैले मनुष्य-जन्म यार।
जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार॥"
भारत भूमि में जिसका मनुष्य जन्म हुआ है, उनके लिए चैतन्य महाप्रभु कहते हैं—जानवर के लिए नहीं—कि जिसका मनुष्य जन्म हुआ है, वह अपना जन्म सार्थक करके परोपकार करे। भारत भूमि की जो सभ्यता है, यह दूसरे को लूटने के लिए नहीं है। भारत भूमि की जो सभ्यता है, वह दूसरे को दान देने के लिए है। आप लोग थोड़ा इस पर ख्याल कीजिए। क्यों ये जो चैतन्य महाप्रभु कहते हैं कि 'जन्म सार्थक करो'? मनुष्य जन्म को सार्थक करने के लिए जो culture यानी ज्ञान-शिक्षा की आवश्यकता है, वह भारत भूमि में ही है और कहीं नहीं। मैं सारा पृथ्वी घूम-घाम के देख आया हूँ। हमारी जो कृष्ट सभ्यता—सामाजिक, पारमार्थिक, आध्यात्मिक—जो बड़े-बड़े ऋषि लोग बाँध गए हैं, उसके ऊपर और दुनिया में कहीं भी कुछ है नहीं। यह हम अच्छी तरह से देख चुके हैं।
परंतु खेद का विषय है कि हमारे भारत भूमि के जो लोग हैं, वे इस सभ्यता को विस्तार करने के लिए कोई प्रयास नहीं कर रहे हैं। बाहर के लोग इसको लेने के लिए बहुत तैयार हैं, वे लोग चाहते हैं। हाँ, जब भारत भूमि स्वाधीन हुई, उस समय परदेश में कुछ आशा थी कि इधर से जाकर के वास्तविक भारतीय सभ्यता क्या है, उधर उसका विस्तार हो। परंतु न कुछ प्रयास Government की तरफ से हुआ, न हमारी जो public है उनकी तरफ से कुछ प्रयास हुआ। हमारे गुरु महाराज, ॐ विष्णुपाद परमहंस परिव्राजकाचार्य श्रीमद् भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज, ये भारत भूमि की जो संपत्ति है—कृष्ण भक्ति—इसका विस्तार करने के लिए अपने जीवित समय में कुछ प्रयत्न किया था।
और सौभाग्य से हमको भी ऐसा कुछ हुक्म दिया था कि, "तुम जाकर के ये चैतन्य महाप्रभु की जो वाणी है, इसे परदेश में प्रचार करो।" उस समय, आज की बात नहीं है, बहुत दिन पुरानी बात है, तो मैं नहीं जानता था कि हमको इसी प्रकार गुरु महाराज का आदेश पालन करने के लिए परदेश में जाना पड़ेगा। परंतु उनके आशीर्वाद से मैं उधर गया। अनेक दिन बाद, 50 वर्ष बाद, हाँ, वह जो उनका मंत्र था, वह फलवती होने के लिए 50 वर्ष लगा। तो 1965 में मैं America में गया था, और हमारे पास मात्र 40 रुपये थे, जो कि एक घंटे का खर्च भी नहीं था। किसी तरह से भगवान की कृपा से, चैतन्य महाप्रभु की कृपा से, एक वर्ष इधर-उधर घूमते-घूमते, फिर New York में मैंने एक class खोल दिया—26, Second Avenue में। नौजवान और युवतियाँ, ज्यादातर जो हमारे शिष्य हैं, उनका 20 से 30 के अंदर ही सब उम्र है। आप देख रहे हैं, 25 के ऊपर कोई है नहीं।
तो इनको हमने सिखाया। कहने का मतलब है कि भारतवर्ष से इस संस्कृति को ले जाकर के परदेश में भारतवासी इसका प्रचार करें। परंतु मैं भी भारतवासी हूँ, यह ठीक है, परंतु अकेले इनको सिखा करके चारों ओर भेजा। किसी को London भेजा, किसी को Australia भेजा। हाँ, पैसा यही लोग देते हैं, उधर खर्च बहुत होता है। जब London में हम... ये जो श्रीमती जमुना देवी जो आपके सामने नाच रही हैं, ये और इनके पति गुरुदास, ऐसे छह गृहस्थ भक्त हमारे, इनको सब London में भेजा। एक वर्ष ये लोग बहुत तकलीफ करके London में भी अब हमारा मंदिर स्थापित किए हैं। आप लोग कभी London में जाइएगा तो 7 Bury Place, British Museum के पास में हमारा London का मंदिर है। इसी प्रकार America में प्रायः सब बड़े-बड़े शहरों में मंदिर हैं। विशेष करके, खास करके Los Angeles में बहुत भारी मंदिर है। और उधर कम से कम 50-100 भक्त उधर रहते हैं और काम अच्छी तरह से हो रहा है।
इधर इनको हम जो ले आए हैं, यह भारतीय युवक संप्रदाय को दिखाने के लिए कि आप लोग जो चीज़ छोड़ दे रहे हैं, देखिए, ये परदेशी American, European जीव किस प्रकार इसको ले रहे हैं! तो चैतन्य महाप्रभु का यह जो वचन है—'जन्म सार्थक करि' कर पर-उपकार'—भारत भूमि में ऐसी चीज़ है जिससे अपना जन्म सार्थक सब कोई कर सकता है। क्यों? जैसे श्रीमद् भगवद्गीता। श्रीमद् भगवद्गीता जो पुस्तक है, वह पारमार्थिक राज्य की पहली किताब है। जैसे अ, आ, इ, ई हम लोग पढ़ते हैं, या A, B, C, D, इसी प्रकार पारमार्थिक राज्य की वह पहली किताब है। पहली किताब क्यों है? श्रीमद् भगवद्गीता में पहले क्या शिक्षण दिया जाता है? कि तुम यह शरीर नहीं हो। हाँ, देहात्म-बुद्धि। हाँ, दुनिया में चलता है क्या? देहात्म-बुद्धि।
"यस्यात्मबुद्धिः कुणपे त्रिधातुके..."
यह जो तीन धातु (कफ, पित्त, वायु) की थैली है, इसको 'मैं' समझता हूँ। यही भ्रम हटाने के लिए भगवान कृष्ण ने अर्जुन को पहले ही बताया कि, "जो तुम हमसे बातचीत कर रहे हो जैसे बड़े भारी पंडित हो, बाकी तुम एक नंबर मूर्ख हो।"
"गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।"
यह जो देहात्म-बुद्धि है—इस शरीर को समझ लेना कि 'मैं हूँ'—और इसी के ऊपर जितना झगड़ा दुनिया का है, चाहे आदमी-आदमी से हो, nation से nation का हो, धर्म से धर्म का हो, इसका एकमात्र कारण यही है कि जो बद्ध जीव है, यानी जिसने भौतिक शरीर धारण किया है, उसका यही भ्रम है कि 'मैं यह शरीर हूँ'। तो जब तक यह भ्रम नहीं हटेगा, तब तक मनुष्य जाति का, यह मनुष्य समाज जो है, कभी सुखी नहीं हो सकता।
श्रीमद् भगवद्गीता में कहते हैं: "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा..." जब तक ब्रह्मभूत, ब्रह्मज्ञान न हो कि 'मैं यह शरीर नहीं हूँ, अहम् ब्रह्मास्मि', तब तक सुख नहीं मिल सकता। तो यह जो Krishna Consciousness Movement है—'कृष्णभक्ति-रस-भाविता'। इसका संस्कृत भाषांतर और हिंदी भाषांतर है 'कृष्णभक्ति-रस-भाविता मति'। यह हमारी बनाई हुई भाषांतर नहीं है, यह श्रील रूप गोस्वामी प्रभु, जो कि चैतन्य महाप्रभु के प्रधान शिष्य थे, उन्होंने यह श्लोक कहा है। बाकी 'Krishna Consciousness' जो मैंने शब्द लगाया, वह इसका बिल्कुल अनुवाद है। 'कृष्णभक्ति-रस-भाविता मतिः'। रूप गोस्वामी कहते हैं:
"कृष्णभक्तिरसभाविता मतिः क्रियतां यदि कुतोऽपि लभ्यते।
तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं जन्मकोटिसुकृतैर्न लभ्यते॥"
जो यह कृष्णभक्ति रूप जो रस है, इसको यदि कोई खरीद सके, कहीं मिल जाए, तो अवश्य इसको खरीदे—'क्रियतां यदि कुतोऽपि लभ्यते'। तो कोई चीज़ खरीदने के लिए उसकी कीमत देनी चाहिए, तो कहते हैं—'तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलं'। कृष्णभक्ति का रस खरीदने के लिए एकमात्र मूल्य है 'लौल्यम्' यानी लालसा, कि 'हाँ, मैं भगवान कृष्ण को चाहता हूँ।' जैसे चैतन्य महाप्रभु ने सिखाया:
"युगायितं निमेषेण चक्षुषा प्रावृषायितम्।
शून्यायितं जगत् सर्वं गोविन्द-विरहेण मे॥"
यह जो भाव है—गोविन्द के विरह से मैं सब जगत शून्य देख रहा हूँ—इस प्रकार का जो भाव है, इसी भाव से मनुष्य जन्म सफल होता है। "प्रेमा पुमर्थो महान्"। यह धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष जो है, इसमें वास्तविक पुरुषार्थ नहीं है; असल पुरुषार्थ है भगवत्-प्रेम। यह भगवत्-प्रेम लाभ करना कोई साधारण वस्तु नहीं है। भगवत्-प्रेम हम लोगों के भीतर ही है, बाकी अभी वह प्रेम सब भौतिक चीज़ों के लिए है, इसलिए हम लोग जीवन को असफल मानते हैं। यह सब समय समझ लीजिए—full anxiety. श्रीमद्भागवतम् में कहते हैं: "सदा समुद्विग्नधियामसदग्रहात्"। सब पशु, पक्षी, मनुष्य सब समय समुद्विग्न रहते हैं—'अब क्या होगा? अब क्या होगा?' यह इसलिए कहा कि भौतिक जगत में जिसने भौतिक शरीर धारण किया है, वह सब समय समुद्विग्न रहता है।
तो यदि वास्तविक मनुष्य जाति सुखी होना चाहती है, तो इस कृष्णभक्ति-रस-भाविता मति को किसी तरह ग्रहण करे। और उसको ग्रहण करने के लिए बहुत सरल उपाय है कलयुग में—'कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्'। कलयुग की एक विशेष सुविधा शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित महाराज को सुनायी। पहले कलयुग के बहुत दोष गिनाए, उसे भागवत में सुनाया है—आप लोग जो भागवत सुने हैं—कि यह अनेक दोषों का समुद्र है। तो फिर शुकदेव गोस्वामी ने परीक्षित महाराज से कहा कि यह जो दोषों का समुद्र है, इसमें भी एक बहुत कीमती चीज़ है। वह क्या चीज़ है? वह कलयुग के लिए ही है, और किसी युग के लिए नहीं। वे कहते हैं:
"कलेर्दोषनिधे राजन्नस्ति ह्येको महान् गुणः।"
एक महान गुण है, इसलिए अनेक भक्त लोग कलयुग को मान्यता देते हैं। क्यों? क्योंकि इसमें एक महान गुण है। तो क्या गुण है? 'कीर्तनादेव कृष्णस्य'—केवल कृष्ण का कीर्तन करके 'मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्'—वह मुक्त हो जाता है और भगवद्धाम को प्राप्त करता है। इतना सरल है! कलयुग के लोग जितने पतित हैं, जितने पापी हैं, उनके लिए भगवान ने बहुत सरल औषधि भी बना दी—'कीर्तनादेव कृष्णस्य'। आप लोगों का यह जो कीर्तन समाज है, इसको देख कर हमें बड़ी खुशी हुई।
परंतु थोड़ा... जैसे कोई दवाई आप लीजिए, तो साथ-साथ में उसके पथ्य की भी व्यवस्था होनी चाहिए—दवाई और पथ्य, औषध और पथ्य। तो औषध तो भगवन्नाम है—"भवौषधीच्छ्रोत्रमनोऽभिरामात्"। यह भवौषधि है। भव-रोग में, वह जैसे लौकिक रूप से बोल रहे थे कि समुद्र के समान है। समुद्र में गिर जाने से जैसे आदमी परेशान हो जाता है, चाहे जितना बड़ा वह तैरने वाला हो, उसमें सुख नहीं होता, केवल उसका struggle for existence होता है। तो इधर भी ऐसी बात है। तो इस समुद्र को तरने के लिए, 'कलेर्दोषनिधे राजन्'—यह जो एक महान गुण है, वह क्या है? 'कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्तसङ्गः परं व्रजेत्'। भगवान कृष्ण का यह जो नाम है—'कृष्णस्य'—हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे। चैतन्य महाप्रभु का भी यही मत है, उन्होंने भी कहा है:
"परं विजयते श्रीकृष्णसंकीर्तनम्"
"चेतोदर्पणमार्जनं भवमहादावाग्निनिर्वापणम्"
तो कहने का मतलब है कि जैसे आप लोग कीर्तन करते हैं, यह औषध है, साथ-साथ में कुछ पथ्य की भी व्यवस्था कीजिए, फिर जल्दी काम हो जाएगा। इधर डॉक्टर साहब मौजूद हैं, जानते हैं डॉक्टर साहब दवाई भी देते हैं और बोल देते हैं—"यह चीज़ नहीं करो, यह चीज़ नहीं खाओ, यह चीज़ खाओ, ऐसे रहो।" हाँ, तो यह नियम है। यदि आप बीमार हैं, बीमारी है, केवल औषध को ग्रहण किया और तमाम कुपथ्य किया, तो औषध काम नहीं करेगी। पथ्य भी ठीक सुधारना चाहिए। तो पथ्य सुधारने का क्या... असल में बात क्या है? हम लोग जो इधर भौतिक जगत में फँसे हुए हैं, इसका क्या कारण है? इसका कारण है पाप। थोड़ा-बहुत, कम-बेशी, सब पापी हैं।
वह ब्रह्मा जी से शुरू करके और कीड़े तक जो इधर हैं, सब अपना कर्मफल भोग रहे हैं। कर्मफल होता है पाप और पुण्य। तो पुण्य का जो कर्मफल है, वह भी एक प्रकार से कष्टदायक ही है। यह विचार बहुत भारी है। इसलिए पाप-पुण्य से और आगे जाना चाहिए। पाप-पुण्य से और कर्मकांड-ज्ञानकांड से और आगे बढ़ना चाहिए। इसलिए भक्ति जो है, उसमें कर्मकांड और ज्ञानकांड का विचार नहीं है—'आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनम्', 'अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम्'। यदि आप भगवद्-भक्ति चाहते हैं, तो अन्याभिलाषिता—अन्याभिलाषिता माने दुनिया का कुछ हम लाभ उठाएँगे इसलिए मैं कीर्तन कर रहा हूँ, यह भाव छोड़ देना चाहिए। और ज्ञान, कर्म आदि से भी अनावृत होना चाहिए।
कहने का मतलब है कि यह जो भौतिक जीवन है, पापमय जीवन है, इस पापमय जीवन के चार खंभे हैं। वे क्या चीज़ हैं? शास्त्र में कहा है:
"द्यूतं पानं स्त्रियः सूना यत्राधर्मश्चतुर्विधः"
चार प्रकार के जो पाप हैं, वे क्या चीज़ हैं?
1. अवैध स्त्री-संग या अवैध पुरुष-संग: अपने विवाहित जीवन को छोड़ कर कोई स्त्री किसी पराए पुरुष से संगम न करे, और कोई पुरुष दूसरी स्त्री से संगम न करे। यह महापाप है, इससे बचना चाहिए।
2. जीव-हिंसा: अनर्थक जीव-हिंसा, मछली, मांस आदि भक्षण करना। इससे मनुष्य बहुत भारी हो जाता है, दुनिया भारी हो जाती है। नियम है कि जब शराब पीने वाले और मांस खाने वाले बढ़ जाते हैं, तो दुनिया पर भार हो जाता है, शास्त्र में ऐसा है। इसको भी छोड़ना चाहिए।
3. जुआ खेलना: जुआ और सट्टा आदि से दूर रहना।
4. नशा करना: नशा-भांग न करे। नशा-भांग के भीतर वह पान, बीड़ी, चाय, coffee सब आता है।
तो यदि आप कीर्तन करके आगे बढ़ने की इच्छा रखते हैं, तो जहाँ तक हो, इसको बिल्कुल छोड़ देना चाहिए। ये जो American, European बालक-बालिका हैं, इनको पहले यही सत्य हमने बताया था, और इन्होंने आजीवन मांस खाना, मदिरापान करना, चाय पीना, coffee पीना—सब छोड़ दिया, बिल्कुल छोड़ दिया! इसलिए ये लोग ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण के जो लक्षण हैं—सत्य, शम, दम, शौच, truthfulness, और इंद्रिय-संयम, मन का निग्रह और शुचिता—ये सब श्रीमद् भगवद्गीता में आप लोग जानते ही हैं।
तो नाम-कीर्तन का तो प्रभाव है ही, वह आपको शुद्ध करेगा, इसमें कोई शक नहीं है। परंतु यदि आप... जैसे लकड़ी है, अगर भीगी होती है तो जलने में तकलीफ होती है, कम जलती है, धुआँ होता है, आहिस्ता जलेगी, time लगेगा। और यदि सूखी लकड़ी है, तो वह जल्दी काम करती है। श्रीमद् भगवद्गीता में भी यही बताया है:
"येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम्।"
जिसका पाप बिल्कुल नष्ट हो गया है... इसलिए पुण्य कर्म करना चाहिए। पुण्य कर्म करने से ही पाप कर्म कम हो जाता है, बंद हो जाता है। काम तो एक ही दफ़े आप कर सकते हैं—एक काम करेंगे तो दूसरा काम नहीं कर सकते। इसलिए श्रीमद् भगवद्गीता में बताते हैं:
"ते द्वन्द्वमोहनिर्मुक्ता भजन्ते मां दृढव्रताः॥"
तो जिसका पाप बिल्कुल अंत हो गया है, वे दृढ़व्रत होकर के भगवद्-भजन कर सकते हैं। तो इसके लिए थोड़ा कोशिश करना। चार प्रकार के जो पाप हैं—'द्यूतं पानं स्त्रियः सूना'—इसको छोड़ना चाहिए। यह हमारा, हम लोगों का प्रचार विषय है, और सब जगह में हम लोग यही प्रचार कर रहे हैं। तो आप कीर्तन समिति जो हैं, आप लोग कीर्तन भी कीजिए और साथ-साथ में जिस प्रकार से ये सब पाप के कार्य बंद हो जाएँ, इसका भी प्रचार कीजिए। तब जल्दी काम हो जाएगा, और इसी जीवन में आप भगवान को प्राप्त कर सकते हैं, दूसरे जीवन की और अपेक्षा नहीं रहेगी।
क्योंकि भगवान को प्राप्त करना साधारण बात नहीं है—"बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते"। अनेक जन्म, अनेक जन्म तपस्या करके, अनेक जन्म साधन करके... बाकी क्यों अनेक जन्म की अपेक्षा की जाए? यदि इसी जीवन में भगवान को प्राप्त कर सकते हैं, तो क्यों न किया जाए? कौन जानता है आगे जाकर हमको मनुष्य जीवन मिलेगा या नहीं मिलेगा, नहीं भी मिल सकता है। क्यों?
"कर्मणा दैवनेत्रेण जन्तुर्देहोपपत्तये"
अपने कर्म के अनुसार, भगवान के नेतृत्व में, भगवान के विचार से हमें शरीर मिलता है। परंतु जो भगवान को समझ जाते हैं, उनको आगे जाकर यह जड़ शरीर नहीं मिलता है, उनको चेतन शरीर मिलता है और वे भगवद्-धाम में चले जाते हैं।
इसलिए हमारा जो अनुरोध है, प्रचार का जो विषय है—यह International Society for Krishna Consciousness (कृष्णभक्ति-रस-भाविता संघ)—इसका उद्देश्य है कि सब मनुष्यों को पाप से बचाया जाए, और वह पथ्य और दवाई जो है—यह हरे कृष्ण महामंत्र—उसका जप किया जाए। तो आप लोग भी ऐसा कीजिए, और इससे बहुत जल्दी फल होगा। और भगवान की कृपा से इसी जीवन में ही भगवान को प्राप्त करेंगे।
Thank you very much. Hare Krishna.
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥