Bhagavad-gita As It Is by His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Maharaj Prabhupada. Chapter 7, Text 3.
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
ॐ अज्ञान-तिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जन-शलाकया।
चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥
श्री कृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द श्री अद्वैत गदाधर श्रीवासादि गौर-भक्तवृन्द॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
तो अभी हम लोग... ये नियम क्या है कि सवेरे जो foreign students हैं, उनके लिए सवेरे 7:30 से 8:30 English में हम लोग कुछ प्रवचन करते हैं और शाम को 7:30 से 8:30 Hindi में बोलने का प्रयास करते हैं। Hindi में बोलने में ज्यादा अभ्यास नहीं है, परंतु भारतीय हैं, कुछ-कुछ बोल लेते हैं।
तो ये जो Bhagavad-gita का श्लोक है, इसका व्याख्यान करने से पहले एक शुभ समाचार आप लोगों के पास मैं पेश कर रहा हूँ कि ये जो मंदिर आप लोग सभी कहते हैं कि बड़ा सुंदर मंदिर हुआ है, इसका कारण है श्रीमान काशीराम जी सराफ और उनकी पत्नी श्रीमती गीता देवी। जब 1971 में पहले मैं वृंदावन में आया था, ये सज्जन अपनी खुशी से ये land हमको donate करने के लिए propose किए, फिर भगवान की इच्छा से donate भी हो गया। और उस समय हमारे पास पैसा भी कुछ नहीं था, फिर भी किसी तरह से सारा दुनिया में भीख मांग-मांग करके कम से कम 50 लाख इसमें खर्च हुआ है।
तो उस समय काशीराम जी थोड़ा सा जगह सामने रख दिए थे, कुछ का use कर लिए। तो आज मंदिर देख के उनकी बड़ी खुशी हुई और उन्होंने कह दिया कि यह जगह भी आपका है। ये जगह आप जैसे चाहें व्यवहार कीजिए। उस जगह में हम लोग अभी एक Gurukul बनाएंगे और वो Gurukul बनाने के लिए जो खर्च होगा, ये हमारे पास जो बैठे हैं विश्वनाथ जी अग्रवाल, वो कम से कम लाख रुपया तो देंगे ही और ज्यादा दे सकते हैं। तो इधर Gurukul मैं कल से शुरू कर दूंगा।
तो ये जो Krishna Consciousness Movement है, आप लोग कुछ-कुछ जानते हैं। हम लोग सारा दुनिया में भगवान कृष्ण का नाम प्रचार कर रहे हैं और इसका और एक नाम है Hare Krishna Movement। तो बड़े-बड़े विद्वान लोग सब किताब लिख रहे हैं, article लिख रहे हैं इस movement के विषय में। एक Professor Judah, Berkeley University, big book "Hare Krishna and the Counterculture", scholarly book। इसी प्रकार ये movement आस्ते-आस्ते सारा दुनिया में सब कोई पसंद कर रहे हैं। और ये चैतन्य महाप्रभु की वाणी है कि:
पृथ्वीते आछे यत नगरादि ग्राम।
सर्वत्र प्रचार हइबे मोर नाम॥
तो उनकी भविष्यवाणी कि सारा दुनिया में जितना गांव है और जितने town हैं, नगर हैं, सब जगह में प्रचार होना है और हो रहा है। तो भारतीय संस्कृति, भारतीय सभ्यता को वो लोग बड़ा आग्रह से ग्रहण कर रहे हैं। तो आप इस विषय में पीछे आलोचना करेंगे।
अभी कुछ भगवान की कथा... आज भगवान की जन्मतिथि है, कुछ आलोचना करनी चाहिए। भगवान का जन्म... अजन्मा भगवान। भगवान का ना जन्म होता है... ना हम लोग, जो भगवान का अंश हैं, ना तो हम लोग का जन्म होता है। Bhagavad-gita में है, "न जायते म्रियते वा कदाचिन्"। जब हम लोग भगवान का अंश होने के कारण हमारा जन्म नहीं होता है, हमारा मृत्यु नहीं होता है, तो भगवान का कैसे जन्म हो? इसीलिए भगवान खुद बताते हैं, "अजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन्"—कि भगवान अजन्मा होते हुए भी जन्म लेते हैं, ये भगवान की अचिन्त्य शक्ति (achintya-shakti) है।
तो आज जन्मदिन है। आज नहीं, प्रत्येक दिन ही भगवान का जन्मदिन है। ये चैतन्य महाप्रभु बताए। जैसे सूर्य सवेरे हम लोग देखते हैं, उस समय हम लोग समझते हैं सूर्य का जन्म हुआ या सूर्य का उदय हुआ। बाकी सूर्य सब समय आकाश में अवस्थित है। जब हमको देखने को मिलता है, हम लोग समझते हैं अब सूर्य उगा है। इसी प्रकार अनंत कोटि ब्रह्मांड में भगवान की जन्मतिथि सब समय चल रही है, सब लीला। खाली जन्म नहीं, भगवान की जितनी लीलाएं हैं, जो कि वृंदावन में दिखाएं, मथुरा में दिखाएं और द्वारका में दिखाएं, ये सब नित्य लीला है। भगवान की लीला ये नहीं है कि 5000 वर्ष पहले भगवान का जन्म हुआ था, अभी भगवान नहीं हैं। नहीं, भगवान अभी तक मौजूद हैं। जैसे अभी रात में आप सूरज को नहीं देखते हैं, इसका मतलब ये नहीं है कि सूरज आकाश से चला गया, वो आकाश में है। सूर्य सब समय विद्यमान है।
इसलिए भगवान कहते हैं, "जन्म कर्म च मे दिव्यम्"। हां, भगवान का जन्मतिथि ये साधारण नहीं है, दिव्य है, अलौकिक है, transcendental है। "एवं यो वेत्ति तत्त्वतः, त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोऽर्जुन"। केवल भगवान का जन्म विषय यदि किसी को तात्विक ज्ञान मिल जाए, तो समझ लीजिए वो उद्धार हो गया, वो liberated हो गया, मुक्त हो गया। केवल भगवान का जन्म-कर्म के दिव्य भाव को जानना। भगवान कहेंगे, "मामेति"—ये "तत्त्वतः" शब्द को व्यवहार किया है। इधर भी जो श्लोक अभी ये लोग recite किए हैं, उसमें भी वही कहते हैं:
मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥
ये तत्त्व वस्तु भगवान को समझना चाहिए, साधारण भाव से नहीं। और ये तत्त्व वस्तु किस तरह से समझा जाता है, वो भी भगवान बताते हैं, "भक्त्या मामभिजानाति यावान्यश्चास्मि तत्त्वतः"। तीन जगह, चार जगह में 'तत्त्व' शब्द का व्यवहार हुआ है। एक तो एक जगह भगवान बताए, "जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः"। और इधर भी यही बताया है कि "यततामपि सिद्धानां"। जो सिद्धि, सिद्धि लाभ किए हुए हैं—योग सिद्धि। और असल में सिद्धि का अर्थ होता है कि जो आत्म-तत्त्व का तुरंत ज्ञान हो, उसका नाम है सिद्धि।
तो एक तो सिद्ध होने के लिए हजारों-करोड़ों मनुष्यों के भीतर कोई सिद्ध होने के लिए प्रयास करते हैं, सब कोई नहीं करते। इसलिए भगवान कहते हैं, "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये"। और जो सिद्ध हुए हैं, सिद्धि लाभ किए हैं, उनके भीतर अगर कोई भगवान को तत्त्वतः समझता है—"कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः"। तो भगवान कृष्ण को यदि कोई समझे कि 'हमारे जैसे मनुष्य का जैसे जन्म होता है, ऐसे जन्म हुआ है और मथुरा में जन्म हुआ'—ये तात्विक नहीं है। तात्विक पहले तो समझना चाहिए, जैसे मायावादी लोग समझते हैं कि भगवान निराकार हैं और जब आते हैं तो मायिक शरीर धारण करके आते हैं—ये तात्विक ज्ञान नहीं है। तात्विक ज्ञान है कि भगवान का शरीर और भगवान की आत्मा, ये फर्क नहीं है, एक ही चीज है। इसलिए भगवान कहते हैं, "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो..."। भगवान का शरीर और भगवान की आत्मा अलग नहीं है। जैसे हमारा शरीर और हमारा आत्मा अलग है। हमारा शरीर को कहा जाता है क्षेत्र और आत्मा को कहा जाता है क्षेत्रज्ञ। भगवान ने भी बताया, "क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत"। शरीर का मालिक जीवात्मा भी है और परमात्मा जो भगवान, वो असल मालिक हैं। जैसे एक मकान है, एक occupier है और एक owner है। तो असल में owner जो है, यानी मालिक जो है हमारे शरीर का, वो तो भगवान हैं। और हमको ये शरीर भगवान ने दिया है, जैसे हम चाहते थे। बाकी है ये शरीर भगवान का। इसलिए भगवान का नाम और एक है ऋषिकेश (Hrishikesha)।
और एक जगह भगवान कहते हैं कि:
ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति।
भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया॥
ये जो यन्त्र है, ये शरीर एक यन्त्र है, machine है। मैं शरीर नहीं हूँ, मैं देही हूँ। हमको ये यन्त्र में बैठा दिया गया। कौन बैठाया है? माया। माया, जो भगवान की शक्ति है, उनको भगवान हुकुम कर देते हैं कि ये ऐसे-ऐसे चाहते हैं, इनको ऐसा शरीर दो। इसलिए भगवान कहते हैं, "यन्त्रारूढानि मायया"। ईश्वर सर्वभूतानां... ये यन्त्र, एक यन्त्र हमको मिलता है, वो यन्त्र से हम काम लेते हैं, इधर-उधर घूमते हैं। फिर जैसा हमारा भी इच्छा, कर्म करना... इसी प्रकार जन्म-जन्मांतर हम लोग एक शरीर लेते हैं, फिर एक शरीर में रहते हैं, फिर उसको छोड़ देते हैं। ये मनुष्य शरीर जो है, इस समय यदि हम लोग भगवान को तत्त्वतः समझ जाएं, तब तो फिर हमारा शरीर धारण करने को नहीं पड़ेगा। ये ज्ञान, ज्ञानियों का सभी ज्ञान, ये सब आप लोग सब जानते हैं।
तो ये जो भगवान का जन्मदिन है, भगवान का जन्म है, भगवान आते हैं इसलिए कि "परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्"। भगवान के दो काम होते हैं—एक तो साधु को परित्राण करना और जो दुष्कृती हैं, उसको नाश करना। तो भगवान absolute हैं, अद्वय-ज्ञान। उनको नाश करना और समझ लीजिए परित्राण करना, एक ही बात है। भगवान जिसको नाश कर देते हैं, वो भी परित्राण हो जाता है। ये सब आप लोग जानते हैं कि जिसको भगवान अपने हाथ से नाश करते हैं, जैसे बड़े-बड़े दैत्य लोगों को नाश किया, उसी वक्त उनकी मुक्ति हो गई। इसलिए भगवान is called "All-Good"। भगवान जो कुछ करते हैं, वो सब हमारे मंगल के लिए करते हैं। इसलिए भगवान के भक्त जो होते हैं, वो समझते हैं कि अगर कभी हमको कोई कारण से दुर्दशा में पड़ना होता है, तो उसमें भगवान की कृपा है, ऐसा समझना चाहिए। "तत्तेऽनुकम्पाम्..."। भगवद्-भक्त जो हैं, वो भगवान को कभी दोष नहीं देते। यद्यपि असुविधा में कभी-कभी होते हैं, तो उसमें भगवान को आभार ही देते हैं—"भगवान, आपकी कृपा है।" ये भगवद्-भक्त का दृष्टि है।
तो भगवान आज जन्म ले रहे हैं। और भगवान आज नहीं, जैसे सूर्य एक दिन जन्म नहीं लेते हैं, ये उनका नित्य का चल रहा है। इस ब्रह्मांड में नहीं, तो दूसरे अनंत कोटि ब्रह्मांड हैं। और एक-एक ब्रह्मांड में वृंदावन है, और वो अनंत कोटि वृंदावन में भगवान का जन्म, कर्म सब हो रहा है नित्य काल। इसलिए भगवान की जितनी लीलाएं हैं, इसको कहा जाता है "नित्य-लीला"। श्रील प्रभुपाद ने इस पर विचार किया है कि वो जो भगवान कहते हैं कि जो भगवान के विषय में तात्विक ज्ञान लाभ करते हैं, "त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति"—उसको फिर ये शरीर छोड़ के पुनर्जन्म नहीं होता। हां, जो हमारा वैदिक जो सभ्यता है, ये पुनर्जन्म जय करने के लिए है, और कुछ नहीं। इधर भोगने के लिए नहीं। जो कुछ कर्म, ज्ञान... कर्म में तो पुनर्जन्म होएगा। ज्ञान और भक्ति, ये अपने-अपने मार्ग में जो चलते हैं, तो उसका क्या कारण है? ये पुनर्जन्म जय करने के लिए, और कुछ नहीं।
ये जो हम लोग भौतिक जगत में हैं, इसमें जो चार कष्ट हैं—"जन्म-मृत्यु-जरा-व्याधि-दुःख-दोषानुदर्शनम्"। हम लोग सब बड़े-बड़े scientist हैं, बड़े-बड़े philosopher हैं, philanthropist हैं और सब समस्या को समाधान करने को चाहते हैं। भगवान कहते हैं कि ये सब समस्या तात्कालिक है, ये तो चालू है। असल समस्या जो है—जन्म, मृत्यु, जरा, व्याधि। तो यदि हम लोग समस्या को समाधान करने को चाहते हैं, किस तरह से पुनर्जन्म नहीं हो... तो पुनर्जन्म नहीं है, जो ज्ञानी लोग कहते हैं कि 'हम ब्रह्मलीन हो जाएंगे, ब्रह्म सायुज्य हो जाएंगे'—तो भगवान के लिए कोई मुश्किल नहीं है, कर दे सकते हैं। परंतु वैष्णव जो हैं, भक्त जो हैं, वो भगवान में लीन होना नहीं चाहते। वो भगवान की सेवा में नित्य काल नियुक्त होना चाहते हैं। तो भगवान भी कहते हैं, "मामेति"। तो "मामेति" का अर्थ होता है, यदि कोई लीन होना चाहते हैं, तो भगवान की ब्रह्मज्योति में वो लीन हो सकते हैं। नहीं तो भगवान की नित्य लीला में, वैकुंठ में, वो लोग वृंदावन में जाकर के भगवान की सेवा में नियुक्त हो सकते हैं।
लीन होने में एक मुश्किल है कि उधर सच्चिदानंद... उधर आनंद नहीं मिलता, केवल eternity, जो नित्यता है—"मैं इधर रहूँगा"—eternity, नित्यता, ये उपलब्ध होता है। बाकी केवल नित्यता उपलब्ध होने से आनंद नहीं। इसलिए शास्त्र में कहता है:
येऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्तमानिनस्
त्वय्यस्तभावादविशुद्धबुद्धयः।
आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं ततः
पतन्त्यधोऽनादृतयुष्मदङ्घ्रयः॥
जो विमुक्तमानी हैं, अपने को विमुक्त समझते हैं, उनकी अभी बुद्धि शुद्ध नहीं हुई है—"अविशुद्ध-बुद्धयः"। क्योंकि जब तक भगवान के पास नहीं पहुंचे, वो मुक्ति टिकती नहीं। क्यों? "आरुह्य कृच्छ्रेण परं पदं पतन्त्यधः"। आप लोग जानते हैं, बहुत से संन्यासी, बड़े-बड़े संन्यासी 'ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या'—जगत् मिथ्या है बोल के सब छोड़ देते हैं, फिर कुछ दिन बाद वो जगत् में ही आकर इधर ही, इसी life में फिर politics में फंस जाते हैं और कोई काम-कार्य करने में फंस जाते हैं। क्योंकि केवल मुक्त होने से काम नहीं चलेगा। "ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति"। वो stage, ब्रह्म stage, उधर ही खत्म करने से काम नहीं चलेगा, और आगे बढ़ना होगा। वो जो आगे बढ़ना काम है, वो है भक्ति—"मद्भक्तिं लभते पराम्"। तो ज्ञानी के पश्चात, यदि योगी के पश्चात, यदि कोई भक्त बन जाए साधु-संग से, तब उनकी मुक्ति ठीक-ठीक होती है, वो भगवान के पास चले जाते हैं। ये सब विचार है।
तो भगवान ये सब सिखाने के लिए, "यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत"। तो धर्मस्य ग्लानि का अर्थ होता है जब हम लोग भगवान को भूल जाते हैं। ये धर्मस्य... हमारा जो धर्म है, वो भगवान खुद ही कहते हैं, "धर्मं तु साक्षात् भगवत्प्रणीतम्"। हम लोग धर्म बना नहीं सकते। ये जो आजकल का fashion हो गया—"हम एक धर्म बना लिया, आप एक बना लिया"—ये सब धर्म नहीं है, ये सब तो cheating है। इसलिए भागवत में कहते हैं, "धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र"। ये cheating type जो धर्म है, इसको इधर से फेंक दिया गया है। असल धर्म क्या है? "धर्मं तु साक्षात् भगवत्प्रणीतम्"—जो भगवान बताते हैं, वो धर्म है। भगवान क्या बताते हैं? "सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज"। ये धर्म है। इसलिए भगवान ये समझाने के लिए आते हैं जुग-जुग में। फिर भी आज भगवान का क्या स्थान है, और भगवान जो कहते हैं, उसको आप लोग ग्रहण कीजिए, जीवन को सफल कीजिए। यही हम लोग का प्रचार विषय है। और Krishna Consciousness Movement इसीलिए सारा दुनिया में हम लोग घूमते हैं और आदमी सब पसंद करते हैं, ले रहे हैं। भारतवर्ष का बात क्या है, वो तो जानते ही हैं। तो आप लोग कृपा करके हम लोग को आशीर्वाद कीजिए कि भगवान की कथा, हां, हम लोग जैसा दुनिया में प्रचार करते हैं, वैसा कर सकें।
Thank you very much. Hare Krishna.
[अनौपचारिक बातचीत / प्रश्नोत्तर]
श्रोता: जब भगवान कृष्ण ने... कोया से उसके बाद जो उसको अपने उसके बाद... बस, बस, ठीक है, ज्यादा कुछ... हैं? थी, असुर राक्षस जिसका नाम था, वो आकर में इधर... प्रसाद अभी है नहीं। आप कब तक बिराजेंगे India में?
प्रभुपाद: हम तो Gurukul शुरू करके जाएंगे। Gurukul building... building तो अभी महीना-20 दिन, अभी महीना-दो महीना है नहीं। हां, एक महीना... वो आ जाती है, उसको भी registry करवा देंगे, काम building शुरू कर... आपसे बात होगी।
श्रोता: और ये कह दिया, जो party जीतेगी वो party...
प्रभुपाद: और तो क्या, दिन में मैं आऊंगा ना, तब आपसे एक बार... आपसे जब उनको देखा है, बहुत गया हुआ तो हुए और नहीं, ऐसा कोई खाता नहीं। एक जगह है, आपका मन मिल जाएगा, नहीं... का लीला स्थान है और जल्दी-जल्दी...
श्रोता: अच्छा, अभी बीच में दो मंदिर, मकान... Krishna-Balaram, beautiful deity...
प्रभुपाद: और Hindi में बोलिए, submit, Hindi में बोलिए। और...
श्रोता: अच्छा, आप पहली दफा मंदिर में... पहली दफा आए?
प्रभुपाद: नहीं, गीता जी आए थे, गीता जी मंदिर का उद्घाटन होने के बाद में नहीं आई... आया था हमारे सामने, वो तब ठीक है।
श्रोता: यहां उद्घाटन... बहुत आत्मा खुशी है, बहुत खुशी है। आपकी बड़ी आत्मा है, बहुत आत्मा खुश है, हृदय से बोलते हैं।
प्रभुपाद: नहीं, सब कोई बोलते हैं, बड़ा सुंदर सार्थक हो गया।
श्रोता: पहले ही आया था आपके लगे... चरण जी, आप कभी आप मिलते हैं, कभी खेलते हैं, कभी करते हैं... समय...
प्रभुपाद: एंड जैसे करता है, चलता है, चलता है... के ऊपर कभी है, क्या करते हैं?
श्रोता: Then by... वृक्षा है ना, शाम को बोला था इसको काट दीजिए।
प्रभुपाद: नहीं, नहीं, प्रभु, ये तो मंदिर की बहुत शोभा है, ये बहुत शोभा है, ये बहुत शोभा है मंदिर की, प्रभु। ऐसा कभी विचार ही नहीं होना चाहिए। आप मना कर दीजिएगा, आपकी absence में कहीं काट नहीं दे।
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥