श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन  »  720329BG-BOMBAY_Hindi
 
 
श्रील प्रभुपाद के हिंदी में प्रवचन
 
श्रीमद् भगवद्-गीता 7.1
बॉम्बे, 29-मार्च-1972
 
 
 
योगं युञ्जन् मदाश्रयः असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु — श्लोक हम लोग कल इसको आलोचना की थी कि भगवान में आसक्ति बनानी और उसकी जो पद्धति, इस विषय में कल... गत काल हम लोग कुछ आलोचना की कि उसका एक नियम है। वह नियम से कोई चीज़ भी आप अपनाइए, तो उसका नियम से प्रतिपालन करनी चाहिए। भगवान श्रीमद् भगवद्गीता में बताया है, "यः शास्त्र-विधिम् उत्सृज्य वर्तते कामकारतः, न स सिद्धिम..." शास्त्र में जैसे विधि है, वह विधि छोड़ के अपना मनमाना माफ़िक यदि कोई भगवान को उपलब्ध करने के लिए प्रयत्न करे, तो भगवान खुद ही कहते हैं कि "न स सिद्धिम् अवाप्नोति" — उसको सिद्धि तो मिलेगी नहीं, "न सुखम्" — और सुख भी नहीं। सब चीज़ की एक विधि है। इसलिए भक्ति दो प्रकार की होती है — एक विधि-मार्ग और एक राग-मार्ग।

विधि-मार्ग का अर्थ होता है कि शास्त्र में जैसे बताए हैं, गुरु जैसे बताते हैं, उस प्रकार। और साधु, गुरु, शास्त्र... गुरु ऐसे गुरु नहीं जो कि शास्त्र-विधि नहीं मानते, वह गुरु नहीं। गुरु का अर्थ होता है जो शास्त्र-विधि खुद मानते हैं और अपने शिष्य को सिखाते हैं, वह गुरु। नरोत्तम दास ठाकुर कहते हैं कि "साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्तेते करिया ऐक्य"। हम लोगों को चाहिए कि साधु कौन है, गुरु कौन है, शास्त्र क्या चीज़ है, इसको थोड़ा समझना चाहिए। शास्त्र का अर्थ होता है वेदानुगत शास्त्र। वेद को जो मानते हैं, वह शास्त्र। और गुरु कौन है? जो शास्त्र को मानते हैं, वह गुरु हैं। और साधु कौन है? जो शास्त्र और गुरु को मानते हैं। इस प्रकार विचारो। यह "साधु-शास्त्र-गुरु-वाक्य, चित्तेते करिया ऐक्य"। We have to confirm by these three things: sadhu, guru, sastra.

तो भगवान को प्राप्त करने के लिए जो उपाय स्वयं भगवान कह रहे हैं कि "मय्य आसक्त-मनाः", उसकी जो विधि है, यह शास्त्र-विधि जैसे ये लोग प्रतिपालन कर रहे हैं — सवेरे उठना, भगवान की मंगल-आरती करना, फिर भोग लगाना, फिर भगवान का परिच्छद, उसको अच्छी तरह से सजाना, और फिर आरती। सब 'भक्ति-रसामृत-सिंधु' आदि शास्त्र में सब लिखा है। और यह भी शास्त्र, वेद-पुराण के अनुसार श्रील रूप गोस्वामी बताते हैं कि:
"श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं विना।
ऐकान्तिकी हरेर्भक्तिरुत्पादायैव कल्पते॥"
श्रुति का अर्थ होता है वेद, और स्मृति का अर्थ होता है वेदानुसार। तो श्रुति, स्मृति और पुराण आप लोग जानते हैं — अष्टादश पुराण। श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधि। पञ्चरात्र यानी नारद पञ्चरात्र, अर्चन-मार्ग। भगवान को किस तरह से अर्चन किया जाता है, वह पञ्चरात्र-विधि नारद जी बनाए। तो यह सब मानना चाहिए। रूप गोस्वामी कहते हैं कि यह सब जो शास्त्र-विधि है, इसको जो मानते नहीं — "श्रुति-स्मृति-पुराणादि-पञ्चरात्र-विधिं विना" — इसको छोड़ के "हरेर्भक्तिरुत्पादायैव कल्पते"। यह सब शास्त्र-विधि छोड़ के जो भगवद्-भक्ति की एक छलना, वह दुनिया में उत्पाद (उत्पात) बना देते हैं। उसमें कुछ लाभ नहीं होता।

इसलिए शास्त्र-विधि से भगवान में आसक्ति बढ़ाने के लिए जो शास्त्र-विधि है, उसको मानना चाहिए और उसमें फल होगा — "असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु"। शास्त्र-विधि से काम करने से संशय नहीं रहेगा, there will be no doubt. "असंशयं समग्रं" — और पूर्णता। भगवान... भगवान को पूर्णता कोई समझ नहीं सकेंगे क्योंकि भगवान unlimited हैं। तो "असंशयं समग्रं", इसीलिए भगवान किस तरह से भगवान को हम लोग समझ सकेंगे, वह भगवान खुद ही बताते हैं। हमारे मनन करने से, speculation करने से, उसमें भगवान की उपलब्धि नहीं हो सकेगी। भगवान जैसे बताते हैं, शास्त्र जैसे बताते हैं, गुरु जैसे बताते हैं, साधु जैसे बताते हैं, उस प्रकार विधि से अगर हम लोग काम करेंगे, तो भगवान कहते हैं "असंशयं समग्रं" — बिना संदेह और संपूर्णता से भगवान को हम लोग समझ पाएंगे।

फिर कहते हैं:
"ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः।
यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते॥"
क्यों? यह जो भगवद्-ज्ञान, यह विज्ञान है। भगवान का एक और नाम है... विज्ञान। भगवान का जो बल है, जो भगवान की जो शक्ति है, वह विज्ञान-सम्मत है। यह नहीं है कि हम लोग कुछ समझ लिया, भगवान का ज्ञान ऐसे है, भगवान का वीर्य जैसा है, नहीं। विज्ञान-सम्मत, यद् विज्ञान-सम्मत। भागवत में है: "ज्ञानं परमगुह्यं मे यद् विज्ञान-समन्वितम्"। भगवद्-ज्ञान विज्ञान-सम्मत है। आजकल का विज्ञान का युग है, तो सब कोई विज्ञान से समझना चाहते हैं। यह शास्त्र का भी मत है कि भगवद्-ज्ञान जो है, वह विज्ञान-सम्मत है, ऐसे नहीं मनमाना माफ़िक। जैसा आजकल कहते हैं कि "जिसका जैसा मत हो, उसी मत से भगवान को प्राप्त कर सके।" यह बात ठीक नहीं। भगवान को प्राप्त करने के लिए विज्ञान-सम्मत मत होना चाहिए, अपना मनमाना नहीं। जैसे विज्ञान-सम्मत अंक-शास्त्र में कहते हैं कि दो और दो मिलकर के चार होता है, 2 + 2 = 4, यह विज्ञान-सम्मत है। अगर कोई कहेगा कि दो और दो मिलकर के पाँच होता है, दो और दो मिलकर के तीन होता है, यह विज्ञान-सम्मत नहीं है। हाँ। इसलिए भगवान कहते हैं कि भगवद्-ज्ञान जो है, वह विज्ञान-सम्मत है। उसमें कोई अपना जो दुष्ट मत है, उस दुष्ट मत से भगवान को कोई प्राप्त नहीं कर सकेगा।

"ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम् इदं वक्ष्याम्यशेषतः" — अशेषतः यानी अच्छी तरह से तुमको समझा रहा हूँ। कृष्ण अर्जुन को कह रहे हैं, "अशेषतः" — खूब अच्छी तरह से तुमको समझा रहा हूँ, समझो। "यज्ज्ञात्वा" — अगर विज्ञान-सम्मत तुम भगवान को समझोगे, यानी हमको समझोगे, भगवान खुद बता रहे हैं, "यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते"। फिर भगवान को समझने से फिर तुम्हारा और-और ज्ञान जो है, वह खुद ही उपलब्ध हो जाएगा। वेद में भी ऐसे कहते हैं कि "कस्मिन् नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति"। यदि कोई वास्तविक भगवान को समझ जाए, फिर उसके लिए और दूसरा चीज़ समझने में कोई मुश्किल नहीं है, वह खुद ही समझ जाते हैं। यह वास्तविक उपलब्धि का विषय है। जो भगवान को समझे हुए हैं, वह सब विज्ञान समझे। "यस्मिन् विज्ञाते सर्वं विज्ञातं भवति"। और भगवान खुद भी कहते हैं कि "यज्ज्ञात्वा" — यह जो भगवद्-ज्ञान, इसको लाभ होने से फिर जाकर के "नेह भूयोऽन्यज् ज्ञातव्यमवशिष्यते" — और कुछ बाकी नहीं रह जाएगा, सब ज्ञान अच्छी तरह से हो जाएगा। तो यह जो भगवद्-ज्ञान है, भगवान खुद कहते हैं वह मिलना भी मुश्किल है।

इसलिए भगवान कहते हैं:
"मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥"
इसलिए भगवान कहते हैं कि "मनुष्याणां सहस्रेषु" — हज़ारों-लाखों मनुष्यों के भीतर "कश्चिद् यतति सिद्धये" — सिद्धि लाभ करने के लिए कोई एक व्यक्ति प्रयत्न करता है। देखिए, हम लोग रोज़ाना देख रहे हैं कि सब आदमी वही दिन भर परिश्रम करते हैं — आहार, निद्रा, भय, मैथुन के लिए, बस। और भगवद्-ज्ञान के लिए कोई interested नहीं है। इसलिए कहते हैं "मनुष्याणां सहस्रेषु"। इधर जो यह हम लोग आंदोलन, Krishna Consciousness, संकीर्तन movement कर रहे हैं, इसमें ज़्यादा interest नहीं है। अगर कोई political meeting होता इधर, तो सवेरे 4:00 बजे से सब कोई पहुँच जाता। क्योंकि इधर Hare Krishna movement है, कृष्ण का विषय है, तो कोई interest नहीं। इसमें interest नहीं है और सब सोते हैं।

इसलिए भगवान कहते हैं कि करोड़ों व्यक्तियों के भीतर कोई तो चाहते हैं कि जीवन को किस प्रकार से सिद्ध किया जाए — perfection of life, self-realization. Nobody is interested. "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये"। सिद्धि... सिद्धि means जो perfection of life. किस तरह से perfection of life? सिद्धि क्या चीज़ है? सिद्धि यही चीज़ है कि आप अपने को उपलब्ध करना, self-realize करना — "हाँ, मैं क्या हूँ? भगवान क्या हैं?" ब्रह्म-जिज्ञासा। वेदांत-सूत्र में कहते हैं, "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा"। मनुष्य जीवन का एकमात्र काम है यह ब्रह्म का विषय जिज्ञासु होना, अर्थात् ब्रह्म-जिज्ञासा। तो कोई जिज्ञासा नहीं करते। "जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्"। भागवत में कहते हैं:
"तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्।"
जो उत्तम विषय में जिज्ञासु है, वह गुरु के पास जाए — "तस्माद् गुरुं प्रपद्येत"। वेद में भी कहते हैं कि "तद्विज्ञानार्थं स गुरुमेवाभिगच्छेत्"। गुरु में अभिग... यह सब वेद-शास्त्र का अनुज्ञान है, बाकी हम लोग सब मानते हैं। उत्तम विषय में जो जिज्ञासु है — "तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्"।

श्रेय... श्रेय एक चीज़ होता है और प्रेय एक चीज़ होता है। जो हमको अभी बहुत अच्छी लगती है, उसका नाम है प्रेय। और आगे जाकर के जो हमारा भलाई करेंगे, वह है श्रेय। जैसे बच्चे लोग खेलने को चाहते हैं, वह समझते हैं यही ठीक है। और पिता-माता चाहते हैं कि वह पढ़े, तो स्कूल में जाए या विद्वान हो, बाकी उसमें उसका interest नहीं होता। हाँ, तो श्रेय और प्रेय। तो श्रेय चीज़ जो है, और श्रेय के भीतर जो उत्तम श्रेय है... उत्तम श्रेय... उत्तम का अर्थ होता है कि यह भौतिक जगत की कोई वस्तु नहीं है। उद्गतं तमः यस्मात् — तमः। हाँ, तमसी... यह भौतिक जगत है, इसको अंधेरा कहा जाता है। वास्तव में यह अंधेरा है, आप लोग सब जानते हैं। यानी सूर्य का उदय नहीं होता, तो यह रात ही रात रह जाता, अंधेरा। इसलिए इसको तम कहा गया। तो उत्तम — उद्गतं तमः। यह भौतिक जगत से और आगे जाकर के जो विषय है, अर्थात् भगवद्-विषय, वह भगवद्-विषय में जो जिज्ञासु है, वही असल श्रेय... श्रेय वस्तु है, उसको जो ग्रहण करते हैं — "जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्"। उसके लिए गुरु के पास जाना चाहिए — "तस्माद् गुरुं प्रपद्येत जिज्ञासुः श्रेय उत्तमम्"। बाकी साधारण व्यक्ति का इस विषय में interest नहीं है, they are not interested.

इसलिए भगवान खुद कहते हैं, "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये"। कोई नहीं चाहते। कोई पशु के जैसे ही आहार, निद्रा, भय... उसी में बस। आहार — खाना, निद्रा — सोना, आहार-निद्रा और भय — और defend करना, अपने को रक्षा करना विपद से, और मैथुन — और स्त्री-पुरुष का संभोग। यह इंद्रिय-तत्व, यही सब लोग चाहते हैं। इसी को समझता है सिद्धि। यह सिद्धि तो पशु का भी है। आहार-निद्रा-भय-मैथुन सामान्यम् एतत् पशुभिर्नराणाम्। पशु भी... इसमें कोई ज़्यादा प्रगति करने की कोई आवश्यकता है नहीं। हम लोग खाने के लिए, सोने के लिए और भय से सुरक्षित करने के लिए और इंद्रिय-तत्पर करने के लिए बहुत कुछ प्रयास करते हैं। और मनुष्य... तो जो जीव है, पशु-पक्षी, उसके लिए कोई... पशु जो है, पक्षी जो है, वह खाने के लिए, रहने के लिए कोई business नहीं करता, कोई profession नहीं करता। कहीं भगवान की इच्छा से जहाँ उसको खाने को मिलता ही है, कहीं भी उसको खाने को मिलता है। यह देखिए, हज़ारों-लाखों हाथी हैं, उनको भी खाने को मिलता है। एक समय में वे एक मन खा जाते हैं। तो भगवान सबको खाने को देता है। आगे वेद में ऐसे बताते हैं कि:
"नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानाम्
एको बहूनां यो विदधाति कामान्"
एक भगवान सबको खाने को देता है, सब ज़रूरत की चीज़ें देता है। तो उसके लिए कोई विशेष समस्या है नहीं, वह भगवान की तरफ़ से पहले ही सब ठीक-ठाक है, खाने को मिलेगा। बाकी आजकल मनुष्य समाज ऐसे हो गए जो इसी को समस्या समझते हैं, वह समस्या और बढ़ती जाती है। आहार-निद्रा-भय-मैथुन में... मनुष्य समाज में केवल भगवद्-भक्ति लाभ करके सिद्धि लाभ करना चाहिए, यही शास्त्र का निर्देश है। बाकी कोई करता नहीं — "मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये"।

और फिर भी भगवान बताते हैं, "यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः"। खाली सिद्धि लाभ नहीं, जो वास्तविक सिद्धि लाभ किए हुए हैं, उनके भीतर कोई-कोई भगवान कृष्ण को तात्विक जानते हैं। तो कहने का मतलब, भगवान खुद ही बता रहे हैं कि कृष्ण-तत्त्व ज्ञान होना, यह साधारण बात नहीं है। यह भगवान की कृपा से ही हो सकती है, नहीं तो नहीं। हाँ:
"अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय-
प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि।
जानाति तत्त्वं भगवन्-महिम्नो
न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन्॥"
जो भगवद्-तत्त्व ज्ञान है, यह भगवान की कृपा से ही हो सकती है। इसलिए भगवान की कृपा की अपेक्षा होनी चाहिए, नहीं तो un-sound इधर-उधर कुछ भगवान का विषय समझ लेंगे। कोई कहेंगे भगवान मर गया है, कोई कहेंगे भगवान निराकार है, कोई कहेंगे कि भगवान हम हैं, आप हैं — यही सब बातें चलेंगी। असल जो तात्विक ज्ञान है, वह भगवान की कृपा से होगा। हाँ, "ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानम्..." इसलिए भगवान खुद बता रहे हैं, अर्जुन के ऊपर कृपा करके भगवान अपने विषय में बता रहे हैं। तो भगवान को जिस तरह से अर्जुन समझे हुए हैं, अगर हम लोग उनका पदानुसरण करके, अर्जुन जैसे समझे हुए हैं, उसी प्रकार हम लोग समझ लें, तो भगवद्-ज्ञान हमारा भी हो जाए। अर्जुन दशम अध्याय में भगवान को कहते हैं कि:
"परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान्"
"आप जो हैं, परं ब्रह्म हैं।" अर्जुन यह समझे। जब कृष्ण परं ब्रह्म... शास्त्र के निर्देशानुसार जैसा सिद्धांत है — "ईश्वरः परमः कृष्णः" — अर्जुन वह ठीक-ठीक समझ गए। इसलिए भगवान को कहते हैं, "कृष्ण, आप परं ब्रह्म, परं धाम हो।" अगर हम लोग भी अर्जुन का पदानुसरण करके कृष्ण को समझ जाएँ कि ये परं ब्रह्म हैं, परमेश्वर हैं, तब तो कृष्ण को ठीक समझे। और यदि ऐसा साधारण मनुष्य समझें, जैसा भगवान खुद कहते हैं कि "अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम्", क्योंकि भगवान इधर आकर मनुष्य की जैसी लीला कर रहे हैं, इसलिए यदि हम लोग उनको समझें कि भगवान नहीं हैं, यह तो साधारण मनुष्य हैं, यह क्या नाम... वसुदेव के संतान हैं और वृंदावन में आए थे, इस प्रकार अगर हम समझ लें, तो वह समझना तात्विक नहीं। तात्विक समझना चाहिए। वह तात्विक ज्ञान किस तरह से समझना चाहिए, वह भगवान खुद ही बता रहे हैं।

"मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद् यतति सिद्धये। यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः॥"
अब भगवान बता रहे हैं कि किस तरह से हम लोग भगवान को तात्विक समझें:
"भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च।
अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥"
जो हम लोग कहते हैं भौतिक ज्ञान है, उसी से भगवान शुरू कर रहे हैं। भगवान को देखना, यह आँख से अभी संभव नहीं है। "अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद् ग्राह्यमिन्द्रियैः"। यह जो भौतिक इंद्रिय है, यह भौतिक इंद्रिय द्वारा भगवद्-विषय ज्ञान नहीं हो सकता। "अतः श्रीकृष्णनामादि..." भगवान का नाम हम लोग जो कीर्तन करते हैं, यही शुरू है — श्रवण, कीर्तन। श्रवण करने के लिए भगवान का नाम पहले श्रवण। भगवान का नाम श्रवण करने से फिर रूप — भगवान का रूप क्या है? नाम, रूप, फिर भगवान का गुण क्या है — नाम, रूप, गुण, फिर लीला, फिर परिकर, फिर वैशिष्ट्य। यह आगे आहिस्ता-आहिस्ता, आहिस्ते बढ़ता जाए। तो अभी हमारा जो आँख है, जो हमारा जो इंद्रिय है, यह सब इंद्रिय से नाम भी हम लोग समझ नहीं सकते। जैसे हरे कृष्ण कीर्तन — "हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"। तो हम लोग पहले तो इसको समझते हैं कि "हरे कृष्ण बोलने से क्या लाभ होगा?" क्योंकि यह जो इंद्रिय है, यह इंद्रिय द्वारा भगवान का नाम-रूप हम लोग नहीं समझ सकते। इसलिए भगवान कहते हैं कि "अच्छा, तुम्हारा जो ज्ञान है, ईंट-पत्थर देखने का जो ज्ञान है, उसी से ही शुरू किया जाए। भगवान का नाम पीछे देखा जाएगा।"

इसलिए भगवान कहते हैं, "भूमि, अनल..." हाँ, तुम ईंट-पत्थर समझते तो हो, रोज़ ईंट-पत्थर देखते हो, पानी देखते हो, पत्थर देखते हो, मट्टी देखते हो, हवा भी समझते हो। तो भगवान कहते हैं यह जो चीज़ है, हाँ, कौन-कौन? भूमि — हाँ, मट्टी, भूमि; अप् — फिर पानी, भूमि, अप्; अनल — अग्नि; वायु — भूमि, अप्, अनल, वायु; खम् — आकाश; मन और बुद्धि, अहंकार। यह जो आठ चीज़ है — "अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा"। कि "भिन्ना प्रकृति" — हाँ, हमसे अलग है। तो हमारी प्रकृति, परंतु हमसे अलग। हाँ, "भिन्ना प्रकृतिरष्टधा"। भिन्ना का अर्थ होता है जो है तो भगवान की शक्ति, बाकी अलग, material. भगवान की शक्ति अनेक प्रकार की होती है — "परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते"। वह शक्ति को बड़े-बड़े आचार्य लोग तीन विभाग से विभाजन किया है। एक तो शक्ति है बहिरंगा शक्ति, हाँ, और एक शक्ति है अंतरंगा शक्ति, और एक शक्ति तटस्था शक्ति। हाँ, यह विष्णु पुराण में यह विचार को किया गया है कि बहिरंगा शक्ति, भगवान का जो external energy है, वह यह भौतिक जगत है। और जो उनका अंतरंगा शक्ति है, उसका विकास है चित्-शक्ति, spiritual world, चेतन जगत। यह जैसा मृत जगत है, ऐसा और एक चेतन जगत। जैसा यह जगत का नियम है, छह प्रकार का क्या बोलता है, परिवर्तन होता है — जन्म हुआ, जन्म होने से ही काम नहीं बन जाता है, हाँ, फिर बढ़ता है, फिर बुड्ढा हो जाता है, पुराना हो जाता है, फिर नाश हो जाता है। षड्-विकार, छह प्रकार के विकार इसको कहा जाता है।

और जो चेतन जगत है, उसमें निर्विकार, उसमें कोई विकार नहीं। हाँ, जैसा हम लोग सब कोई जो यह शरीर और शरीरी, देह और देही... जो आत्मा है, वह... वह देही है, वह भीतर में है। आपके भीतर भी आप हैं, और यह शरीर के भीतर मैं भी हूँ। आपके शरीर के भीतर आप हैं — "देहिनोऽस्मिन यथा देहे"। जो ज़रा... वह देही शरीर में है। इसलिए यह शरीर का परिवर्तन होता है, विकार होता है, फिर अपक्षय होता है, फिर नाश हो जाता है। तो यह जो भौतिक शरीर है, यह भौतिक शरीर भी वही भूमि, अप्, अनल और वायु से बनी हुई है, हाँ, परंतु यह बाहरी चीज़ है। इसलिए कहते हैं भिन्न — external energy, internal energy और अलग। "भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च। अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा॥" यह आठ प्रकार। मन भी भौतिक है, मन spiritual नहीं है, आध्यात्मिक नहीं। बहुत से आदमी समझते हैं कि मन जो है, यही spirit है। भगवान... मन जो है, यह सूक्ष्म भौतिक चीज़ है, कुछ तो soul and gross, gross matter and subtle matter. तो mind, intelligence — यह subtle matter है, और जो earth, water या यह भूमि, वायु — यह gross में है, सूक्ष्म और जड़, जड़ वस्तु और सूक्ष्म। तो मन जो है, यह भी भौतिक चीज़ है, बाकी सूक्ष्म। तो भगवान खुद बता रहे हैं, "अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा"। यह आठ प्रकार की जो प्रकृति है, विभिन्न, हमसे अलग है।

एक और, इसके अलावा, इसको छोड़ के:
"अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥"
यह अपरा... अपरा का अर्थ होता है निकृष्ट। जैसा आप बाज़ार में कोई चीज़ खरीदने को जाते हैं, तो दुकानदार दिखाता है, "देखो जी, यह चीज़ जो है, इसको थोड़ा... यह कम दाम है, और इसको... और जो चीज़ है, यह कपड़ा जो है, ज़्यादा दाम का है।" तो उसमें उत्कृष्ट और निकृष्ट होता है। तो इसी प्रकार है तो भगवान की शक्ति, बाकी यह निकृष्ट, यह जो भौतिक शक्ति, भौतिक प्रकृति आठ प्रकार की, इसको कहते हैं अपरा। अपरा का अर्थ होता है निकृष्ट, जिसका कीमत कम है। और इसको छोड़ के और एक है — "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्"। और उत्कृष्ट प्रकृति। उत्कृष्ट प्रकृति क्या चीज़ है? "जीवभूतां महाबाहो"। वह जो जीवात्मा... दो प्रकृति। जीवात्मा भी प्रकृति है, यह पुरुष नहीं है। प्रकृति और पुरुष — पुरुष होता है भोक्ता, प्रकृति भोग्या। तो जीवात्मा... जो मायावादी दार्शनिक कहते हैं कि जीवात्मा ही परमात्मा है, कि जीवात्मा ही भगवान है, यह बात ठीक नहीं। प्रकृति है। पुरुष भगवान हैं — "पुरुषं शाश्वतं दिव्यम्"। पुरुष एकमात्र भगवान हैं। जो पुरुष जो है, वह भोक्ता है, और प्रकृति भोग्या। इसलिए जीवात्मा कभी भोक्ता नहीं हो सकेगा, जीवात्मा भोग्या है। जीवात्मा भगवान की सेवा के लिए है।

इसलिए जीवात्मा का जो असल रूप है, जैसे चैतन्य महाप्रभु बताते हैं: "जीवेर स्वरूप हय — कृष्णेर नित्य-दास"। जीव का जो स्वरूप है, नित्य कृष्ण-दास, सब समय के लिए भगवान का नौकर, दास। यह दास... यह मतलब नहीं होता जैसा हम लोग इधर नौकर रखते हैं, यह बात नहीं है। दास का अर्थ है सेवा। यह सेवा साधारण बात नहीं है, यह चित्-सेवा है, भौतिक सेवा नहीं है। इसलिए यह जो जीवात्मा, इसको कहा जाता है कि उत्कृष्ट प्रकृति, बाकी है प्रकृति, हाँ, यह पुरुष नहीं है — "अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्"। अगर यही दो श्लोक जो हैं श्रीमद् भगवद्गीता में — भूमि... जो निकृष्ट प्रकृति, निकृष्टा प्रकृति और उत्कृष्ट प्रकृति, यही दोनों चीज़ अगर हम लोग अच्छी तरह से समझें, तो बहुत आगे बढ़ जाएँ। इसलिए आप लोगों से निवेदन है, यदि आप लोग कृपा करके आएँगे, तो हम लोग समझाने के लिए प्रयत्न करेंगे। अभी तो टाइम हो गया, थोड़ा कीर्तन करके शुरू करेंगे, संकीर्तन।
 
 
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥