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श्लोक 7.95.15  |
राजानश्च महात्मानं प्रशंसन्ति स्म राघवम्।
उपपन्नं नरश्रेष्ठ त्वय्येव भुवि नान्यत:॥ १५॥ |
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| अनुवाद |
| राजाओं ने भी महात्मा रघुनाथजी की स्तुति करके कहा - 'हे पुरुषोत्तम! इस पृथ्वी पर जो भी श्रेष्ठ कार्य हैं, वे सब आपमें ही संभव हैं, अन्य किसी में नहीं।'॥15॥ |
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| Even the kings praised Mahatma Raghunathji and said - 'O best of men! All the best things on this earth are possible only in you, not in anyone else.'॥ 15॥ |
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