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ramayan 7.92.18-19h: बंदर और राक्षस अपने हाथों में दान की वस्तुएं लेकर हर जगह खड़े रहते थे और जो भी साधक वस्त्र, धन और भोजन चाहता था, उसे वे यथाशक्ति दान देते थे।   |   ramayan सर्ग 7.92: श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में दान- मान की विशेषता   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 92: श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ में दान- मान की विशेषता  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  7.92.18-19h 
सर्वत्र वानरास्तस्थु: सर्वत्रैव च राक्षसा:॥ १८॥
वासोधनान्नकामेभ्य: पूर्णहस्ता ददुर्भृशम्।
 
 
अनुवाद
बंदर और राक्षस अपने हाथों में दान की वस्तुएं लेकर हर जगह खड़े रहते थे और जो भी साधक वस्त्र, धन और भोजन चाहता था, उसे वे यथाशक्ति दान देते थे।
 
The monkeys and the demons stood everywhere with things to give in their hands and gave as much as they could to the seekers who desired clothes, money and food. 18 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)