श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 84: लक्ष्मण का अश्वमेध यज्ञ का प्रस्ताव करते हुए इन्द्र और वृत्रासुर की कथा सुनाना, वृत्रासुर की तपस्या और इन्द्र का भगवान् विष्णु से उसके वध के लिये अनुरोध  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.84.2 
अश्वमेधो महायज्ञ: पावन: सर्वपाप्मनाम्।
पावनस्तव दुर्धर्षो रोचतां रघुनन्दन॥ २॥
 
 
अनुवाद
‘रघुनन्दन! अश्वमेध नामक महान यज्ञ समस्त पापों को दूर करने वाला, अत्यंत पवित्र और करने में कठिन है। अतः तुम्हें इसे करने की इच्छा होनी चाहिए॥ 2॥
 
‘Raghunandan! The great yajna called Ashwamedha is the one that removes all sins, is extremely pure and difficult to perform. Therefore, you should like to perform it.॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)