श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 83: भरत के कहने से श्रीराम का राजसूय यज्ञ करने के विचार से निवृत्त होना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.83.5 
युवाभ्यामात्मभूताभ्यां राजसूयमनुत्तमम्।
सहितो यष्टुमिच्छामि तत्र धर्मस्तु शाश्वत:॥ ५॥
 
 
अनुवाद
तुम दोनों मेरे आत्मा हो, इसलिए मैं तुम्हारे साथ यह उत्तम राजसूय यज्ञ करना चाहता हूँ, क्योंकि इसमें राजा का सनातन धर्म प्रतिष्ठित है।
 
You both are my soul, so I desire to perform this excellent Rajasuya Yajna with you, because the eternal Dharma of the king is established in it.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)