श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 83: भरत के कहने से श्रीराम का राजसूय यज्ञ करने के विचार से निवृत्त होना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.83.4 
अक्षयश्चाव्ययश्चैव धर्मसेतुर्मतो मम।
धर्मप्रवचनं चैव सर्वपापप्रणाशनम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
मेरे मत में धर्मरूपी सेतु (राजसूय) अक्षय और अक्षय फल देने वाला है। यह धर्म का पोषक और समस्त पापों का नाश करने वाला है॥4॥
 
‘In my opinion, the bridge of Dharma (Rajsuya) gives everlasting and indestructible fruits. It is the nourisher of Dharma and destroyer of all sins.॥ 4॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)