लोकपीडाकरं कर्म न कर्तव्यं विचक्षणै:।
बालानां तु शुभं वाक्यं ग्राह्यं लक्ष्मणपूर्वज।
तस्माच्छृणोमि ते वाक्यं साधु युक्तं महाबल॥ २०॥
अनुवाद
हे लक्ष्मण के बड़े भाई! बुद्धिमान पुरुषों को ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए जिससे सम्पूर्ण जगत को दुःख पहुँचे। बालकों के कहे हुए वचन भी यदि अच्छे हों, तो उन्हें ग्रहण करना उचित है; इसलिए हे महारथी! मैंने आपके अच्छे और युक्तिसंगत वचनों को बहुत ध्यानपूर्वक सुना है।॥20॥
‘Elder brother of Lakshmana! Wise men should not do such deeds which cause pain to the entire world. Even if the words spoken by children are good, it is appropriate to accept them; therefore, O mighty warrior! I have listened to your good and logical words very carefully.'॥ 20॥
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे त्र्यशीतितम: सर्ग: ॥ ८ ३॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें तिरासीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ३॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥