श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 83: भरत के कहने से श्रीराम का राजसूय यज्ञ करने के विचार से निवृत्त होना  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  7.83.19 
एष्यदस्मदभिप्रायाद् राजसूयात् क्रतूत्तमात्।
निवर्तयामि धर्मज्ञ तव सुव्याहृतेन च॥ १९॥
 
 
अनुवाद
हे धर्मज्ञ! मेरे हृदय में राजसूय यज्ञ करने का विचार उठ रहा था; परंतु आज आपकी सुन्दर वाणी सुनकर मैं उस उत्तम यज्ञ से अपना मन हटा रहा हूँ॥ 19॥
 
O Dharmgya! The thought of performing the Rajasuya Yagna was rising in my heart; but today after listening to your beautiful speech I am turning my mind away from that excellent Yagna.॥ 19॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)