श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 83: भरत के कहने से श्रीराम का राजसूय यज्ञ करने के विचार से निवृत्त होना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.83.17 
उवाच च शुभं वाक्यं कैकेय्यानन्दवर्धनम्।
प्रीतोऽस्मि परितुष्टोऽस्मि तवाद्य वचनेऽनघ॥ १७॥
 
 
अनुवाद
उन्होंने कैकेयीपुत्र भरत से यह शुभ बात कही - 'भोले भरत! आज तुम्हारे वचन सुनकर मैं बहुत प्रसन्न और संतुष्ट हूँ॥ 17॥
 
He said this auspicious thing to Kaikeyi's son Bharata - 'Innocent Bharata! Today I am very happy and satisfied after hearing your words.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)