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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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सर्ग 83: भरत के कहने से श्रीराम का राजसूय यज्ञ करने के विचार से निवृत्त होना
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श्लोक 13
श्लोक
7.83.13
स त्वमेवंविधं यज्ञमाहर्तासि कथं नृप।
पृथिव्यां राजवंशानां विनाशो यत्र दृश्यते॥ १३॥
अनुवाद
हे मनुष्यों के स्वामी! फिर आप ऐसा यज्ञ कैसे कर सकते हैं, जिसमें संसार के समस्त वंशों का नाश दिखाई देता है?॥13॥
O Lord of men! Then how can you perform such a yajna in which the destruction of all the dynasties of the world is seen?॥ 13॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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