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श्लोक 7.80.18  |
अरजापि रुदन्ती सा आश्रमस्याविदूरत:।
प्रतीक्षते सुसंत्रस्ता पितरं देवसंनिभम्॥ १८॥ |
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| अनुवाद |
| ‘अरजा भी भयभीत होकर रोने लगी और आश्रम के पास अपने देवतुल्य पिता के आने की प्रतीक्षा करने लगी।’॥18॥ |
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| ‘Arja too became frightened and started crying and waiting near the ashram for her god-like father to arrive.’॥ 18॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽशीतितम: सर्ग: ॥ ८ ०॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अस्सीवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ८ ०॥ |
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