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श्लोक 7.79.3  |
तद् वनं स कथं राजा शून्यं मनुजवर्जितम्।
तपश्चर्तुं प्रविष्ट: स श्रोतुमिच्छामि तत्त्वत:॥ ३॥ |
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| अनुवाद |
| विदर्भराज उस निर्जन वन में तपस्या करने क्यों गए थे? मैं सत्य बात सुनना चाहता हूँ।॥3॥ |
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| Why did the King of Vidarbha go to that lonely forest to do penance? I want to hear the truth.'॥ 3॥ |
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