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ramayan 7.78.21: हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मर्षि! मेरे द्वारा अनेक वर्षों तक उपयोग किए जाने पर भी यह शरीर नष्ट नहीं होता और मुझे पूर्ण संतुष्टि प्राप्त होती है॥ 21॥   |   ramayan सर्ग 7.78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 78: राजा श्वेत का अगस्त्यजी को अपने लिये घृणित आहार की प्राप्ति का कारण बताते हुए ब्रह्माजी के साथ हुए अपनी वार्ता को उपस्थित करना और उन्हें दिव्य आभूषण का दान दे भूख-प्यास के कष्ट से मुक्त होना  »  श्लोक 21
 
 
श्लोक  7.78.21 
बहून् वर्षगणान् ब्रह्मन् भुज्यमानमिदं मया।
क्षयं नाभ्येति ब्रह्मर्षे तृप्तिश्चापि ममोत्तमा॥ २१॥
 
 
अनुवाद
हे ब्रह्मन्! हे ब्रह्मर्षि! मेरे द्वारा अनेक वर्षों तक उपयोग किए जाने पर भी यह शरीर नष्ट नहीं होता और मुझे पूर्ण संतुष्टि प्राप्त होती है॥ 21॥
 
Brahman! O Brahmarshi! Even after being used by me for many years, this body does not get destroyed and I get complete satisfaction. ॥ 21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)