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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 77: महर्षि अगस्त्य का एक स्वर्गीय पुरुष के शवभक्षण का प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 9-10h
 
 
श्लोक  7.77.9-10h 
तमर्थं चिन्तयानोऽहं मुहूर्तं तत्र राघव॥ ९॥
विष्ठितोऽस्मि सरस्तीरे किं न्विदं स्यादिति प्रभो।
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! हे रघुनन्दन! मैं दो घण्टे तक तालाब के किनारे बैठा उस शव के बारे में सोचता रहा, 'यह क्या है?'
 
O Lord! O Raghunandan! I sat there on the bank of the pond for two hours thinking about that corpse, 'What is this?' 9 1/2
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)