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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 77: महर्षि अगस्त्य का एक स्वर्गीय पुरुष के शवभक्षण का प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.77.3 
तस्य रूपमरण्यस्य निर्देष्टुं न शशाक ह।
फलमूलै: सुखास्वादैर्बहुरूपैश्च पादपै:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
मैं वर्णन नहीं कर सकता कि उस जंगल का दृश्य कितना मनोरम था। स्वादिष्ट फल, कंद-मूल और नाना प्रकार के रंग-बिरंगे वृक्ष उसकी शोभा बढ़ा रहे थे।
 
I am unable to describe how pleasant the appearance of that forest was. Delicious fruits and roots and trees of many different colors enhanced its beauty.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)