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ramayan 7.77.2: सौम्य! मैं उस निर्जन वन में घूम-घूमकर उत्तम तप करने के लिए उपयुक्त स्थान ढूँढ़ने गया था॥2॥   |   ramayan सर्ग 7.77: महर्षि अगस्त्य का एक स्वर्गीय पुरुष के शवभक्षण का प्रसंग सुनाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 77: महर्षि अगस्त्य का एक स्वर्गीय पुरुष के शवभक्षण का प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.77.2 
तस्मिन् निर्मानुषेऽरण्ये कुर्वाणस्तप उत्तमम्।
अहमाक्रमितुं सौम्य तदरण्यमुपागमम्॥ २॥
 
 
अनुवाद
सौम्य! मैं उस निर्जन वन में घूम-घूमकर उत्तम तप करने के लिए उपयुक्त स्थान ढूँढ़ने गया था॥2॥
 
Saumya! I went there wandering around in that deserted forest to find a suitable place to perform supreme penance. ॥2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)