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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 77: महर्षि अगस्त्य का एक स्वर्गीय पुरुष के शवभक्षण का प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 12-14h
 
 
श्लोक  7.77.12-14h 
गायन्ति काश्चिद् रम्याणि वादयन्ति तथापरा:॥ १२॥
मृदङ्गवीणापणवान् नृत्यन्ति च तथापरा:।
अपराश्चन्द्ररश्म्याभैर्हेमदण्डैर्महाधनै:॥ १३॥
दोधूयुर्वदनं तस्य पुण्डरीकनिभेक्षणा:।
 
 
अनुवाद
उनमें से कुछ सुन्दर गीत गा रही थीं, कुछ मृदंग, वीणा और पणव जैसे वाद्य बजा रही थीं। बहुत सी अप्सराएँ नृत्य कर रही थीं और खिले हुए कमल के समान नेत्रों वाली अनेक अप्सराएँ स्वर्ण दण्ड से सुशोभित और चन्द्रमा की किरणों के समान बहुमूल्य चँवर (चमकीले पत्ते) धारण किए हुए दिव्य देवता के मुख पर पंखा झल रही थीं।
 
Some of them were singing beautiful songs, others were playing instruments like Mridanga, Veena and Panava. Many other Apsaras were dancing and many other Apsaras with eyes like blooming lotus flowers were fanning the face of the heavenly deity adorned with golden staff and holding precious chavar (bright leaves) like the rays of the moon.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)