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ramayan 7.77.1: (अगस्त्यजी कहते हैं -) श्री राम! प्राचीन काल के त्रेतायुग की बात है, एक बहुत बड़ा वन था, जो चारों ओर सौ योजन तक फैला हुआ था; परन्तु उस वन में न तो कोई पशु था और न ही कोई पक्षी॥1॥   |   ramayan सर्ग 7.77: महर्षि अगस्त्य का एक स्वर्गीय पुरुष के शवभक्षण का प्रसंग सुनाना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 77: महर्षि अगस्त्य का एक स्वर्गीय पुरुष के शवभक्षण का प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.77.1 
पुरा त्रेतायुगे राम बभूव बहुविस्तरम्।
समन्ताद् योजनशतं विमृगं पक्षिवर्जितम्॥ १॥
 
 
अनुवाद
(अगस्त्यजी कहते हैं -) श्री राम! प्राचीन काल के त्रेतायुग की बात है, एक बहुत बड़ा वन था, जो चारों ओर सौ योजन तक फैला हुआ था; परन्तु उस वन में न तो कोई पशु था और न ही कोई पक्षी॥1॥
 
(Agastyaji says -) Shri Ram! It is about the Treta Yuga of ancient times, there was a very large forest, which was spread on all sides upto hundred yojanas; but there was neither any animal nor bird in that forest.॥1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)