श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 73: एक ब्राह्मण का अपने मरे हुए बालक को राजद्वार पर लाना तथा राजा को ही दोषी बताकर विलाप करना  »  श्लोक 11-12
 
 
श्लोक  7.73.11-12 
नह्यन्यविषयस्थानां बालानां मृत्युतो भयम्।
स राजञ्जीवयस्वैनं बालं मृत्युवशं गतम्॥ ११॥
राजद्वारि मरिष्यामि पत्न्या सार्धमनाथवत्।
ब्रह्महत्यां ततो राम समुपेत्य सुखी भव॥ १२॥
 
 
अनुवाद
'दूसरे राज्यों में रहने वाले बालक मृत्यु से नहीं डरते; इसलिए हे राजन! इस मृत्यु के वश में पड़े हुए बालक को जीवनदान दीजिए, अन्यथा मैं अपनी पत्नी सहित अनाथ की भाँति इसी राजद्वार पर प्राण त्याग दूँगा। श्री राम! तब आप ब्रह्महत्या का पाप उठाकर सुखी होंगे।' 11-12.
 
‘Children living in other kingdoms are not afraid of death; therefore, O King! Give life to this child who is in the grip of death, otherwise I will give up my life along with my wife like an orphan at this royal gate. Shri Ram! Then you will be happy after taking the sin of killing a brahmin. 11-12.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)