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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण
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काण्ड 7: उत्तर काण्ड
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सर्ग 71: शत्रुघ्न का थोड़े-से सैनिकों के साथ अयोध्या को प्रस्थान, मार्ग में वाल्मीकि के आश्रम में रामचरित का गान सुनकर उन सबका आश्चर्यचकित होना
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श्लोक 12
श्लोक
7.71.12
ममापि परमा प्रीतिर्हृदि शत्रुघ्न वर्तते।
उपाघ्रास्यामि ते मूर्ध्नि स्नेहस्यैषा परा गति:॥ १२॥
अनुवाद
शत्रुघ्न! मेरे हृदय में भी आपके प्रति अत्यन्त प्रेम है। अतः मैं आपका सिर सूंघूँगा। यह स्नेह की पराकाष्ठा है।॥12॥
Shatrughna! I too have a lot of love for you in my heart. So I will smell your head. This is the height of affection.'॥ 12॥
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हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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