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श्लोक 7.68.20  |
तस्मात् सुदृष्टं कुरु जीवलोकं
शरै: शितैस्त्वां विविधैर्नयामि।
यमस्य गेहाभिमुखं हि पापं
रिपुं त्रिलोकस्य च राघवस्य॥ २०॥ |
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| अनुवाद |
| अतः हे राक्षस! अब तुम इस चराचर जगत् को भली-भाँति देख लो। मैं तुम्हें, पापी को, नाना प्रकार के तीखे बाणों द्वारा यमराज के धाम में भेज रहा हूँ; क्योंकि तुम तीनों लोकों के तथा श्री रघुनाथजी के भी शत्रु हो॥॥20॥ |
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| ‘Therefore, O demon! Now you should take a good look at this living world. I am sending you, the sinner, to the abode of Yamraj with various kinds of sharp arrows; because you are the enemy of the three worlds and also of Shri Raghunathji.’॥ 20॥ |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डेऽष्टषष्टितम: सर्ग: ॥ ६ ८॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें अड़सठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ६ ८॥ |
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