श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 67: च्यवन मुनि का शत्रुघ्न को लवणासुर के शूल की शक्ति का परिचय देते हुए राजा मान्धाता के वध का प्रसंग सुनाना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  7.67.14 
तच्छ्रुत्वा विप्रियं घोरं सहस्राक्षेण भाषितम्।
व्रीडितोऽवाङ्मुखो राजा व्याहर्तुं न शशाक ह॥ १४॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र के कहे हुए ये अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर राजा मान्धाता का मुख लज्जा से झुक गया, वे कुछ भी न बोल सके॥14॥
 
On hearing these extremely unpleasant words spoken by Indra, King Mandhata's face bowed down in shame. He could not say anything.॥ 14॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)