अथ रात्र्यां प्रवृत्तायां शत्रुघ्नो भृगुनन्दनम्।
पप्रच्छ च्यवनं विप्रं लवणस्य यथाबलम्॥ १॥
शूलस्य च बलं ब्रह्मन् के च पूर्वं विनाशिता:।
अनेन शूलमुख्येन द्वन्द्वयुद्धमुपागता:॥ २॥
अनुवाद
एक दिन रात्रि में शत्रुघ्न ने भृगुनन्दन ब्रह्मर्षि च्यवन से पूछा - 'ब्रह्मन्! लवणासुर में कितना बल है? उसके शूल में कितना बल है? द्वन्द्वयुद्ध में उसने उस उत्तम तलवार से किन-किन योद्धाओं को मारा है?' 1-2॥
One day at night, Shatrughan asked Bhrigunandan Brahmarishi Chyavan - 'Brahman! How much power does Lavanasura have? How much power does his prong have? Which warriors in the duel has he killed with that excellent sword?' 1-2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)