श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 65: महर्षि वाल्मीकि का शत्रुघ्न को सुदासपुत्र कल्माषपाद की कथा सुनाना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.65.6 
स्वमाश्रममिदं सौम्य राघवाणां कुलस्य वै।
आसनं पाद्यमर्घ्यं च निर्विशङ्क: प्रतीच्छ मे॥ ६॥
 
 
अनुवाद
हे सज्जन! यह आश्रम रघुवंशियों का अपना घर है। आप मुझसे आसन, पाद्य और अर्घ्य निःसंदेह स्वीकार करें। 6॥
 
Gentle! This ashram is their own home for the Raghuvanshis. You accept Asana, Padya and Arghya from me without any doubt. 6॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)