श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 64: श्रीराम की आज्ञा के अनुसार शत्रुघ्न का सेना को आगे भेजकर एक मास के पश्चात् स्वयं भी प्रस्थान करना  »  श्लोक 6
 
 
श्लोक  7.64.6 
नह्यर्थास्तत्र तिष्ठन्ति न दारा न च बान्धवा:।
सुप्रीतो भृत्यवर्गस्तु यत्र तिष्ठति राघव॥ ६॥
 
 
अनुवाद
रघुनन्दन! जहाँ अत्यंत प्रसन्न रहने वाले सेवकों (सैनिकों) का समूह (संकट के समय) खड़ा रहता है या सहायता करता है, वहाँ न तो धन टिकता है, न स्त्री टिकती है, न भाई-बन्धु टिकते हैं (अतः उन सबको सदैव प्रसन्न रखना चाहिए)॥6॥
 
Raghunandan! Wherever the group of servants (soldiers) who are kept extremely happy stand or support (in times of crisis), there neither wealth can stay, nor a woman can stay, nor brothers and relatives can stand (so all of them should always be kept happy).॥ 6॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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