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ramayan 7.62.14-15h: महाराज! इतने कष्ट सहकर, मेरे दास रहते हुए, इस रघुकुलपुत्र भरत को और अधिक कष्ट न सहना चाहिए।॥14 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.62: श्रीराम का ऋषियों से लवणासुर के आहार-विहार के विषयमें पूछना और शत्रुघ्न की रुचि जानकर उन्हें लवण वध के कार्य में नियुक्त करना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 62: श्रीराम का ऋषियों से लवणासुर के आहार-विहार के विषयमें पूछना और शत्रुघ्न की रुचि जानकर उन्हें लवण वध के कार्य में नियुक्त करना  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  7.62.14-15h 
अनुभूयेदृशं दु:खमेष राघवनन्दन:॥ १४॥
प्रेष्ये मयि स्थिते राजन् न भूय: क्लेशमाप्नुयात्।
 
 
अनुवाद
महाराज! इतने कष्ट सहकर, मेरे दास रहते हुए, इस रघुकुलपुत्र भरत को और अधिक कष्ट न सहना चाहिए।॥14 1/2॥
 
"Maharaj! Having suffered such hardships, this Raghukul's son Bharata should not suffer any more while I am his servant.'॥ 14 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)