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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 62: श्रीराम का ऋषियों से लवणासुर के आहार-विहार के विषयमें पूछना और शत्रुघ्न की रुचि जानकर उन्हें लवण वध के कार्य में नियुक्त करना  »  श्लोक 10-11
 
 
श्लोक  7.62.10-11 
भरतस्य वच: श्रुत्वा धैर्यशौर्यसमन्वितम्।
लक्ष्मणावरजस्तस्थौ हित्वा सौवर्णमासनम्॥ १०॥
शत्रुघ्नस्त्वब्रवीद् वाक्यं प्रणिपत्य नराधिपम्।
कृतकर्मा महाबाहुर्मध्यमो रघुनन्दन॥ ११॥
 
 
अनुवाद
भरत के वीरतापूर्ण और साहसपूर्ण वचन सुनकर शत्रुघ्न ने अपना स्वर्ण सिंहासन त्याग दिया और राजा श्री राम को प्रणाम करके कहा, 'रघुनन्दन! महाबाहु मझले भाई ने पहले ही बहुत कार्य सिद्ध कर लिए हैं।
 
On hearing Bharata's brave and courageous words, Shatrughna left his golden throne and after bowing to King Shri Ram said, 'Raghunandan! The mighty-armed middle brother has already accomplished many things.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)