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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 61: ऋषियों का मधु को प्राप्त हुए वर तथा लवणासुर के बल और अत्याचार का वर्णन करके उससे प्राप्त होनेवाले भय को दूर करने के लिये श्रीरघुनाथजी से प्रार्थना करना  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  7.61.8 
यावत् सुरैश्च विप्रैश्च न विरुध्येर्महासुर।
तावच्छूलं तवेदं स्यादन्यथा नाशमेष्यति॥ ८॥
 
 
अनुवाद
"महान् राक्षस! जब तक तुम ब्राह्मणों और देवताओं का विरोध नहीं करोगे, तब तक यह भाला तुम्हारे पास रहेगा, अन्यथा यह लुप्त हो जाएगा।" 8.
 
"Great demon! As long as you do not oppose the Brahmins and the Gods, this spear will remain with you; otherwise it will disappear." 8.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)