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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 6: देवताओं का भगवान् शङ्कर की सलाह से राक्षसों के वध के लिये भगवान् विष्णुकी शरण में जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसों का देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णु का उनकी सहायता के लिये आना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.6.5 
शरण्यान्यशरण्यानि ह्याश्रमाणि कृतानि न:।
स्वर्गाच्च देवान् प्रच्याव्य स्वर्गे क्रीडन्ति देववत् ॥ ५॥
 
 
अनुवाद
‘हमारे आश्रम, जो सबको आश्रय देने के योग्य थे, उन दैत्यों ने रहने के अयोग्य बना दिए हैं - उन्हें उजाड़ दिया है। उन्होंने देवताओं को स्वर्ग से हटाकर स्वयं वहाँ अधिकार जमा लिया है और देवताओं की भाँति स्वर्ग में विचरण कर रहे हैं॥5॥
 
‘Our ashrams which were suitable for providing shelter to all, have been made unfit for living by those demons – they have ruined them. They have removed the gods from heaven and have themselves established authority there and are roaming around in heaven like the gods.॥ 5॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)