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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 6: देवताओं का भगवान् शङ्कर की सलाह से राक्षसों के वध के लिये भगवान् विष्णुकी शरण में जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसों का देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णु का उनकी सहायता के लिये आना  »  श्लोक 20-21
 
 
श्लोक  7.6.20-21 
सुकेशं राक्षसं जाने ईशानवरदर्पितम्।
तांश्चास्य तनयाञ्जाने येषां ज्येष्ठ: स माल्यवान्॥ २०॥
तानहं समतिक्रान्तमर्यादान् राक्षसाधमान्।
निहनिष्यामि संक्रुद्ध: सुरा भवत विज्वरा:॥ २१॥
 
 
अनुवाद
'देवताओं! मैं सुकेश नामक एक दैत्य को जानता हूँ। वह भगवान शंकर से वरदान पाकर मदमस्त हो गया है। मैं उसके पुत्रों को भी जानता हूँ, जिनमें माल्यवान सबसे बड़ा है। वे नीच दैत्य धर्म की मर्यादा का उल्लंघन कर रहे हैं, अतः मैं क्रोधपूर्वक उनका विनाश करूँगा। आप सब निश्चिंत रहें।'॥ 20-21॥
 
‘Gods! I know a demon named Sukesha. He has become mad with pride after getting a boon from Lord Shankar. I also know his sons, of whom Malyavan is the eldest. Those vile demons are violating the limits of religion, so I will destroy them with anger. You all be worry free.’॥ 20-21॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)