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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 6: देवताओं का भगवान् शङ्कर की सलाह से राक्षसों के वध के लिये भगवान् विष्णुकी शरण में जाना और उनसे आश्वासन पाकर लौटना, राक्षसों का देवताओं पर आक्रमण और भगवान् विष्णु का उनकी सहायता के लिये आना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  7.6.17 
चक्रकृत्तास्यकमलान् निवेदय यमाय वै।
भयेष्वभयदोऽस्माकं नान्योऽस्ति भवता विना॥ १७॥
 
 
अनुवाद
‘अपने चक्र से इसका कमल-सदृश मस्तक काटकर यमराज को अर्पित कर दो। इस भय के समय में तुम्हारे अतिरिक्त और कोई हमारी रक्षा करनेवाला नहीं है।॥17॥
 
‘Cut off his lotus-like head with your discus and offer it to Yamraj. There is no one else except you who can grant us protection in this time of fear.॥ 17॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)