श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 59: ययाति का अपने पुत्र पूरु को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.59.4 
यदुस्तद्वचनं श्रुत्वा प्रत्युवाच नरर्षभम्।
पुत्रस्ते दयित: पूरु: प्रतिगृह्णातु वै जराम्॥ ४॥
 
 
अनुवाद
यह सुनकर यदु ने पुरुषोत्तम ययाति से कहा- 'आपका प्रिय पुत्र पुरु ही इस वृद्धावस्था को स्वीकार करे।
 
On hearing this, Yadu replied to the best of men Yayati - 'May your beloved son Puru alone accept this old age.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd