श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 59: ययाति का अपने पुत्र पूरु को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.59.3 
न तावत् कृतकृत्योऽस्मि विषयेषु नरर्षभ।
अनुभूय तदा कामं तत: प्राप्स्याम्यहं जराम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे पुरुषश्रेष्ठ! मैं अभी भी विषय-भोगों से तृप्त नहीं हुआ हूँ। अपनी इच्छानुसार विषय-भोगों का भोग करके मैं अपनी वृद्धावस्था आपसे ले लूँगा।॥3॥
 
O best of men! I am still not satisfied with sensual pleasures. After experiencing sensual pleasures as per my desire, I will take my old age from you.'॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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