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ramayan 7.59.23: चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाले श्री राम जब यह कथा सुना रहे थे, तब आकाश में केवल कुछ ही तारे शेष रह गए थे। पूर्व दिशा सूर्य की किरणों से लाल दिखाई दे रही थी, मानो उसने अपने अंगों को फूलों के रंग में रंगे लाल वस्त्र से ढक लिया हो।   |   ramayan सर्ग 7.59: ययाति का अपने पुत्र पूरु को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 59: ययाति का अपने पुत्र पूरु को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप  »  श्लोक 23
 
 
श्लोक  7.59.23 
इति कथयति रामे चन्द्रतुल्याननेन
प्रविरलतरतारं व्योम जज्ञे तदानीम्।
अरुणकिरणरक्ता दिग् बभौ चैव पूर्वा
कुसुमरसविमुक्तं वस्त्रमागुण्ठितेव॥ २३॥
 
 
अनुवाद
चन्द्रमा के समान मनोहर मुख वाले श्री राम जब यह कथा सुना रहे थे, तब आकाश में केवल कुछ ही तारे शेष रह गए थे। पूर्व दिशा सूर्य की किरणों से लाल दिखाई दे रही थी, मानो उसने अपने अंगों को फूलों के रंग में रंगे लाल वस्त्र से ढक लिया हो।
 
When Shri Ram, who had a face as charming as the moon, was narrating this tale, only a few stars remained in the sky. The east direction appeared red with the rays of the sun, as if it had covered its limbs with a red cloth dyed in the colour of flowers.
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनषष्टितम: सर्ग: ॥ ५ ९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनसठवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ५ ९॥
 
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)