श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 59: ययाति का अपने पुत्र पूरु को अपना बुढ़ापा देकर बदले में उसका यौवन लेना और भोगों से तृप्त होकर पुनः दीर्घकाल के बाद उसे उसका यौवन लौटा देना, पूरु का अपने पिता की गद्दी पर अभिषेक तथा यदु को शाप  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  7.59.2 
यदो त्वमसि धर्मज्ञो मदर्थं प्रतिगृह्यताम्।
जरा परमिका पुत्र भोगै रंस्ये महायश:॥ २॥
 
 
अनुवाद
यदो! तुम धर्म के ज्ञाता हो। मेरे परम तेजस्वी पुत्र! तुम मेरे लिए यह वृद्धावस्था ले लो, जो किसी अन्य के शरीर में संचारित होने में समर्थ है। मैं भोगों के द्वारा भोग करूँगा - भोगों की अपनी इच्छा पूरी करूँगा। 2॥
 
Yado! You are knowledgeable about religion. My most glorious son! You take this old age for me which is capable of being transmitted to someone else's body. I will enjoy myself through pleasures - I will fulfill my desire for pleasures. 2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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